एक खाली कोख – राजेन्दर सक्सेना

 “ये सज़ा नहीं है रोहन, ये मेरा चुनाव है,” काव्या ने रोते हुए उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा। “तुम्हें लगता है कि कोख से जन्म देने वाली ही माँ होती है? कबीर को जब चोट लगती है,

तो दर्द मुझे यहाँ, मेरे सीने में होता है। जब वह मुझे ‘काव्या मम्मा’ कहता है, तो मुझे लगता है कि दुनिया की सारी खुशियाँ मेरी झोली में आ गई हैं। जिस बच्चे ने मुझे बिना जन्म दिए ही माँ का दर्ज़ा दे दिया, उसके प्यार के सामने मुझे अपने खून के रिश्ते की कोई ज़रूरत नहीं है। तुमने कहा था ना कि खून का रिश्ता सबसे बड़ा होता है?

बाहर आसमान से बारिश की भारी बूँदें गिर रही थीं, और खिड़की के शीशे पर टकराकर एक अजीब सा शोर पैदा कर रही थीं। कमरे के अंदर का सन्नाटा उस शोर से भी ज़्यादा भयानक था। रोहन अपनी बालकनी में खड़ा सिगरेट का धुआँ हवा में उड़ा रहा था। उसकी आँखें लाल थीं, जिनमें पिछले पंद्रह दिनों की जगी हुई

रातें और अनगिनत कशमकश साफ़ दिखाई दे रही थी। अंदर कमरे में उसका छह साल का बेटा, कबीर, गहरी नींद में सो रहा था। कबीर ही रोहन की पूरी दुनिया था, उसकी जीने की इकलौती वजह। कबीर जब महज़ दो साल का था,

तब एक भयंकर सड़क दुर्घटना में रोहन की पत्नी, स्नेहा, इस दुनिया को छोड़कर चली गई थी। तब से लेकर आज तक, रोहन ने एक माँ और बाप दोनों की ज़िम्मेदारी अकेले उठाई थी। उसने खुद को समाज, दोस्तों और यहाँ तक कि अपनी भावनाओं से भी काट लिया था। 

लेकिन फिर उसकी ज़िंदगी में काव्या आई। काव्या, जो रोहन के ऑफिस में एक नए प्रोजेक्ट के लिए आई थी। उसकी हँसी में एक ऐसा जादू था जिसने रोहन के वीरान जीवन में फिर से रंग भर दिए थे। काव्या सिर्फ रोहन से ही नहीं, बल्कि कबीर से भी बहुत प्यार करती थी। कबीर भी काव्या के बिना नहीं रह पाता था।

सब कुछ कितना खूबसूरत था। लेकिन जब बात शादी तक पहुँची, तो रोहन के अंदर बैठा वह डरा हुआ पिता जाग गया। वह पिता, जिसने दुनिया के ताने और सौतेली माँ की कहानियाँ सुन रखी थीं। 

“काव्या, तुम आज कबीर से प्यार करती हो क्योंकि तुम्हारे पास अपना कोई बच्चा नहीं है। लेकिन कल जब तुम्हारी खुद की कोख से तुम्हारा अपना खून जन्म लेगा, तो इंसान की फितरत के अनुसार तुम्हारा सारा प्यार उसी पर छलक जाएगा। कबीर तुम्हारे लिए सिर्फ एक सौतेला बेटा या एक ज़िम्मेदारी बनकर रह जाएगा। मैं अपने बेटे को अपने ही घर में एक अजनबी बनते हुए नहीं देख सकता। मैं उसके भविष्य और उसकी भावनाओं के साथ यह जुआ नहीं खेल सकता। इसलिए बेहतर है कि हम इस रिश्ते को यहीं खत्म कर दें।” रोहन के ये शब्द पंद्रह दिन पहले काव्या के दिल को छलनी कर गए थे। उसने काव्या से सारे रिश्ते तोड़ लिए थे।

आज पंद्रह दिन बाद, उसी बारिश की रात में, रोहन के दरवाज़े की घंटी बजी। 

रोहन ने दरवाज़ा खोला तो सामने काव्या खड़ी थी। वह पूरी तरह भीग चुकी थी। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था, आँखें धँसी हुई थीं और वह बहुत कमज़ोर लग रही थी। उसके खड़े होने के तरीके से लग रहा था जैसे उसे शरीर में कहीं बहुत गहरा दर्द हो रहा हो। रोहन का दिल उसे इस हालत में देखकर तड़प उठा, लेकिन उसने अपने चेहरे पर एक कठोर आवरण ओढ़ लिया।

