ज़ुबान की मर्यादा – महक दुआ

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा।

वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना पर्स उठा रही थी।

सुनीता ने चेहरे पर एक अजीब सी कुटिल मुस्कान लाते हुए और अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “इसमें मर्यादा कैसी अंजलि जी? जो सच है, मैं तो बस वही कह रही हूँ। शादी के बाद बेटियां अपने ससुराल में भली लगती हैं। आपका जब मन करता है, आप मायके दौड़ी चली आती हैं।

मुझे पता है कि आपकी नज़र माँ जी के उन पुश्तैनी गहनों और इस घर के हिस्से पर है। ननद होकर भी आप इतनी चालाकी पर उतर आई हैं कि रोज आकर माँ जी की सेवा का दिखावा करती हैं। कोई ऐरा-गैरा भी शायद ऐसी चालबाजी न करे।”

अंजलि के कदम वहीं दरवाजे पर ठिठक गए। पिछले छह महीनों से वह जो कुछ भी इस घर में सह रही थी, आज उसका बांध टूट गया था। अंजलि के भाई, विकास का अपना एक बड़ा व्यापार था जिसके कारण वह अक्सर शहर से बाहर रहता था।

उनकी माँ, सावित्री देवी, पिछले कई महीनों से गंभीर गठिया (आर्थराइटिस) और उम्र संबंधी बीमारियों के कारण बिस्तर पर थीं। उनके हाथ-पैरों ने काम करना लगभग बंद कर दिया था। सुनीता, जो विकास की पत्नी थी, घर के बाकी कामों में तो निपुण थी, लेकिन एक बीमार सास की शारीरिक सेवा करना उसे बोझ लगता था।

अंजलि ने अपना पर्स वापस मेज पर रखा और पलटकर सुनीता की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “सुनीता भाभी, आप यह बात बहुत अच्छी तरह जानती हैं कि मैं यहाँ रोज क्यों आती हूँ।

लेकिन आपने अपनी आँखों पर स्वार्थ और पैसों की ऐसी पट्टी बांध रखी है कि आपको एक बेटी का दर्द और एक माँ की लाचारी दिखाई ही नहीं देती। आप कहती हैं न कि मैं लालच में यहाँ आती हूँ? तो चलिए, आज इस लालच का हिसाब भी कर ही लेते हैं।”

सुनीता थोड़ा सकपकाई, लेकिन फिर भी अपनी अकड़ कायम रखते हुए बोली, “हाँ-हाँ, कर लीजिए हिसाब। मुझे भी तो पता चले कि रोज अपनी सास और पति को छोड़कर यहाँ चार-चार घंटे बिताने के पीछे आपका कौन सा महान उद्देश्य छिपा है।”

अंजलि की आँखों से अब आंसू बह निकले थे, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। “भाभी, आप माँ जी के कमरे में दिन में सिर्फ दो बार जाती हैं, एक बार सुबह चाय का कप उनके साइड टेबल पर रखने और दूसरी बार रात का खाना वहीं टेबल पर छोड़कर आ जाने के लिए।

क्या आपने कभी यह मुड़कर देखा कि जिस माँ के हाथों की उंगलियां गठिया के कारण मुड़ चुकी हैं, वो खुद अपने हाथों से निवाला कैसे तोड़ती होंगी? क्या आपने कभी देखा कि वो गर्म चाय उनके कांपते हाथों से गिरकर उनके कपड़ों पर गिर जाती है और वो उसी गीले बिस्तर पर घंटों पड़ी रहती हैं?”

सुनीता का चेहरा अब हल्का पड़ने लगा था। उसने नज़रें चुराने की कोशिश की, लेकिन अंजलि ने बोलना जारी रखा।

“मैं यहाँ रोज दोपहर में अपना घर का काम खत्म करके सिर्फ इसलिए आती हूँ ताकि अपनी माँ को अपने हाथों से खाना खिला सकूं। मैं यहाँ इसलिए आती हूँ ताकि उनके कपड़े बदल सकूं, उनके उलझे बालों में कंघी कर सकूं और उनके पैरों की मालिश कर सकूं, क्योंकि मैं जानती हूँ कि इस घर में उनके पास इतनी फुर्सत किसी को नहीं है।

विकास भइया अपने काम में उलझे हैं और आपको अपनी किटी पार्टीज और टीवी सीरियल्स से फुर्सत नहीं है। मेरी माँ, जिसने इस पूरे घर को अपने खून-पसीने से सींचा है, आज अपने ही घर में एक लावारिस की तरह पड़ी हैं। और आप कहती हैं कि मैं लालच के लिए आती हूँ?”

