अंतर्मन की आहट – मोहिनी मिश्रा

  “नंदिनी, उस दिन तुमसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा था, और आज भी तुम्हारे पास बैठकर जो सुकून मिलता है, वो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सच कहूं तो सब कुछ है मेरे पास। एक बहुत अच्छा घर है, एक बेहतरीन करियर है, पैसा है, रुतबा है… बस वो एक दोस्त नहीं है, जिसके सामने मेरा असली परिचय हो।

एक ऐसा इंसान जिसके सामने मुझे कोई मुखौटा न पहनना पड़े। वो बात जो मैं हमेशा चाहता था कि कोई मुझमें ढूंढे, मेरे इस सूट-बूट के पीछे के उस इंसान को कोई देखे, लेकिन वो बात न जाने तुम कैसे समझ गई। तुम्हारी आँखें नहीं हैं नंदिनी, फिर भी तुम मेरे कदमों की आहट से मुझे पहचान गई।

उस दिन भी तुमने मेरे दर्द को सुन लिया था और आज भी… मैं सच में कुछ देर बस तुमसे बात करना चाहता था। तुम बहुत अच्छा ज्ञान देती हो, बहुत गहराई है तुम्हारी बातों में।” समर ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा।

शहर की सबसे ऊंची और आलीशान इमारत के पेंटहाउस में रहने वाला समरवर्धन, जिसे दुनिया एक बेहद कामयाब और अमीर बिजनेसमैन के रूप में जानती थी, आज बालकनी में खड़ा शहर की जगमगाती रोशनी को एक अजीब सी शून्यता के साथ देख रहा था। उसके पास वो सब कुछ था जिसे पाने का सपना एक आम इंसान देखता है।

करोड़ों का कारोबार, महंगी गाड़ियां, नौकर-चाकर और शहर का सबसे रसूखदार परिवार। उसके पिता, ठाकुर बलवंत सिंह, शहर के जाने-माने उद्योगपति थे, और उसकी माँ, मृदुला देवी, हर बड़े सोशल इवेंट की शान हुआ करती थीं।

समर का एक छोटा भाई भी था, कबीर, जो अपनी ही दुनिया और दोस्तों में मस्त रहता था। बाहर से देखने पर यह एक परफेक्ट, सुखी और संपन्न परिवार था। लेकिन इस मखमली चादर के नीचे रिश्तों की ज़मीन बहुत पथरीली और ठंडी थी। 

इस घर में हर बात का तराजू पैसा और हैसियत था। डाइनिंग टेबल पर व्यापार की बातें होती थीं, रिश्तों की नहीं। समर ने कभी अपने पिता से एक दोस्त की तरह बात नहीं की थी और न ही कभी माँ की गोद में सिर रखकर अपने दिल का हाल सुनाया था। एक मशीन की तरह वह सुबह उठता, मीटिंग्स अटेंड करता, पैसे कमाता

और रात को उसी शून्यता के साथ सो जाता। उस बड़े से घर में रहते हुए भी समर खुद को एक ऐसे अनाथ की तरह महसूस करता था, जिसका अपना कहने को कोई नहीं है। उसे ऐसा लगता था जैसे वह एक बहुत बड़ी भीड़ के बीच खड़ा है, जहाँ हर कोई उसका नाम तो पुकार रहा है, लेकिन कोई उसे पहचानता नहीं है। 

इन्हीं उलझनों और घुटन से बचने के लिए समर अक्सर रविवार की शाम शहर के बाहरी किनारे पर बने एक पुराने, शांत अनाथालय और दृष्टिबाधित आश्रम ‘सुकून’ में जाया करता था। यह जगह उसकी दिवंगत दादी ने बनवाई थी और समर यहाँ गुपचुप तरीके से दान देने आता था। इसी आश्रम के पीछे एक बहुत ही सुंदर और हरा-भरा बगीचा था, जहाँ की शांति समर के बेचैन मन को मरहम लगाती थी। और इसी बगीचे में उसकी मुलाकात नंदिनी से हुई थी।

नंदिनी उसी आश्रम में रहने वाली एक दृष्टिबाधित लड़की थी, जो वहां के छोटे बच्चों को संगीत सिखाती थी और उस बगीचे के पौधों की देखभाल करती थी। वह जन्म से ही देख नहीं सकती थी, लेकिन उसकी चेतना, उसकी समझ और दुनिया को महसूस करने की उसकी क्षमता किसी भी देखने वाले इंसान से सौ गुना ज्यादा थी। जिस दिन समर पहली बार उस बगीचे की बेंच पर आकर बैठा था, वह अंदर से बहुत टूटा हुआ था। उस दिन घर में कबीर और बलवंत सिंह के बीच एक बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था, और समर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया था। वह बस अपना सिर पकड़कर उस बेंच पर बैठ गया था।

तभी नंदिनी अपने हाथ में एक पानी का फव्वारा लिए पौधों को सींचती हुई वहां आई थी। वह समर के पास आकर रुकी और बहुत ही कोमल और ठहरी हुई आवाज़ में बोली थी, “आपके कदमों की आहट में एक अजीब सी थकावट है। ये थकावट किसी सफर की नहीं लगती, ये तो ऐसा लगता है जैसे कोई इंसान अपनी ही मंज़िल पर पहुंचकर रास्ता भूल गया हो। आप कौन हैं?”

