अरे! यह तो वही है ना, हां लग तो रही है। एक औरत ने दूसरी से कहा। ” यही तो है कर्मों का फल, जो बोया वही पाया, हां सुमन, तुम ठीक कह रही हो। ”
सड़क पर खड़ी दो औरतों की यह बातचीत थी।
वह सड़क के किनारे मरी पड़ी थी। उसके दोनों हाथ कटे हुए थे।
कुछ वर्ष पहले उनके पड़ोस में रहने वाले सिद्धार्थ की शादी कशिश के साथ हुई थी। कशिश के रूप में सचमुच कशिश थी, जो कोई उसे देखता, देखता ही रह जाता।
कशिश के मम्मी पापा ने उसकी शादी अखिल से करवाई थी, लेकिन वह राहुल से शादी करना चाहती थी। शादी के बाद उसने अखिल पर मारपीट के आरोप लगाकर तलाक ले लिया और अच्छी खासी रकम भी वसूल कर ली। मायके आकर वह छुप कर राहुल से मिलने लगी और इधर कशिश का भाई निकम्मा रंजीत तलाक में मिली रकम देख कर पागल हो गया था।
अब उसने अपने अमीर दोस्त नीरव के सामने कशिश की सुंदरता और अकेलेपन का बखान करना शुरू कर दिया था। नीरव अकेला था।उसके माता-पिता का देहांत हो चुका था। नीरव एक बार कशिश से मिला और उसकी सुंदरता पर मोहित हो गया। उसने कशिश से शादी कर ली।
इतनी सुंदर पत्नी पाकर वह बहुत खुश था और कशिश से बहुत प्यार करता था, लेकिन जानवरों के मुंह खून लग चुका था।
कशिश और रंजीत ने मिलकर धोखे से ऑफिस की फाइल में प्रॉपर्टी के कागज लगाकर नीरव से हस्ताक्षर करवा लिए और उसका बंगला कशिश के नाम करवा लिया और साथ ही तलाक के कागजों पर भी चुपचाप साइन करवा लिए। जब तक नीरव को सच्चाई का पता लगा तब तक उन्होंने बंगला बेच भी दिया और शहर बदल लिया।
इस धोखे से नीरव को हार्ट अटैक आया और वह चल बसा। भाई बहन दोनों खुश हो गए कि चलो, बला टली। गीता वाधवानी
वे दोनों माता-पिता सहित लखनऊ आ गए और वहां जाकर सिद्धार्थ को फंसाया और अब कशिश ने राहुल से किनारा कर लिया था क्योंकि राहुल के पास कोई पैसा नहीं था। सिद्धार्थ अपनी मां के साथ रहता था।
कशिश की शादी सिद्धार्थ से हो गई। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। कुछ समय बाद कशिश गर्भवती हो गई थी। वैसे वह प्रेग्नेंट होने से बचती थी लेकिन इस बार वह दवाई खाना भूल गई थी।
उसका भाई रंजीत उसके ऊपर चिल्ला रहा था। ” दिमाग खराब हो गया है तेरा, ध्यान नहीं रख सकती थी ”
कशिश-” चिल्ला मत, बच्चा भी हमारा मददगार साबित होगा। बस तू देखता जा। ”
कशिश के माता-पिता बच्चों को सही राह पर लाने की बजाय उनके साथ शामिल हो गए थे क्योंकि उन्हें भी लग्जरी लाइफ और पैसे का चस्का लग चुका था।
सही समय आने पर कशिश ने एक प्यारी सी बिटिया को जन्म दिया। सिद्धार्थ और उसकी मां बहुत खुश थे और उन्होंने बिटिया का नाम प्राची रखा।
उसके जन्म के कुछ समय बाद कशिश, सिद्धार्थ पर दबाव बनाने लगी कि तुम्हारी मां मुझे चैन से रहने नहीं देती, टोका टाकी करती रहती है, तुम उन्हें वृद्ध आश्रम छोड़ आओ। ”
सिद्धार्थ ने साफ मना कर दिया। ” मेरी मां मेरे लिए सब कुछ है,बहुत कठिनाइयों से उन्होंने मुझे पाला पोसा है। मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकता। ”
तब कशिश ने प्राची को गोद में लेकर, उसके गले पर दबाव डालते हुए कहा -” मेरी बात नहीं मानोगे तो मैं इसे जान से मार दूंगी। ”
सिद्धार्थ कशिश का यह रूप देखकर टेंशन में आ गया था।
उसने कहा-” कैसी माँ हो तुम, अपनी बच्ची के साथ कैसी हरकत कर रही हो। आज मुझे पता चला कि तुम सिर्फ सूरत से सुंदर हो,सीरत से नहीं। ”