“तुम यहाँ क्यों आई हो काव्या? मैंने तुमसे कहा था ना कि हमारे बीच अब कोई बात नहीं हो सकती। मेरे फैसले में कोई बदलाव नहीं आया है,” रोहन ने अपनी आवाज़ को सख्त करते हुए कहा।

काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। वह लड़खड़ाते कदमों से घर के अंदर आई और सोफे पर बैठ गई। उसने एक गहरी साँस ली, जैसे अपने शरीर की सारी बची हुई ताकत बटोर रही हो। फिर उसने अपने भीगे हुए पर्स से एक हरे रंग की अस्पताल की फाइल निकाली और उसे टेबल पर रोहन की तरफ खिसका दिया।

“ये क्या है?” रोहन ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा।

“इसे खोलकर पढ़ लो रोहन। तुम्हारे सारे सवालों, तुम्हारे हर डर का जवाब इस फाइल में है,” काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी शून्यता थी।

रोहन ने झिझकते हुए वह फाइल उठाई। पहला पन्ना पलटा। वह किसी बड़े अस्पताल की डिस्चार्ज समरी थी। उसमें मरीज़ का नाम ‘काव्या शर्मा’ लिखा था। रोहन की नज़रें जब डायग्नोसिस और सर्जरी वाले कॉलम पर गईं, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसमें साफ अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था— ‘बायलैटरल ट्यूबल लिगेशन’ (महिलाओं की नसबंदी का ऑपरेशन)। 

रोहन के हाथ काँपने लगे। फाइल उसके हाथों से छूटकर ज़मीन पर गिर गई। वह फटी-फटी आँखों से काव्या को देखने लगा। उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई थी। “ये… ये सब क्या है काव्या? तुमने… तुमने ये क्या पागलपन किया है?”

काव्या की आँखों से अब आँसू छलक पड़े थे, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून था। उसने रोहन की आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही स्थिर और भावपूर्ण स्वर में कहा— 

“तुम मुझसे शादी इसलिए नहीं कर रहे थे ना रोहन, क्योंकि तुम्हें दिन-रात यही डर सता रहा था कि कल को जब हमारे अपने बच्चे होंगे, तो मैं तुम्हारे कबीर को वो प्यार नहीं दूँगी? तुम्हें डर था ना कि मेरे मन में अपने खून और सौतेले के बीच का भेद पैदा हो जाएगा और मैं कबीर का ध्यान नहीं रखूँगी? मैंने तुम्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि मेरे लिए कबीर ही मेरा पहला बच्चा है, लेकिन तुम्हारे अंदर का डरा हुआ पिता मेरी किसी बात पर विश्वास करने को तैयार ही नहीं था। इसलिए, तुम्हें यह विश्वास दिलाने के लिए कि कबीर ही मेरा प्रथम और आख़िरी बच्चा है, और भविष्य में मेरे कभी बच्चे ही ना हों… मैंने इस प्रश्न को ही हमेशा के लिए खत्म कर दिया। मैंने माँ बनने की संभावना का ही ऑपरेशन करा दिया रोहन। क्योंकि रोहन, मैं तुम्हें और कबीर को खोना नहीं चाहती हूँ।”

कमरे में एक खौफनाक सन्नाटा छा गया, जिसे सिर्फ बाहर गरजते हुए बादलों की आवाज़ तोड़ रही थी। रोहन अपने घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए थे और दिमाग सुन्न पड़ चुका था। वह समझ नहीं पा रहा था कि कोई इंसान किसी से इतना प्यार कैसे कर सकता है कि वह अपने ही वजूद, अपनी ही कोख को हमेशा के लिए सूना कर दे। एक औरत के लिए माँ बनने का सपना उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा अरमान होता है, और काव्या ने रोहन के एक डर को मिटाने के लिए उस अरमान की अपने ही हाथों से हत्या कर दी थी।

“क्यों काव्या… क्यों किया तुमने ऐसा?” रोहन दहाड़ मार कर रो पड़ा। उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया। उसके आँसू उसकी उँगलियों के बीच से बह रहे थे। “मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई काव्या। मैं एक निहायती स्वार्थी इंसान हूँ। मैंने सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोचा, तुम्हारे बारे में नहीं। यह तुमने क्या कर लिया? यह प्रकृति के खिलाफ है, तुम्हारे खुद के वजूद के खिलाफ है। तुमने इतनी बड़ी सज़ा खुद को क्यों दी?”