अंजलि ने अपने पर्स से एक चाबियों का गुच्छा निकाला और उसे सुनीता के सामने मेज पर पटक दिया।

“ये रही माँ जी के बैंक लॉकर और उस अलमारी की चाबियां, जिनमें वो पुश्तैनी गहने और घर के कागज़ात रखे हैं,” अंजलि ने लगभग कांपती हुई आवाज़ में कहा। “आपको लगता है न कि मुझे इन गहनों का लालच है? भाभी, आज से दो महीने पहले ही माँ जी ने विकास भइया को बुलाकर यह पूरा घर आपके और भइया के नाम कर दिया था।

और वो सारे गहने, जिन्हें आप मेरा लालच समझ रही हैं, माँ जी ने अपनी वसीयत में मेरी बेटी के बजाय आपकी बेटी के नाम लिख दिए हैं। मैंने ही माँ जी से ऐसा करने की ज़िद की थी, ताकि आपके मन में कोई असुरक्षा की भावना न रहे और आप मेरी माँ को बोझ न समझें।”

सुनीता की आँखें अब फटी की फटी रह गई थीं। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस ननद को वह जायदाद की भूखी समझकर रोज ताने मारती थी, वह तो अपना सारा हक पहले ही इस घर की शांति के लिए कुर्बान कर चुकी थी।

अंजलि ने एक गहरी सांस ली और अपने आंसू पोंछे। “भाभी, बेटियां जब मायके आती हैं न, तो उन्हें ईंट-पत्थर के इस मकान या तिजोरी में रखे सोने से कोई लगाव नहीं होता। उन्हें लगाव होता है उस आंगन से जहाँ उन्होंने चलना सीखा था, और उस माँ की सांसों से जो इस घर की दीवारों को जिंदा रखे हुए है। मुझे आपका एक रुपया नहीं चाहिए।

जिस दिन मेरी माँ अपनी आँखें मूंद लेंगी, आप यकीन मानिए, मैं इस गली का रास्ता भी भूल जाऊंगी। लेकिन जब तक मेरी माँ जिंदा हैं, मैं उनके शरीर का दर्द बांटने रोज आऊंगी। और अगर आपको यह मेरा लालच लगता है, तो हाँ, मैं लालची हूँ… अपनी माँ के प्यार की, उनके आशीर्वाद की और उनके चेहरे की उस सुकून भरी मुस्कान की, जो मुझे देखकर उनके होंठों पर आती है।”

इतना कहकर अंजलि ने अपना पर्स उठाया और मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़ गई।

सुनीता वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी। उसके भीतर का सारा अहंकार, सारा लालच अंजलि के निस्वार्थ प्रेम और बलिदान के आगे चूर-चूर हो गया था। उसे एहसास हो गया था कि उसने रिश्तों की कितनी गलत कीमत लगाई थी। सुनीता की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। वह दौड़कर दरवाज़े तक गई और उसने अंजलि का हाथ पकड़ लिया।

“मुझे माफ कर दो अंजलि,” सुनीता फूट-फूट कर रोने लगी। “मैं पैसों के लालच में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तुम्हारी ममता और माँ जी की तकलीफ दिखाई ही नहीं दी। तुम कोई बाहर वाली नहीं हो, तुम इस घर की आत्मा हो। आज के बाद तुम्हें माँ जी की सेवा अकेले नहीं करनी पड़ेगी। ये तुम्हारी भाभी का वादा है।”

अंजलि ने अपनी भाभी को गले लगा लिया। उस दिन उस घर में सिर्फ एक गलतफहमी नहीं टूटी थी, बल्कि दो औरतों के बीच एक ऐसा रिश्ता जुड़ गया था जिसकी बुनियाद में सिर्फ और सिर्फ सच्चा प्यार और सम्मान था।

क्या आपने भी कभी अपने आस-पास ऐसे लोगों को देखा है जो निस्वार्थ सेवा को लालच का नाम दे देते हैं? एक बेटी के इस निःस्वार्थ प्रेम पर आपकी क्या राय है? अपने विचार ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : महक दुआ

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