कशिश -” जो भी हूँ, तुम्हारे सामने हूं। बोलो क्या कहते हो? ”
सिद्धार्थ ने उस समय कोई जवाब नहीं दिया। उसने अगले दिन पूरी बात अपनी मां को सच-सच बता दी।
मां ने कहा-” बेटा इसका कोई भरोसा नहीं, कहीं यह सचमुच प्राची को कोई नुकसान न पहुंचा दे, ऐसा करते हैं मैं चली जाती हूं। ”
सिद्धार्थ-“पर माँ। ”
तब सिद्धार्थ की मां ने धीरे से उसे कुछ समझाया।
अगले दिन सिद्धार्थ ने कशिश से कहा-” मैं मां को वृद्ध आश्रम छोड़कर अभी आता हूं। ”
कशिश ने उसके जाने के बाद तुरंत अपने माता-पिता और भाई को बुला लिया। सिद्धार्थ अपनी मां को छोड़ आया। गीता वाधवानी
वापस आकर वह बहुत उदास था। उसने नोटिस किया कि कशिश, प्राची की तरफ कोई ध्यान नहीं देती है। सिद्धार्थ ने उसकी देखभाल के लिए एक आया रख दी थी। वह सिद्धार्थ के ऑफिस से वापस आने तक प्राची का पूरा ध्यान रखती थी। कशिश के मायके वाले सिद्धार्थ के घर में ऐश कर रहे थे।
अचानक थोड़े दिनों बाद उसने देखा कि कशिश के मायके वाले चले गए हैं और कशिश भी प्राची का ध्यान रखने लगी है।
एक दिन कशिश ने सिद्धार्थ से कहा-” सिद्धार्थ, प्लीज मुझे माफ कर दो। तुम सही थे और मैं गलत। मेरे मायके वालों ने तुम्हारा बहुत पैसा उड़ा दिया है और मैं अपनी मासूम बच्ची का भी बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। अब मैं सोच लिया है कि मैं घर खर्चे में तुम्हारा हाथ बटाऊंगी और ब्यूटी पार्लर खोलूगी। मैंने यहां से थोड़ी ही दूरी पर एक छोटा फ्लैट देखा है। मैं उसी में ब्यूटी पार्लर खोलूँगी। मैं वह फ्लैट खरीदना चाहती हूं। ”
सिद्धार्थ-” नहीं, तुम्हें ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है, तुम सिर्फ प्राची का ध्यान रखो। ”
कशिश-” प्लीज सिद्धार्थ मान जाओ, काम में मेरा मन भी लगा रहेगा और फिर मैं तो कागज भी बनवा लिए हैं। बस तुम्हें साइन करने हैं। ”
सिद्धार्थ मान गया और साइन कर दिए। सिद्धार्थ ने फोन करके अपनी मां को बताया कि कशिश सही राह पर आ गई है।
कशिश ने कहा-” सिद्धार्थ, प्लीज माँ जी को वापस ले आओ, मुझे उनसे भी माफी मांगनी है, पर क्या वृद्ध आश्रम वाले मान जाएंगे। ”
सिद्धार्थ ने हंसकर कहा -” तुम चिंता मत करो, माँ तो मामा जी के घर पर है। मैंने उन्हें वृद्ध आश्रम छोड़ा ही नहीं था। ”
कशिश-” यह तो आपने बहुत ही अच्छा किया। ”
अगले दिन सिद्धार्थ मां को लेने जाने वाला था लेकिन शाम को ऑफिस से लौटते समय उसका एक्सीडेंट हो गया और उसने वहीं पर दम तोड़ दिया।
अगले दिन मां उसका इंतजार करते-करते थक गई। उसका फोन भी नहीं लग रहा था तब उन्होंने कशिश को फोन लगाया।
कशिश-” माँ जी, कल शाम को उनका एक्सीडेंट हुआ था और वह हमें छोड़कर चले गए। ”
माँ-” यह तुम क्या बकवास कर रही हो, उसका एक्सीडेंट हुआ था तो मुझे बताया क्यों नहीं? ”
माँ तुरंत अपने भाई के साथ बदहवास भागती हुई आई और फूट-फूट कर रोने लगी। सिद्धार्थ की अंतिम क्रिया की गई। गीता वाधवानी
बहुत दिन बीत जाने पर भी उन्होंने देखा की कशिश के मायके वाले यहां से जा ही नहीं रहे है। उन्होंने सोचा कि चलो कोई बात नहीं बेटी के दुख में शामिल है।
कुछ दिन बाद कशिश के भाई ने घर में पार्टी रखी। सिद्धार्थ की मां ने उसे डांटते हुए कहा-” अभी सिद्धार्थ को गए हुए कितने दिन हुए हैं और तुम हमारे ही घर में पार्टी कर रहे हो, शर्म नहीं आती तुम्हें? ”