काव्या उठी और धीरे से रोहन के पास ज़मीन पर बैठ गई। टाँकों के दर्द से उसकी हल्की सी चीख निकल गई, लेकिन उसने रोहन के सिर को अपने सीने से लगा लिया। 

“ये सज़ा नहीं है रोहन, ये मेरा चुनाव है,” काव्या ने रोते हुए उसके बालों में हाथ फेरते हुए कहा। “तुम्हें लगता है कि कोख से जन्म देने वाली ही माँ होती है? कबीर को जब चोट लगती है, तो दर्द मुझे यहाँ, मेरे सीने में होता है। जब वह मुझे ‘काव्या मम्मा’ कहता है, तो मुझे लगता है कि दुनिया की सारी खुशियाँ मेरी झोली में आ गई हैं। जिस बच्चे ने मुझे बिना जन्म दिए ही माँ का दर्ज़ा दे दिया, उसके प्यार के सामने मुझे अपने खून के रिश्ते की कोई ज़रूरत नहीं है। तुमने कहा था ना कि खून का रिश्ता सबसे बड़ा होता है? मैंने आज उस खून के रिश्ते की संभावना को ही मिटा दिया, ताकि कबीर के हिस्से का प्यार कभी बँट ना सके। अब कबीर ही मेरा खून है, वही मेरा अंश है।”

रोहन ने काव्या को कसकर अपने आलिंगन में भर लिया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह दुनिया की सबसे पवित्र और महान स्त्री के सामने बैठा है। काव्या के इस एक कदम ने रोहन के सारे अहंकारों, सारे डरों और समाज के बनाए हुए सौतेले रिश्तों के सारे पैमानों को चकनाचूर कर दिया था। वह फूट-फूट कर रो रहा था और बार-बार काव्या से माफ़ी माँग रहा था।

“मुझे माफ़ कर दो काव्या। मैं तुम्हारे इस प्यार के लायक नहीं हूँ। तुमने मेरे बेटे के लिए जो त्याग किया है, वो दुनिया की कोई सगी माँ भी शायद ही कर पाए। आज से तुम सिर्फ कबीर की माँ नहीं हो, तुम इस घर की आत्मा हो,” रोहन ने काव्या का माथा चूमते हुए कहा।

तभी बेडरूम का दरवाज़ा खुला। छह साल का कबीर अपनी आँखें मलता हुआ बाहर आया। उसने रोहन और काव्या को ज़मीन पर बैठे रोते हुए देखा तो घबराकर दौड़ता हुआ उनके पास आ गया। 

“क्या हुआ पापा? आप रो क्यों रहे हो? और काव्या मम्मा, आप इतने दिन से कहाँ थीं? मैं आपको बहुत मिस कर रहा था,” कबीर ने काव्या के गले में अपनी छोटी-छोटी बाँहें डालते हुए कहा।

काव्या ने कबीर को अपनी गोद में समेट लिया और उसे चूमते हुए कहा, “मैं कहीं नहीं गई थी मेरा बच्चा। बस एक छोटा सा काम था, उसे पूरा करने गई थी। अब तुम्हारी मम्मा तुम्हें छोड़कर कभी कहीं नहीं जाएगी। कभी नहीं।”

रोहन उन दोनों को देखकर मुस्कुराने लगा। उसकी आँखों से अभी भी आँसू गिर रहे थे, लेकिन इन आँसुओं में अब कोई डर या घुटन नहीं थी। इनमें एक गहरा सुकून था। उसे यह अहसास हो गया था कि परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता, परिवार बनता है त्याग, समर्पण और उस अटूट विश्वास से, जो आज काव्या ने अपने एक खामोश लेकिन सबसे बड़े बलिदान से साबित कर दिया था। उस रात उस घर से एक औरत का माँ बनने का सपना हमेशा के लिए विदा हो गया था, लेकिन उसी घर में एक ऐसे वात्सल्य ने जन्म लिया था, जिसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी डिगा नहीं सकती थी।

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 लेखक : राजेन्दर सक्सेना

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