“मम्मी जी! कहां छुप कर बैठ गई हैं आप?” शिखा ने रसोई के दरवाजे से लगभग चीखते हुए अपनी सास रमा जी को आवाज लगाई। उसकी आवाज में इतना गुस्सा और कड़वाहट थी कि पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया।
“क्या हुआ बहू? क्यों इतना चिल्ला रही हो?” रमा जी अपने हाथ का काम छोड़-छाड़ कर हांफती हुई बालकनी से दौड़ती-भागती अंदर आईं। वे वहां बैठकर शिखा और अपने बेटे रोहन के सूखे हुए कपड़े तह कर रही थीं। उम्र के इस पड़ाव पर घुटनों के दर्द के बावजूद वे घर के हर छोटे-बड़े काम में हाथ बंटाती थीं ताकि उनकी नौकरीपेशा बहू को कोई तकलीफ न हो।
“मम्मी जी, आज इस कांच के जार में से काजू और बादाम आधे से ज्यादा गायब हैं। कहां गए ये महंगे मेवे?” शिखा ने खाली होते डिब्बे को हवा में लहराते हुए रमा जी की ओर खा जाने वाली नजरों से देखते हुए पूछा।
“बहू… वो… मैंने…” रमा जी के होंठ सूखे जा रहे थे। शिखा के चीखने के अंदाज और उसके गुस्से को देखकर आगे के शब्द रमा जी के मुंह में ही फंसकर रह गए। वे घबराहट के मारे कुछ बोल ही नहीं पाईं और उनकी नजरें जमीन की तरफ झुक गईं।
“यह क्या वो-वो लगा रखा है? एक सीधा सा जवाब देने में भी आफत आ रही है आपको? जरूर आपने ही अकेले बैठकर गुलछर्रे उड़ाए होंगे! सोचा होगा कि बहू तो सुबह-सुबह ऑफिस चली ही जाती है, पीछे से मैं कुछ भी खाऊं-पिऊं, किसे पता चलेगा?
चंद पैसों की कमाई क्या करने लगी हूं, आपको तो लगने लगा है कि इस घर में मुफ्त का माल आ रहा है। दिन भर घर में बैठकर बस खाने-पीने की ही सूझती है आपको!” शिखा ने सास-बहू के रिश्ते की मर्यादा की सारी हदें पार करते हुए फिर से चिल्लाकर कहा।
शिखा को अपनी तनख्वाह और अपनी आधुनिकता पर बहुत घमंड था, और उसे अक्सर लगता था कि उसकी सास उस पर एक बोझ हैं।
रमा जी की आंखों से आंसू छलक पड़े। जिस घर को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था, आज उसी घर में एक मुट्ठी खाने के लिए उन पर चोरी का इल्जाम लगाया जा रहा था।
वे अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछने लगीं, लेकिन शिखा का गुस्सा शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
“शिखा! अपनी जुबान पर लगाम लगाओ। तुम भूल रही हो कि तुम किससे और क्या बात कर रही हो। बहू हो, इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हें अपनी सास को इस तरह जलील करने का लाइसेंस मिल गया है। वो तुम्हारी सास हैं, कोई नौकरानी नहीं!”
तभी पीछे से रोहन की भारी और कड़कती हुई आवाज गूंजी। रोहन अभी-अभी ऑफिस से लौटा था और दरवाजे पर खड़ा होकर अपनी पत्नी का यह भयानक रूप देख रहा था।
शिखा अपने पति को देखकर भी नहीं रुकी। “मैं गलत क्या कह रही हूं रोहन? कल शाम को ही मैं दो किलो महंगे मेवे लेकर आई थी। आज आधा डिब्बा खाली है। घर में तीसरा कोई है नहीं। क्या हवा खा गई इन्हें? अगर इन्हें खाने का इतना ही शौक था तो मुझसे मांग लेतीं, ऐसे चोरों की तरह छुपकर खाने की क्या जरूरत थी?”
