जो बोया वही पाया – अरुणा गर्ग

मालाजी के परिवार में उनके सास ससुर और पति ,दो बच्चे थे।वे एक तेज स्वभाव की महिला थी।जब तक उनकी सास से बनी वे बहू की पूरी मदद करतीं।माला भी अच्छी बन सहयोग ले लेती। अचानक उनकी सास को लकवे की शिकायत हो गई । उनके हाथ पैर अब कमजोर हो गये फिर भी वे … Read more

जो बोओगे वह काटोगे। – मधु वशिष्ठ

बिस्तर पर लेटे हुए ही गला सूखने लगा, घबराहट सी बढ़ने लगी।  पास में रखा पानी पिया तो उल्टी के कारण मन खराब हो रहा था किसी तरह से बॉथरूम तक पहुंची, उल्टी से सारा बाथरूम सब कुछ खराब हो गया था, बहुत मुश्किल से खुद को संभाला, किसी तरह से आकर बिस्तर पर लेटी, … Read more

विषमता में समता ढूँढती लेखिका – रश्मि वैभव गर्ग

भरा,पूरा परिवार था मेरा.. एक बेटा ,एक बेटी, सास -ससुर का सानिध्य..खुद से भी ज्यादा चाहने वाला पति, संपन्नता …सब कुछ तो था ..जो एक गृहिणी अपने जीवन में चाहती है… बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद से सिंचित आशियाना ..जिसमें न केवल अपने सास ससुर ,बल्कि उनके मित्रों के आशीर्वाद से भी पूर्णतः संतृप्त रहती थी … Read more

कर्मों का फल – गीता वाधवानी

 अरे! यह तो वही है ना, हां लग तो रही है। एक औरत ने दूसरी से कहा। ” यही तो है कर्मों का फल, जो बोया वही पाया, हां सुमन, तुम ठीक कह रही हो। ”   सड़क पर खड़ी दो औरतों की यह बातचीत थी।      वह सड़क के किनारे मरी पड़ी थी। उसके दोनों हाथ … Read more

*जो बोया वही पाया* – पुष्पा जोशी

‘सुजाता ओ सुजाता जरा रूकों ना’ शोभा जी ने आवाज लगाई मगर शायद सुजाता जी ने सुना नहीं।  शोभा जी प्रात:कालीन भ्रमण करके घर लौट रही थी, आज कई दिनों के बाद, उन्हें उनकी सहेली सुजाता नजर आई और वे उसे आवाज लगा रही थी। उन्होंने अपनी चाल कुछ तेज कर दी वे सुजाता से … Read more

ज़ुबान की मर्यादा – महक दुआ

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा। वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना … Read more

माँ का अपमान – वर्षा मंडल

“मम्मी जी! कहां छुप कर बैठ गई हैं आप?” शिखा ने रसोई के दरवाजे से लगभग चीखते हुए अपनी सास रमा जी को आवाज लगाई। उसकी आवाज में इतना गुस्सा और कड़वाहट थी कि पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। “क्या हुआ बहू? क्यों इतना चिल्ला रही हो?” रमा जी अपने हाथ … Read more

बहू मायके से दूरी बनाकर रखो – आरती देवी 

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं। शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था … Read more

परिवार की नींव – सीमा श्रीवास्तव 

बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन सत्तर वर्षीय सावित्री देवी के इस चार कमरों वाले आलीशान फ्लैट में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की टिक-टिक आज हथौड़े की तरह उनके कानों पर बज रही थी। आज उनके इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी … Read more

समाज का डर – नेहा पटेल

रघुनाथ जी के कदम आज इतने भारी लग रहे थे जैसे उनके पैरों में मन भर का सीसा बांध दिया गया हो। साठ साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेडमास्टर होने के नाते पूरे मोहल्ले में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा थी। लोग उनके आगे … Read more

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