खोया तो शुभा ने भी बहुत कुछ था,छोटी उम्र से ही।दुख बर्दाश्त करने या समझ पाने की जब उम्र नहीं थी,तभी एक -एक करके उसे प्यार करने वाले दादा और दादी चले गए।यौवन अभी दहलीज लांघ भी ना पाया था,कि पापा की हार्ट अटेक से असमय मृत्यु हो गई।जिस उम्र में रंगीन सपने देखना भाता है
आंखों को, ठीक उसी उम्र में उसे आंसुओं को संभालना सीखना पड़ा।मां की उम्र तब महज पैंतालीस साल की रही होगी।जिस गोरे माथे पर वो बड़ी सी सिंदूरी बिंदी लगाती थीं, उस माथे पर अब चिंता की लकीरें देख अपना दुख बहुत कम ही लगा शुभा को।घर की बड़ी बेटी होने की जिम्मेदारी पता नहीं अच्छे से पूरा कर पाई या नहीं, पर ईमानदारी और लगन से प्रयास किया था उसने।
धीरे-धीरे परिवार व्यवस्थित होने लगा तो,मां ने शादी पर जोर देना शुरू कर दिया।उस दौर में जब आधुनिकता की आंधी महिलाओं को छू भी ना सकी थी,मां बड़े आत्मविश्वास से कहतीं”शुभा,शादी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय है।तू दूसरों को खुश करने की कोशिश मत करना।
यह मत समझना कभी कि पापा नहीं है,तो कोई भी रिश्ता चलेगा।तूने अपने हिस्से के सारे दुख झेल लिए।अब अपनी खुशी को ही ज्यादा महत्व देना।”
मां की बात समझती तो थी शुभा,पर ज़िंदगी से कभी बहुत ज्यादा की उम्मीद कर ही नहीं सकी वह।बुआ ने जब अमित का रिश्ता बताया, तो वह मना नहीं कर पाई।मां ने तो एक ही नज़र में अपनी खूबसूरत बेटी के सामने लड़के की फोटो को नापसंद कर दिया था।उन्होंने अपने पिता से कोलकाता में ही रिश्ता करने की बात कर ली।नाना जी ने एक रेलवे में काम कर रहे लड़के को नातिन की फोटो दिखाई और उन्होंने पसंद भी कर लिया।
अगले पड़ाव में लड़का देखने आने के लिए जब तैयार हो गया तब , शुभा ने शायद पहली बार झूठ बोला था नाना से। कोलकाता बहुत दूर था शुभा के घर(म. प्र.) से।मायके में जब कभी मां को या छोटे भाई-बहनों को उसकी जरूरत पड़ेगी, तब वह आ नहीं पाएगी।दूसरा कारण था बुआ को नाराज़ करना, जिन्होंने हमेशा उसके परिवार को संबल दिया।शुभा ने नाना से कहा”मुझे बुआ का बताया रिश्ता ज्यादा पसंद है नाना जी।सगाई तक तय कर दी है लड़के की मां ने।अब दूसरा लड़का देखना बेईमानी होगी।आप ही बताइए मुझे क्या करना चाहिए?”
नाना जी सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने शुभा के निर्णय को प्राथमिकता दी।अपनी बेटी की शंका का समाधान करने के लिए,वे खुद ही कोलकाता से नानी के साथ आए थे,बुआ वाले लड़के के परिवार से मिलकर और लड़के से बातचीत कर शुभा के निर्णय को सहमति दी।मां अब निरुत्तर थी।शुभा को तब यह भी समझ नहीं आया था कि ,उसने इस रिश्ते को इतनी आत्मीयता से क्यों स्वीकार किया?