रोहन ने अपनी मां की तरफ देखा, जो अपमान के बोझ तले दबी, कांपते हुए खड़ी थीं। रोहन का दिल अपनी मां की इस हालत को देखकर छलनी हो गया। वह बिना कुछ कहे सीधे रसोई के अंदर गया। उसने गैस के पास वाले कैबिनेट को खोला और उसमें से एक बड़ा सा स्टील का डिब्बा निकालकर बाहर ले आया। उसने वह डिब्बा शिखा के ठीक सामने डाइनिंग टेबल पर जोर से रख दिया।
“खोल कर देखो इसे शिखा,” रोहन ने बहुत ही ठंडी लेकिन चुभने वाली आवाज में कहा।
शिखा ने झिझकते हुए उस डिब्बे का ढक्कन खोला। जैसे ही ढक्कन हटा, उसमें से देसी घी, भुने हुए काजू-बादाम, मखाने और गोंद की एक बहुत ही सोंधी और मीठी महक बाहर आई। डिब्बा एकदम ताजी बनी हुई ‘पंजीरी’ से भरा हुआ था। शिखा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
“ये… ये क्या है?” शिखा ने हकलाते हुए पूछा।
रोहन की आंखों में भी अब नमी आ चुकी थी। “ये तुम्हारी उस घटिया सोच का जवाब है शिखा। मां ने तुम्हारे वो महंगे मेवे चोरी करके अपने पेट में नहीं भरे हैं। पिछले कई हफ्तों से तुम ऑफिस के काम की वजह से अपनी कमर के दर्द और कमजोरी की शिकायत कर रही थी। कल रात तुमने दर्द के मारे खाना भी ठीक से नहीं खाया था। मां को तुम्हारी फिक्र थी। आज सुबह चार बजे उठकर, जब तुम गहरी नींद में सो रही थी, तब मां ने अपने घुटनों के दर्द की परवाह किए बिना रसोई में खड़े होकर ये पंजीरी तुम्हारे लिए तैयार की है। वो जानती थीं कि तुम दिन भर बाहर खटती हो, तुम्हें ताकत की जरूरत है। ये मां का प्यार है शिखा, जिसे तुम्हारी पैसों की अंधी आंखों ने चोरी का नाम दे दिया।”
शिखा के हाथों से वो डिब्बे का ढक्कन छूटकर नीचे गिर गया। उसके पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई। जिन हाथों को वह लालची और चोर समझ रही थी, वे हाथ तो उसकी खुद की सेहत और सलामती के लिए दुआएं मांगते हुए मेहनत कर रहे थे। उसे अपने कहे गए एक-एक कड़वे शब्द याद आने लगे। ‘मुफ्त का माल’, ‘गुलछर्रे उड़ाना’, ‘चोरी करना’… शिखा को अपनी ही परछाई से घिन आने लगी।
रमा जी ने धीरे से आगे बढ़कर शिखा के कंधे पर हाथ रखा और बेहद रुंधे हुए गले से बोलीं, “बेटा, तू दिन भर बाहर काम करती है, थक जाती है। तेरा उतरा हुआ चेहरा मुझसे देखा नहीं गया। गांव में हमारी सासें कमर दर्द के लिए यही पंजीरी बनाती थीं। मुझे लगा कि मैं तुझे सरप्राइज दूंगी तो तू खुश हो जाएगी और तेरा दर्द भी कम हो जाएगा। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची, मुझे तेरी लाई हुई इतनी महंगी चीजों को बिना पूछे हाथ नहीं लगाना चाहिए था। मैं कल ही गांव वापस चली जाऊंगी, तू बस अपना घर खुशहाली से बसा ले।”
एक बूढ़ी और अपमानित मां के मुंह से ये क्षमा के शब्द सुनकर शिखा के सब्र का बांध टूट गया। वह फूट-फूट कर रोने लगी और सीधे रमा जी के पैरों में गिर पड़ी।
“नहीं मम्मी जी, नहीं! मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपने अहंकार और पैसों के घमंड में अंधी हो गई थी। मैंने एक मां के निस्वार्थ प्यार को अपनी गंदी सोच के तराजू में तौल दिया। मैं कितनी नीच हूं कि जिस इंसान ने मेरी तकलीफ दूर करने के लिए अपनी नींद हराम की, मैंने उसी को चोर कह दिया। आप कहीं नहीं जाएंगी। ये घर आपका है। अगर कोई इस घर से जाने लायक है, तो वो मैं हूं।”
शिखा ने अपनी सास के पैर कसकर पकड़ लिए और बच्चों की तरह सुबकने लगी।
रमा जी का दिल बहुत बड़ा था। उन्होंने अपनी बहू को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने शिखा के आंसू पोंछते हुए कहा, “पागल लड़की, घर की बातें घर में ही खत्म हो जानी चाहिए। मां-बेटी में कैसी माफी? जा मुंह धो ले, मैं तेरे लिए गरम चाय और ये पंजीरी लेकर आती हूं।”
उस दिन शिखा को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक मिल गया था। डिग्रियों और पैसों का गुरूर एक मां के निस्वार्थ प्रेम के आगे कितना बौना होता है, यह उसने आज अपनी आंखों से देख लिया था। उस रात के बाद से शिखा ने कभी अपनी सास को ‘मम्मी जी’ सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि दिल से मानकर पुकारा।
क्या आपके जीवन में या आपके आस-पास भी कभी ऐसा हुआ है जब अपनों के प्यार को समझने में भूल हो गई हो? अक्सर हम बाहरी दिखावे और अपने तनाव में इतने खो जाते हैं कि घर के बड़े-बुजुर्गों का मौन और उनका निस्वार्थ प्रेम हमें दिखाई ही नहीं देता।
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लेखिका : वर्षा मंडल