कर्ज – निधि गुप्ता
देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था। सूरज ढलने को … Read more