अपने निर्णय पर शुभा को कभी पछताना भी नहीं पड़ा।जैसे समझदार जीवन साथी की कल्पना की थी शुभा ने,अमित उससे भी ज्यादा अच्छे थे।शुभा के मायके को उन्होंने सदैव अपना परिवार ही समझा।शुभा को जो वास्तविक संतोष था , वह अपनी सासू मां की तरफ से था।ईश्वर ने उन्हें दुनिया की सर्वोत्तम सास बनाया था।पग -पग पर शुभा के साथ खड़ी रहीं वे, सुख में भी और दुख में भी।शुभा के मन को पढ़ लेती थीं वे। जब-जब मायके में शुभा की जरूरत होती, वे तत्परता के साथ शुभा को वहां भेजतीं। वास्तविक रूप से यदि देखा जाए, तो सास के गुणों के विपरीत वे शुभा की मां बन गईं थीं।
उन्हीं के सहयोग से शुभा स्कूल में नौकरी कर पाई, क्योंकि बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी उन्होंने खुशी-खुशी ले रखी थी।पूरे मोहल्ले,और शायद पूरे नगर में शुभा और उसकी सासू मां के प्यार के चर्चे थे।मां के जाने के बाद उनका प्रेम और भी बढ़ गया।बीतते समय के साथ अपने तजुर्बों की पोटली से खरे-खरे सुझाव सिक्कों की तरह उड़ेलती रहीं वे।अपनी सत्यवादिता पर अभिमान करने वाली शुभा झूठ का सहारा कभी नहीं लेती थी।ना ही कभी पति से झूठ बोलकर अतिरिक्त पैसे ही ऐंठ पाई।उल्टे अपनी कमाई को भी पति से साझा करती थी।मां(सासू मां)अक्सर चेताती”बहू, परिवार चलाने के लिए औरत को कभी -कभार झूठ भी बोलना पड़ता है। हरिश्चंद्र बनकर तुम्हें कोई पदक नहीं मिलेगा।थोड़ा झूठ बोलकर यदि भविष्य के लिए , अपने बच्चों के लिए अभी संचय नहीं करोगी, तो बाद में कुछ हांथ नहीं आएगा।अरे घर के खर्चे ही कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बता दिया करो अमित (बेटे) से।सोना खरीद सकती हो।वो झूठ जिससे किसी का नुक़सान ना हो, अधर्म में नहीं गिना जाता।” शुभा हंसकर मां को कृष्ण बनकर प्रवचन देने का ताना ही देती।छल का बल प्रयोग शुभा के स्वभाव में था ही नहीं।
सासू मां की नसीहत एक बार तब काम आई जब,छोटी ननद की शादी के लिए उसने अपनी मां के लिए गहनों में से कुछ बेच दिए।मां ने जब आंखें तरेर कर बिना गहनों के उसे देखा तो,सफाई में फिर एक बार झूठ बोली थी शुभा”गिरवी रखना पड़ा मां,शादी के लिए।छोटी मेरी बहन जैसी है।अगले साल तक छुड़ा लेंगे।” मां ने नौ महीने कोख में रखा था,झुकी नजरें देखकर उन्हें पूरा यकीन हो गया था कि शुभा झूठ बोल रही है।इसके अलावा और कोई बहाना सूझा ही नहीं शुभा को।जब तक मां जिंदा रहीं,मन ही मन नाराज ही रहीं अपनी बेटी से।माफ़ नहीं किया होगा उन्होंने इस कृत्य के लिए।
इसी बीच ससुर जी चल बसे,जो शुभा से बहुत स्नेह करते थे।एक साल के भीतर मन ही मन नाराज मां भी चल बसीं।शुभा के लिए सबसे बड़ी चोट अमित का जाना था।लंबी बीमारी से लड़ते-लड़ते थक कर आखिर में वे भी चले गए।इस बार शुभा ने सच कहा था सासू मां से-“अमित अब नहीं रहे मां।तुम हिम्मत रखना,नहीं तो मैं टूट जाएंगी।वाह रे सख़्त जान।वाकई में अपने इकलौते बेटे के जाने का दुख बड़ी हिम्मत से सहा उन्होंने।कभी कोई मिलने आया भी तो मजबूती के साथ यही कहा” ईश्वर की मर्जी थी,हम क्या कर सकते हैं?मैं रोऊंगी नहीं।मैंने यदि अपना बेटा खोया है,तो इसने भी तो अपना पति खोया है।बहुत सेवा की है मेरी बहू ने अपने पति की।दो -दो बार सावित्री बनकर पति को मौत के मुंह से खींच लाई थी।मुझे अच्छा रहना है इसके लिए।मैं कहीं नहीं जाऊंगी इसे छोड़कर।”