समर उस दिन सन्न रह गया था। जिस इंसान ने उसे देखा तक नहीं, उसने सिर्फ उसके चलने की आवाज़ से उसके दिल का वो भारीपन कैसे पढ़ लिया, जिसे उसके अपने घर वाले सालों से नहीं देख पाए थे? उस दिन समर ने बिना अपनी असली पहचान बताए नंदिनी से बहुत बातें की थीं। और फिर यह सिलसिला बन गया। हर रविवार समर उस बगीचे में जाता और नंदिनी उसका इंतज़ार करती। नंदिनी के पास कोई दृष्टि नहीं थी, लेकिन वह समर की खामोशी, उसकी साँसों के उतार-चढ़ाव और उसकी आहट से सब कुछ समझ जाती थी। 

आज भी समर उसी बगीचे में नंदिनी के पास बैठा था। पेड़ों से छनकर आती शाम की धूप नंदिनी के शांत चेहरे पर पड़ रही थी। समर काफी देर से उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जो समर को अपने करोड़ों के घर में कभी नहीं मिली। 

समर ने एक गहरी सांस ली और उस चुप्पी को तोड़ते हुए कहा, “नंदिनी, उस दिन तुमसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा था, और आज भी तुम्हारे पास बैठकर जो सुकून मिलता है, वो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सच कहूं तो सब कुछ है मेरे पास। एक बहुत अच्छा घर है, एक बेहतरीन करियर है, पैसा है, रुतबा है… बस वो एक दोस्त नहीं है, जिसके सामने मेरा असली परिचय हो। एक ऐसा इंसान जिसके सामने मुझे कोई मुखौटा न पहनना पड़े। वो बात जो मैं हमेशा चाहता था कि कोई मुझमें ढूंढे, मेरे इस सूट-बूट के पीछे के उस इंसान को कोई देखे, लेकिन वो बात न जाने तुम कैसे समझ गई। तुम्हारी आँखें नहीं हैं नंदिनी, फिर भी तुम मेरे कदमों की आहट से मुझे पहचान गई। उस दिन भी तुमने मेरे दर्द को सुन लिया था और आज भी… मैं सच में कुछ देर बस तुमसे बात करना चाहता था। तुम बहुत अच्छा ज्ञान देती हो, बहुत गहराई है तुम्हारी बातों में।” समर ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा।

नंदिनी के चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान तैर गई। उसने अपनी सफेद छड़ी को बेंच के सहारे रखा और बोली, “ज्ञान तो किताबों में होता है समर जी, मैं तो बस महसूस करना जानती हूँ। आप जैसे लोग जो आँखों वाले होते हैं ना, वो अक्सर सिर्फ वो देखते हैं जो उन्हें दिखाया जाता है—कपड़े, घर, पैसा और रुतबा। लेकिन हम जो बाहर का शोर नहीं देख पाते, हम सीधे इंसान के अंदर का सन्नाटा सुन लेते हैं। आपके पास सब कुछ है, लेकिन आपके रिश्तों में वो जड़ें नहीं हैं जो एक पेड़ को आंधी में गिरने से बचाती हैं। परिवार एक मकान की तरह होता है समर जी, अगर उसकी नींव में प्यार और संवाद का सीमेंट न हो, तो वो बहुत जल्दी दरकने लगता है।”

नंदिनी की इन बातों ने समर के दिल के किसी बहुत गहरे तार को छेड़ दिया था। उसने नंदिनी को अपने परिवार के बारे में सब कुछ बता दिया। उसने बताया कि कैसे उसके पिता सिर्फ अपने बिजनेस को लेकर जुनूनी हैं, कैसे उसकी माँ सिर्फ दिखावे की जिंदगी जीती हैं, और कैसे उसका भाई इस घुटन से भागने के लिए गलत रास्तों पर जा रहा है। 

“मैं क्या करूँ नंदिनी? मुझे अपने ही घर में अजनबीपन महसूस होता है,” समर ने बेबसी से कहा।

नंदिनी ने अपना हाथ धीरे से समर के हाथ पर रखा। “समर जी, आप अपने घर के उस कमरे की तरह हैं, जिसकी खिड़कियां बंद हैं और आप शिकायत कर रहे हैं कि अंदर हवा नहीं आ रही। आपको पहल करनी होगी। रिश्ते व्यापार नहीं होते जहाँ मुनाफा देखा जाए। वहाँ तो कभी-कभी अपनी हार मानकर भी जीतना पड़ता है। अपने पिता से उस बेटे की तरह बात कीजिए जो उनसे प्यार करता है, उस वारिस की तरह नहीं जो उनकी गद्दी संभालने वाला है।”

