विषमता में समता ढूँढती लेखिका – रश्मि वैभव गर्ग

भरा,पूरा परिवार था मेरा.. एक बेटा ,एक बेटी, सास -ससुर का सानिध्य..खुद से भी ज्यादा चाहने वाला पति, संपन्नता …सब कुछ तो था ..जो एक गृहिणी अपने जीवन में चाहती है… बड़े बुजुर्गों के आशीर्वाद से सिंचित आशियाना ..जिसमें न केवल अपने सास ससुर ,बल्कि उनके मित्रों के आशीर्वाद से भी पूर्णतः संतृप्त रहती थी मैं.. सबकी प्यारी बहू थी मैं..।

शुरुआती समय ,परिवार में सामंजस्य बिठाने में कुछ कठिनाई भरा रहा ,लेकिन धीरे-धीरे ,सब की चहेती बन गई थी मैं.।दामन सदैव आशीषों से भरा रहता था। एक ही छत के नीचे बच्चे, बूढ़े और जवान तीनों का साथ था.. अक्सर परिवार में आमोद प्रमोद का माहौल हुआ करता था ..दोनों बच्चे मानो चारों बड़ों की आंखों के तारा थे.. ।

लेकिन कहते हैं ना कि जीवन समग्र नहीं चलता.. जीवन का नाम ही संघर्ष है.. सब कुछ हासिल हो जाए तो वह आदर्श बन जाता है ,और आदर्श कभी मिला नहीं करता,, मिल जाए तो वो ठहरा नहीं करता.. ऐसा ही एक तूफान मेरी जिंदगी में आया ,और सब कुछ ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

2021 में कोरोना में मेरे पति और मेरी सास की दो दिन के अंतराल से मृत्यु हो गई.. मृत्यु के निर्मम प्रहार ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया.. मैं स्वयं मृत्यु का आलिंगन करना चाहती थी, लेकिन सामने खड़ी जिम्मेदारियां जीने को विवश करती थीं। लेकिन कितना ही गहन अंधकार हो ,कोई जुगनू सी रोशनी ,अवश्य ही दिखाई देती है l

ऐसी ही एक उम्मीद की रोशनी ,लेखन..मेरी जिंदगी में आई और जीने की वजह मिल गई..। मेरे कुछ प्रिय जनों ने मुझे अत्यंत उत्साह दिया और धीरे-धीरे मेरी लेखनी की रफ्तार बढ़ती गई। यदा कदा लिखने वाली मैं ,प्रतिदिन सृजन करने लग गई।

मेरी तीन पुस्तकें आ चुकी हैं , तीसरी राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित है । मेरी कई रचनाऐं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ साहित्यिक पुरुस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं।आकाशवाणी पर भी मेरी कविताएँ प्रसारित हो चुकी हैं।

उपलब्धियां मायने नहीं रखती है..शिखर तो हमेशा खाली ही रहता है.. मायने रखता है ,कठिन समय में उम्मीद की रोशनी मिलना ।एक सकारात्मक सोच के साथ जीवन का आगे बढना। नौकरी, लेखन और घर की जिम्मेदारियों ने मुझे इतना व्यस्त कर दिया है कि ,मुझे पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिलता।

वयोवृद्ध ससुर जी का साया सर पर है ,उन्हीं के वट वृक्ष की छाया में नए पौधे यानी मेरे बच्चे पल्लवित हो रहे हैं ..मैं मध्यस्थ कड़ी ,जब उस वट वृक्ष की छाया में नए पौधों का पल्लवन देखती हूं ..तो विषमता में भी समता ढूंढ लेती हूँ। लेखन ने मुझे न केवल जीने की वजह दी ,बल्कि मेरे अंदर आत्मविश्वास भी बढ़ाया ।

मैं अपनी लेखनी से विधाओं की परिधि से दूर,जीवन की विधा लिखना चाहती हूं.. मैं ऐसे साहित्य का सृजन करना चाहती हूं ,जिसमें लोग अपना अक्स देखें। मैं लेखन से ख़ुद को तराशकर ,लोगों के जीवन को सँवारना चाहती हूँ..अपनी लेखनी को लोगों का संबल बनाना चाहती हूं।

लेखन मेरी रूह में बसता है और मैं इसे प्रेरणा बनाना चाहती हूँ। मैं लोगों को यही संदेश देना चाहती हूँ कि कितना भी विपरीत समय हो उम्मीद का दामन न छोड़ें, गहन अंधकार में भी उम्मीद की कोई न कोई रोशनी अवश्य आती ही है ।

सृष्टि की भाँति जीवन के भी दो पहलू हैं । उजला पक्ष और अंधेरा पक्ष । दोनों ही शाश्वत नहीं हैं । एक के बाद दूसरा पक्ष आता ही है । इसलिए जब जीवन में अंधकार आए तो रोशनी का इंतज़ार करें ।

पति और सास की मृत्यु से मैं टूट गई थी ,लेकिन मैंने धैर्य रखा और आज मैं जॉब करती हूँ, घर संभालती हूँ ,साथ ही लेखन कार्य भी करती हूँ । मेरी लेखनी अनेक लोगों का हौंसला बनती है ।मन के भाव ,लेखनी में उतरते चले गए और लेखनी मेरा हथियार बनती चली गई । निज़ी डायरी से हुई लेखन की शुरुआत, लोगों की कहानी बुनती चली गई ।