उनकी आत्मविश्वास से भरी सांत्वना शुभा के लिए तपते रेगिस्तान में पानी की धारा साबित हुई। देखते-देखते साल बीतने लगे। शारीरिक कमजोरी तो प्रत्याशित थी,पर मन से अब भी चट्टान थीं।अचानक एक दिन शुभा को पता चला कि बड़े ननदोई नहीं रहे।सन्न रह गई थी शुभा।घर का बड़ा दामाद,लाड़ला था सासू मां का।कैसे बताए सच?सोचकर निर्णय लिया कि सच बोलना चाहिए।दामाद की मृत्यु की खबर सुनकर अस्सी साल की जीर्ण शीर्ण वृद्धा ने इतना ही कहा” भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।”बड़ी बेटी से बात करते हुए विचलित हो जाने वाली मां ने बेटी को रोने से मना करते हुए जब कहा” रोकर जाने वाले का अपमान मत कर अमृता।अरे!जो दुख तुझे मिला,वही तो तेरी भाभी ने भी सहा है।मेरी सेवा करने से ही फुर्सत नहीं मिली इसे,कि पति के जाने से रो ले।तुम सभी को अपनी भाभी से सीखना चाहिए।आखिरी समय में भी मेरा डाइपर बदल रही थी यह।मेरे ही पिछले जन्म के कर्मों का फल है यह।कुछ दिनों के लिए आ जाना ना मेरे पास।भाभी को भी अच्छा लगेगा।”
रिश्तों में दूरियां बढ़ने का चलन ऐसा बढ़ा है आजकल कि,बिना किसी कार्यक्रम के लोग एक दूसरे के यहां जा ही नहीं पाते।जब से ननदोई जी गए,तब से बड़ी ननद की जीने की इच्छा ही मानो खत्म हो गई।पति के जाने को तीन साल होने को आए,पर वह आई नहीं पलटकर।शायद बच्चों की सहमति भी ना रही हो।अंदर ही अंदर घुटते हुए अब बड़ी ननद थोड़ा विचित्र व्यवहार भी करने लगी थी।मां से सप्ताह में दो बार फोन पर बातें तो करती थी वो,पर उन बातों में अपनी मां के प्रति नकारात्मक विचार ही होते थे।शुभा ने बहुत समझाया भी था कि ” पुरानी बातों को कुरेदकर,दुख ही मिलता है।मां की भी उम्र हो रही।उन्हें जबरन अपराध बोध से ग्रस्त करना उचित नहीं।बचपन के अनुशासन को जानबूझकर सताने का नाम क्यों देना? उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रहने दी।इस उम्र में उनकी कमियां गिनाने का कोई औचित्य ही नहीं।उल्टा तुम्हें दुख ही मिलेगा।” अमृता को कभी फर्क ही नहीं पड़ा।वह हफ्ते में दो बार बिना नागा बात करती रही मां से, और अपने मन का ज़हर उगलती रही।शुभा को ननद का यह व्यवहार अनुचित लगा तो, मां से कह दिया”मत उठाया करो ना फोन उसका।कितनी बातें सुनाती है हर दम।और तुम भी हो कि चुपचाप सुनती रहती हो।पलटकर एक बार उसे सुना दोगी, तो वो फिर से तुम्हें बेइज्जत नहीं करेगी।”
एक मां की विवशता थी ,या बुढ़ापे का गरल।वो सहज होकर कहतीं” अरे बहू! माना वह बहुत बात सुनाती है, पर इसी बहाने उसकी आवाज तो सुनाई पड़ जाती है।मेरे लिए मेरी तीनों संतान बराबर है।अब यदि उसे लगता है कि मैं बुरी मां हूं, तो मैं हूं। अनुशासन में रखने के लिए मां को बचपन में सख़्त होना पड़ता है।इसमें बच्चों का ही भला है।मैं एक बुरी मां हूं ,तो हूं।मैं अब कुछ नहीं बदल सकती।मैं तो अपनी बेटियों के लिए ईश्वर से सुख की याचना ही करती हूं।”
