घर के लक्ष्मी का सम्मान – डाॅ उर्मिला सिन्हा

     बड़ी सी हवेली कई-कई हवादार कमरे सुसज्जित।

हवेली के पीछे बड़ा सा फलों का बाग सामने रंग-बिरंगे फूलों का बागीचा। चारदिवारी के भीतर ही स्वच्छ न

निर्मल जल का पोखरा जिसमें तरह-तरह की मछलियां तैरती रहती। माली के साथ दो-चार सेवक बाहर-भीतर घर की साफ-सफाई देखभाल में लगे रहते।

सुख-समृद्धि,रिद्धि -सिद्धि का वास था इस घर

में। दादा-दादी, बड़ी मां- बड़े बाबूजी,चाचा-चाची, बुआ फूफा, बहू बेटी उनके बाल-बच्चों से हवेली गुलजार था।

यहां चाचा की छोटी बिटिया का विवाह था।इस पीढ़ी की आखिरी शादी थी अतः दूर-दूर देश-विदेश से सभी घरवाले नाते-रिश्तेदार आये हुए थे। बिटिया आशु इंजीनियर थी और उसका होने वाला पति भी।

आज हल्दी मेंहदी संगीत का आयोजन था। सभी सज-धजकर तैयार थे। बड़ी मां, मां,चाची सब कोई मेहमानों के खातिरदारी में दिन-रात एक किये हुए थे। घर की व्याही बेटियां और बहुएं सभी के आवभगत में चक्कर घिन्नी बनी हुई थी।

” अरे फूल वाला फूल लेकर नहीं पहुंचा” बड़ी बहू फोन लगाती।

” मेहमानों को मनपसंद नाश्ता खाना परोसा गया या

नहीं ” बड़ी बूढ़ी एक दूसरे से पूछती।

” दान-दहेज, मेहमानों की बिदाई की तैयारी ठीक से हुई या कोई कमी रह गई” पुरुष वर्ग बार-बार पूछते।

” बारात आ गई,बारात आ गई ” घर बाहर शोर मच गया। द्वार परीक्षण के पश्चात स्त्रियां मंगल गीत गाने लगी,” छोटी चुकी सासु अम्मा लमहर दामाद हे तनी एक निहुर ए बाबू परीछीं दामाद हे” महिलाओं की मधुर स्वरलहरी में बराती सराती खो से गए।

आंगन में मंडप सजा हुआ था । दोनों पक्षों के लोग आरामदायक कुर्सी पर बैठे विवाह का आनंद ले रहे थे।

सौहाद्र पूर्ण वातावरण में वैवाहिक रस्में हो रही थी। बड़ा ही मनभावन पारंपरिक विवाह दृश्य उपस्थित था।

सिंदूर दान के पश्चात दुल्हन की एक भाभी उसे सुहाग का पायल , बिछिया पहनाने बैठी।तभी बाराती पक्ष से दूल्हे की रिश्तेदार उठ खड़ी हुई और जोर से बोली,” तुम रीता हो न रामलाल की बेटी, तुम यहां क्या कर रही हो”

उनकी चीख सुनकर मंडप में सन्नाटा छा गया।रीता बहू ने उलटकर उन्हें देखा,उसका चेहरा फक पड़ गया वह किसी अनिष्ट की आशंका से थर-थर कांपने लगी।

दुल्हन की ओर से महिलाएं उठ खड़ी हुई,” क्या हो गया यह हमारी बहू रीता है…आपको क्या परेशानी है।”

” परेशानी” वह विद्रूपता से बोली,” हमें पता होता कि यह चोर , कंगाल की बेटी आपकी बहू है तो हम कभी आपके यहां रिश्ता नहीं करते।”

भरी सभा में जलील होने अपमान से रीता रो पड़ी।

दोनों पक्षों के रिश्तेदारों में खुसुर पुसुर होने लगा। सभी अचंभित हो एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। चिल्लाने वाली महिला अपनी बातों का असर होता देख रीता और उसके परिवार पर अनर्गल आरोप लगाने लगी।

लोगों को समझते देर नहीं लगी कि कोई पुरानी पारिवारिक विवाद का बदला लेने का सुअवसर वह स्त्री खोना नहीं चाहती। कोई कुछ बोले कि रीता बहू के सास-ससुर,पति और घरवाले एक साथ उठ खड़े हुए।पति ने रीता को बांहों में समेट कर ढाढस बंधाया।

रीता के सास-ससुर ने कड़े शब्दों में एतराज जताया

,” रीता हमारी बहू है मेरे घर की लक्ष्मी हम इसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं सुन सकते हैं। आपकी समस्या क्या है आप समझिये लेकिन भरी सभा में आपने मेरी बहू को अपमानित कर अपने ओछी सोच का परिचय दिया है।”

” हमारे लिए हमारी बहू का सम्मान सर्वोपरि है,आप तशरीफ़ ले जा सकती हैं” कहते हुए वे भावी समधी-समधन की ओर देखने लगे।वे दोनों सज्जन पति-पत्नी

अपने साथ आई महिला के इस दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांग वैवाहिक कार्यक्रम आगे बढ़ाने के लिए कहने लगे।

” हमारे लिए बहू का सम्मान सर्वोपरि, बहू तुम अपना काम करो, हमें न कुछ सुनना न जानना है, कोई कुछ भी कह देगा और हम मान लेंगे” सासु मां ने रीता बहू को गले लगाते हुए कहा।

लांछन लगाने वाली महिला वहां से अपनी दाल गलती न देख रफ्फूचक्कर हो गई।

इधर पंडित जी फेरों के साथ

“मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुड़ ध्वज” मंत्रोच्चार करने लगे। इस प्रकार बड़ों के सूझ-बूझ से अप्रिय प्रसंग टल गया।

मौलिक रचना -डाॅ उर्मिला सिन्हा 

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