नंदिनी की बातों ने समर को एक नई दिशा दी। उसने तय किया कि वह अब अपनी जिंदगी को यूं ही बहने नहीं देगा। अगले ही दिन जब बलवंत सिंह डाइनिंग टेबल पर कबीर पर चिल्ला रहे थे क्योंकि कबीर ने ऑफिस आने से मना कर दिया था, तब समर पहली बार बीच में बोला। 

“पापा, क्या आपने कभी कबीर से पूछा है कि वो क्या चाहता है? या हमने सिर्फ ये मान लिया है कि हमारी ख्वाहिशें ही उसकी जिंदगी का अंतिम सच हैं?” समर की आवाज़ शांत थी लेकिन उसमें एक ऐसा ठहराव था जिसने सबको हैरान कर दिया। 

बलवंत सिंह गुस्से से बोले, “तुम मुझे सिखाओगे समर? मैंने इस परिवार को यहाँ तक लाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी है।”

“हाँ पापा, आपने हमें बहुत कुछ दिया है। लेकिन आपने हमें अपना वक्त नहीं दिया। आपने हमें एक दूसरे से प्यार करना नहीं सिखाया। हम एक घर में रहने वाले चार अजनबी हैं पापा, परिवार नहीं। कबीर फोटोग्राफी करना चाहता है, लेकिन वो आपसे डरता है। माँ हर पार्टी में खुश दिखती हैं, लेकिन मैंने उन्हें कई बार अकेले में अवसाद की गोलियां खाते देखा है। और मैं… मैं खुद अंदर से इतना खाली हूँ कि मुझे लगता है मैं जिंदा ही नहीं हूँ।” समर की आँखों से आज पहली बार अपने परिवार के सामने आंसू बह रहे थे।

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। मृदुला देवी सन्न रह गईं कि उनके बेटे को उनकी बीमारी के बारे में पता है। बलवंत सिंह के चेहरे का कठोरपन भी थोड़ा ढीला पड़ा। उस दिन उस घर में कोई व्यापार की बात नहीं हुई। उस दिन पहली बार चार लोग एक-दूसरे के सामने अपने असली रूप में बैठे थे। 

समर ने धीरे-धीरे नंदिनी के सिखाए उस ‘संवाद’ और ‘सुकून’ को अपने घर में लागू करना शुरू किया। उसने कबीर को अपने सपनों का पीछा करने की हिम्मत दी। उसने माँ के साथ वक्त बिताना शुरू किया। और पिता को भी यह एहसास दिलाया कि उनका बेटा सिर्फ एक मशीन नहीं है। कुछ ही महीनों में उस आलीशान इमारत के उस पेंटहाउस का माहौल बदलने लगा था। वहाँ अब पैसे की खनक से ज्यादा अपनों के हंसने की गूंज सुनाई देने लगी थी। 

और इस सब का श्रेय समर ने उस लड़की को दिया जिसने उसे बिना देखे ही सबसे करीब से जान लिया था। एक दिन समर अपने पूरे परिवार को लेकर उस आश्रम में पहुंचा। बलवंत सिंह और मृदुला देवी शुरुआत में थोड़े झिझक रहे थे, लेकिन जब वे नंदिनी से मिले, तो उसकी सादगी और उसके विचारों की पवित्रता ने उनके सारे अहंकार को पिघला दिया। नंदिनी के छुअन और उसकी बातों में जो वात्सल्य था, उसने उस रसूखदार परिवार को भी नतमस्तक कर दिया। 

समर ने अपने माता-पिता के सामने नंदिनी का हाथ थाम लिया। “पापा, माँ… इसने मेरी दुनिया को वो रोशनी दी है जो मेरे पास सब कुछ होने के बाद भी नहीं थी। मैं अपना बाकी का जीवन इसी की आँखों से देखना चाहता हूँ।”

बलवंत सिंह ने आगे बढ़कर नंदिनी के सिर पर हाथ रखा और पहली बार उनके चेहरे पर एक सच्चे और भावुक पिता की मुस्कान थी। नंदिनी की वो दृष्टिहीन आँखें भले ही दुनिया के रंग नहीं देख सकती थीं, लेकिन उन्होंने एक टूटते हुए परिवार को प्यार के वो रंग दे दिए थे, जो कभी फीके नहीं पड़ने वाले थे। समर को अब किसी और की तलाश नहीं थी, क्योंकि उसकी रूह की आहट पहचानने वाली अब हमेशा के लिए उसकी हो चुकी थी।

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लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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