उस दिन मन भींग गया तर-बतर।ये है मां की जीवंत परिभाषा। परिष्कृत, पारदर्शी और पवित्र।छह महीने पहले ही उसी ननद को ब्रेन स्ट्रोक हुआ।महीने भर अस्पताल में रही।दिमाग तक ऑक्सीजन सही तरीके से नहीं पहुंच पाने की वजह से बात नहीं कर पा रही थी अमृता।सासू मां को एकटक सारा दिन फोन निहारते देखना बहुत ही दुखदाई हो रहा था।बीच में अस्पताल से छुट्टी मिलते ही उसने शुभा से बात की थी”भाभी, बहुत कमजोर हो गई हूं मैं।पता नहीं कब तक बचूंगी।अब अच्छा नहीं लगता अस्पताल में पड़े रहना।वहां का खाना खाना।मां से बात नहीं कर पाई, क्योंकि बात करते-करते अचानक जुबान लड़खड़ाने लगती है।उन्हें फिर पूरी बीमारी विस्तार से बताना पड़ेगा,जो संभव नहीं है।तुम बता देना उनसे मैं ठीक हूं।”ज्यादा देर वास्तव में बात नहीं कर पा रही थी अमृता।शुभा ने मां को उसकी हालत के बारे में विस्तार से बताया और कहा कि कुछ दिनों बाद बात करेगी आपकी बेटी।अभी आप धीरज रखिए।
मां कहां संतुष्ट हो पाईं थीं।अगले ही दिन दोपहर में सीधे -सीधे पूछा उन्होंने “जिंदा तो है ना बहू,अमृता?झूठ मत बोलना मुझसे।” शुभा ने डांटा था बहुत जोर से उन्हें” ऐसी अपशकुनी बातें क्या शोभा देती है किसी मां को?जिंदा क्यों नहीं रहेगी? बिल्कुल है।सही समय पर बात करेगी ना।मैं जाकर देख आऊंगी।भगवान पर भरोसा रखिए मां।”
जाने का सोचकर ननद के बेटे को फोन किया ,तो उसने अस्पताल से छुट्टी होने के बाद आने के लिए कहा।अगले सप्ताह का रिजर्वेशन भी करवा लिया शुभा ने अपने बेटे से कहकर।कल भोर में ही भानजे ने फोन पर बताया कि अमृता नहीं रही। अस्पताल से सकुशल आकर अगले ही दिन,वह अनंत यात्रा में चली गई।
अब सबसे बड़ी परीक्षा का समय था शुभा के लिए।तत्काल निकलना था।मां की स्वयं की तबीयत बहुत अच्छी नहीं थी सो शुभा ने बेटे से दादी के पास रुकने के लिए कहा।इस बार भी हर बार की तरह बैग पैक करने दिया मां को। प्रश्नवाचक दृष्टि बेध रही थी शुभा की अंतरात्मा को।झट से फिर एक बार झूठ बोली वह”मेरी बुआ बहुत सीरियस हो गई है मां।उन्हें बिलासपुर ले जा रहें है।तो मैंने भी सोचा साथ में चली जाऊं।जाऊं ना?” यह प्रश्न नहीं था,बल्कि स्वयं को दिया गया उत्तर था। उन्होंने हर बार की तरह सहर्ष सिर हिला दिया।
अंत्येष्टि संस्कार संपन्न होते ही शुभा को आना था।भानजे और छोटी ननद ने मां को बताने की जिम्मेदारी शुभा पर ही छोड़ी(उनकी शारीरिक अस्वस्थता के कारण)।सुबह सुबह शुभा को देखकर उन्होंने जैसे ही पूछना चाहा कुछ,शुभा ने एक और झूठ कह डाला”हां ,अभी तो एडमिट हैं बुआ,वहीं।उनकी बेटियां आ गईं तो मैं आ गई।”
“ठीक तो हो जाएंगी ना बुआ तुम्हारी?” उनके इस प्रश्न से अब तक शुभा बच रही है।नाती ने भी यही कहा उनके”मां,अभी मत बताओ दादी को बुआ के बारे में। बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी वे।”
शुभा ने अब तक नहीं बताया उन्हें,जिनसे कभी कोई सच छिपाया ही नहीं।पास बैठकर इधर उधर की बातें कर,टी वी सीरियल देखते हुए चार दिन बिता दिए।यह विदित है, कि वह लौह महिला है।अपनी बहू की परछाई है।बत्तीस सालों से साथ है दोनों का।जीवन के सबसे अधिकतम दिन दोनों ने साथ बिताए हैं,पर उनकी आंखों से आंखें मिलाने में डर लगता है।यह उनकी हरिश्चंद्र तिल -तिल करके हार रही है स्वयं से।
क्या यह झूठ ही सच है,?या सत्य का परिणाम सत्य है?
शुभ्रा बैनर्जी