मेरी कहानियों में मेरे इर्द गिर्द के किरदार धड़कते हैं, जिन्हें लिखने से पहले मैं ख़ुद जीती हूँ, फिर लिखती हूँ । लोग मुझे अपनी कहानी सुनाने ख़ुद आते हैं ।

बतौर लेखिका मुझे शहर के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाने लगा है । एक नई पहचान मुझे आत्मविश्वास से भरती है ,साथ ही मुझे कुछ नया लिखने का जोश भी देती है ।

शुरुआती समय में लेखन बुरा लगता था, एक काम लगता था …लेकिन उस समय की मेहनत, आज मेरी ताक़त बन गई ।

कहते हैं ज़िन्दगी जब परीक्षा लेती है तो सब तरफ़ से लेती है । ऐसा ही मेरे साथ हुआ । पति एवम सास की मृत्यु के एक साल बाद ही ,मेरे पैर में फ्रैक्चर हो गया ।

मैं बिस्तर पर आ गई । समय काटना मुश्किल हो गया । कुछ दिन परेशान होने के बाद, मैंने एक धारावाहिक कहानी प्रतियोगिता में भाग लिया,साथ ही कुछ अच्छा साहित्य भी पढ़ा, जिससे मेरी लेखनी निखरती चली गई ,

फलस्वरूप मुझे प्रतियोगिता में तृतीय स्थान मिला । फ्रैक्चर में बिस्तर पर ही रोज़ एक एपिसोड लिखती थी ,जिससे मेरा समय भी कट गया और पुरुस्कार भी मिला ।

फिर मेरे लेखन का सफ़र थमा नहीं और मैं आगे बढ़ती गई । मुझे हाल ही में नारी शक्ति सम्मान भी दिया गया है ,जो मेरे संघर्ष में ,मेरे हौंसले को बढ़ाता है ।

आज मैं एक आत्मनिर्भर और सशक्त महिला हूँ । विपत्ति में मैंने यदि धैर्य न रखा होता ,तो मैं अवसाद ग्रस्त हो जाती । आसान नहीं था ,एक गृहणी से लेखिका बनने का सफ़र । इस सफ़र में अनेकों मुश्किल आईं ,लेकिन मेरी व मेरे परिजनों की हिम्मत से ,मैं आज लोगों का हौसला हूँ ।

ज़िन्दगी ने मुझे कड़ी चुनौती दी लेकिन मैंने साहस रखा । एक नए सिरे से जीवन जीना शुरू किया ।गृहकार्य संभालने वाली गृहणी से ,कामकाजी महिला बनी, साथ ही लेखन कार्य भी शुरू किया । सदैव घर में रहने वाली मैं ,घर की चौखट से बाहर निकली ।

बाहर की दुनियाँ इतनी सरल नहीं होती है । लेकिन मैंने हौसला नहीं खोया और घर और बाहर दोनों जगह की जिम्मेदारी संभाली ।

आज मैं बच्चों के साथ घूमने भी जाती हूँ । कुछ विदेश यात्राएँ भी की हैं । साहित्यिक गतिविधियों में भी जाती हूँ । मैं अपने अतीत से प्यार करती हूँ ,लेकिन वो मेरी कमज़ोरी नहीं बल्कि मेरी ताक़त है ।आज मैं यादों के साथ अपने वर्तमान को जीती हूँ । कभी कभी अपनी स्कूल दोस्तों के साथ भी घूमने जाती हूँ ।

मैं अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करती हूँ ,साथ ही अपने आप को भी समय देती हूँ । समय समय पर सजती संवरती भी हूँ , ताकि मुझे किसी तरह की कमी महसूस न हो ।

आज जीवन की कड़ी चुनौती को पार करके ,मैं इस मुकाम पर हूँ ,जो न केवल मुझमें आत्म विश्वास देता है वरन् उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनता है,जिनके पति असमय दुनियाँ से रुख़सत हो गए । ज़िन्दगी कहीं से भी दोबारा शुरू हो सकती है ,बस हौसला बनाए रखना चाहिए ।

मैं संतुष्ट और खुश हूँ कि मैंने आपदा को अवसर बनाया ।एक गृहणी से लेखिका बनने का सफ़र तय किया । साथ ही घर और जॉब की दोहरी जिम्मेदारी निभाई ।अपने परिवार और अपने आप को भी खुश रखा ।

जीवन कभी भी सम नहीं चलता, विषमताएँ आती ही हैं । विषमता में धैर्य से ख़ुद को समझना चाहिए फिर आगे बढ़ना चाहिए । हिम्मत से काम लेकर अपना रास्ता तय करना चाहिए । मेरा अतीत प्रेम से पगा हुआ था, पति का साथ छूटा तो लगा, जिंदगी बंजर हो गई ।

मैंने लेखनी से अपने दुख को बयाँ किया, साथ ही जॉब शुरू किया । दोनों ही कार्यों ने मेरी ज़िंदगी को नई दिशा दी ।आज मेरे जीवन की बंजर भूमि पर लेखनी के अल्फ़ाज़ खिलें हैं , जॉब में प्रमोशन हो गया है । मैं अपनी ज़िंदगी को जीना सीख गई हूँ । मेरे सूखे अधर मुस्कुराना सीख गए हैं । मेरी निरीह आँखों में सपने सजने लगे हैं ।मैं अपनी जिंदगी की रानी हूँ, जिसे मैंने हौंसलों से सँवारा है ।

रहूँ न रहूँ मैं … चमका करूँगी.. . बन के रश्मि… जीवन के आकाश में…!

रश्मि वैभव गर्ग

कोटा 

विषय-ज़िन्दगी की दूसरी पारी

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