रंजीत -” तुम्हारा घर? बहन,इसे बताओ, कि यह किसका घर है? ”
कशिश -” तुम्हारे बेवकूफ बेटे ने इसे मेरे नाम कर दिया था और अपना ऑफिस मेरे भाई के नाम, वह समझ रहा था कि मैं पार्लर खोलूगी और वह उन कागजों पर साइन कर रहा है, चलो अब तुम निकलो यहां से। ”
माँ -” नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मैं पुलिस के पास जाऊंगी। ”
रंजीत -” हां हां खुशी से जाओ पर साबित कैसे करोगी? ”
सिद्धार्थ की मां भौचक्की खड़ी रह गई। उसे समझ में आ गया था कि बहुत बड़ी साजिश की गई है और यह भी हो सकता है कि मेरे बेटे का एक्सीडेंट भी इन्हीं लोगों ने करवाया हो। अब उन्हें सिर्फ प्राची की चिंता थी।
उनके पास सिर्फ अपने गहने बचे थे, जो लॉकर में थे और उनकी खबर कशिश को नहीं थी। उन्होंने कुछ पैसे, लॉकर की चाबी और प्राची को उठाया, घर से निकल पड़ी।
कशिश तो बहुत खुश थी कि प्राची से पीछा छूटा। बहुत सालों तक उसने पार्टी की, पूमा फिरा,मौज मस्ती की, फिर इन सब से वह बोर होने लगी। उसने रंजीत से कहा-” क्या मैं भी ऑफिस आना शुरू कर दूं? ”
रंजीत -” हां हां बिल्कुल!”
कशिश भी ऑफिस जाने लगी लेकिन वह वहां बहुत बोर हो जाती थी। उसने भाई से कहा-” चलो कुछ नया प्लान बनाते हैं, नया बकरा ढूंढते हैं। ”
रंजीत -” देख बहन, अभी तक तो हम पकडे नहीं गए हैं, अब हमारे पास सब कुछ है, कभी ना कभी तो हमें ठहरना पड़ेगा, बस अब शांति से रह। ”
थोड़े समय बाद रंजीत ने शादी कर ली और अपनी लाइफ मजे से जीने लगा। कशिश को अकेलापन खा रहा था।
एक दिन उसने गुस्से में रंजीत से कहा -” रंजीत, यह सब कुछ मेरा है, तू मम्मी पापा और अपनी पत्नी को लेकर यहां से चला जा, फिर चाहे मैं जैसे मर्जी रहूँ। ”
रंजीत -” मेरी प्यारी बहना, यह सब कुछ तेरा नहीं, मेरा है, अब जब तू ऑफिस आएगी तो मैं कुछ ना कुछ तो फायदा उठाऊंगा ना, ऑफिस में तूने ना जाने कितनी फाइलों पर साइन किए थे, जो अपने पति की और अपनी बच्ची की ना हुई,वह मेरी क्या होगी। जो अपने भाई से अपने पति को एक्सीडेंट में मरवा सकती है वह कुछ भी कर सकती है। अब तू निकल यहां से, वह भी खाली हाथ। ”
कशिश-” क**** धोखेबाज, भगवान तुझे एक दिन सजा जरूर देगा। ”
रंजीत -” अच्छा सती सावित्री जी! अब निकलिए यहां से। ”
कशिश -” मैं इतनी रात को कहां जाऊंगी, कम से कम सुबह तो होने दो। ”
रंजीत -” कहीं भी जाओ। मुझे क्या? ”
कशिश को बहुत गहरा आघात लगा। लेकिन यह तो सच था कि जो उसने बोया वही पाया। उसे अपनी सास, सिद्धार्थ और प्राची की बहुत याद आ रही थी। रोते-रोते वह घर से बाहर निकली और मेंन रोड पर पहुंच गई। न जाने कैसे उसे ठोकर लगी और वह गिर पड़ी। तभी एक ट्रक वाला उसके दोनों हाथों को कुचलता हुआ वहां से निकल गया।
किसी ने दया करके उसे सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया। डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए उसके कुचले हुए हाथों को काट दिया। क्या जिंदगी थी, नर्क से भी बदतर। एक हफ्ता अस्पताल में रहने के बाद अस्पताल वालों ने उसे जाने के लिए कह दिया। चार दिन से सड़क के किनारे पड़े पड़े वह मर गई थी।
अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली
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