बहू मायके से दूरी बनाकर रखो – आरती देवी 

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं।

शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था जहाँ उसे बेटी का दर्ज़ा मिले, लेकिन यहाँ तो पहले ही दिन उस पर मर्यादा और पाबंदियों की एक भारी दीवार खड़ी की जा रही थी।

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में चहल-पहल शुरू हो गई थी। रसोई से आती चाय और अगरबत्ती की मिली-जुली महक इस बात का एहसास करा रही थी कि एक नई सुबह हो चुकी है। यह शिखा की शादी के बाद ससुराल में पहली सुबह थी।

हाथों में रची गहरी लाल मेहंदी और खनकती चूड़ियों के बीच शिखा का मन अभी भी अपने मायके की यादों में कहीं अटका हुआ था। कल ही तो वह अपने माता-पिता के गले लगकर फूट-फूट कर रोई थी, और आज उसे इस नए घर, नए लोगों और नए रिवाज़ों को अपनाना था।

शिखा ने नहा-धोकर एक सुंदर सी साड़ी पहनी और सिर पर पल्लू रखकर बाहर दालान में आ गई। उसकी सासू माँ, निर्मला देवी, सोफे पर बैठी चाय पी रही थीं। निर्मला देवी अपने उसूलों और अनुशासन की बहुत पक्की मानी जाती थीं। उन्होंने शिखा को अपने पास बैठने का इशारा किया।

शिखा झिझकते हुए सोफे के एक किनारे पर बैठ गई। घर में अभी बाकी लोग सो रहे थे, इसलिए चारों तरफ एक अजीब सी शांति थी। इसी शांति को चीरते हुए निर्मला देवी ने एक गंभीर और भारी आवाज़ में बोलना शुरू किया।

“देखो शिखा, अब तुम इस घर की बहू हो। कल तक तुम अपने पिता की लाडली बेटी थी, पर आज से तुम हमारे खानदान की इज़्ज़त हो।” निर्मला देवी ने शिखा की आँखों में सीधा देखते हुए कहा। “जिस घर में चार बर्तन होते हैं, वो आपस में टकराते ही हैं। आवाज़ भी होती है और कभी-कभी खरोंच भी आती है।

लेकिन एक समझदार और संस्कारी बहू का यह सबसे बड़ा फर्ज़ होता है कि उन बर्तनों की खनक घर की चारदीवारी से बाहर न जाने दे। तुम समझ रही हो ना मैं क्या कह रही हूँ? इस घर में तुम्हें कुछ बुरा लगे, किसी की कोई बात चुभ जाए या कोई मनमुटाव हो, तो उस कड़वाहट की भनक तुम्हारे मायके वालों को नहीं लगनी चाहिए।”

शिखा चुपचाप सिर झुकाए सुन रही थी, लेकिन उसके अंदर जैसे सवालों का एक बवंडर सा उठने लगा था।

निर्मला देवी रुकी नहीं, उन्होंने अपनी बात जारी रखी। “घर के सदस्यों की कमज़ोरियां, हमारे आपसी मसले, ये सब घर के अंदर ही दफन हो जाने चाहिए। मायके में या अपनी सहेलियों के सामने ससुराल की शिकायतें करना एक अच्छी औरत को शोभा नहीं देता। अब यही तुम्हारा असली घर है।

बार-बार मायके जाने की ज़िद मत करना, इससे ससुराल वालों का सिर नीचा होता है। और सबसे ज़रूरी बात, अपने पति विकास की कमाई को समझना। शौक पूरे करने के चक्कर में फिजूलखर्ची मत करना। अगर पैसों को मुट्ठी में बांधकर नहीं चलोगी, तो कल को यही बात तुम्हारे लिए बहुत बड़ी परेशानी बन जाएगी।”

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं। शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था

जहाँ उसे बेटी का दर्ज़ा मिले, लेकिन यहाँ तो पहले ही दिन उस पर मर्यादा और पाबंदियों की एक भारी दीवार खड़ी की जा रही थी। मायके से दूरी बनाने की बात ने शिखा के दिल को सबसे ज्यादा दुखाया था। जिस माँ-बाप ने उसे पच्चीस साल सींच कर बड़ा किया, क्या सिर्फ सात फेरे ले लेने से उनसे सारे भावनात्मक रिश्ते खत्म हो जाते हैं?

शिखा ने एक गहरी सांस ली। वह आज की पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। वह जानती थी कि अगर उसने आज इस घुटन को स्वीकार कर लिया, तो वह जीवन भर इसी पिंजरे में फड़फड़ाती रहेगी। उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई डर या बगावत नहीं थी, बल्कि एक बेहद शांत और सम्मानजनक आत्मविश्वास था।

“माँ जी,” शिखा की आवाज़ बेहद सौम्य थी, “आपने जो कुछ भी कहा, मैंने बहुत ध्यान से सुना। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूंगी जिससे इस घर की इज़्ज़त पर कोई आंच आए। विकास की कमाई की कद्र करना मेरा फर्ज़ है, क्योंकि हम दोनों मिलकर ही इस गृहस्थी को आगे बढ़ाएंगे।”

निर्मला देवी को शिखा की यह सकारात्मक शुरुआत अच्छी लगी, लेकिन शिखा की बात अभी पूरी नहीं हुई थी।

“पर माँ जी,” शिखा ने आगे कहा, “आपने कहा कि घर के बर्तन टकराएंगे तो आवाज़ बाहर नहीं जानी चाहिए। मैं यह मानती हूँ कि घर की बातें घर में रहनी चाहिए, लेकिन अगर उन बर्तनों के टकराने से मुझे चोट लगी और मैं अंदर ही अंदर लहूलुहान होती रही, तो क्या आप मेरे उस घाव पर मरहम लगाएंगी? अगर मैं आपको अपनी माँ मानकर अपनी तकलीफ आपको बताऊंगी, तो क्या आप मुझे एक बेटी की तरह सुनकर न्याय करेंगी? क्योंकि अगर इस घर में मुझे मेरी बात कहने का हक मिलेगा, तो मुझे कभी अपने मायके जाकर रोने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।”

निर्मला देवी एकदम सन्न रह गईं। उन्होंने ऐसी उम्मीद नहीं की थी।

शिखा ने अपनी बात को पूरा करते हुए कहा, “रही बात मायके न जाने की, तो माँ जी, एक पौधा जब नई जगह लगाया जाता है, तो उसे अपनी पुरानी जड़ों से एकदम से काट देने पर वह सूख जाता है। मेरे माता-पिता ने मुझे पराया नहीं किया है, उन्होंने अपना एक हिस्सा आपको सौंपा है। अगर मैं उनका सम्मान करना छोड़ दूंगी, तो कल को मैं आपका सच्चा सम्मान कैसे कर पाऊंगी? आप मुझे इस घर की बेटी बनाकर देखिए, मैं आपको कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगी।”

शिखा के इन शब्दों में इतनी सच्चाई और गहराई थी कि निर्मला देवी के पास कोई जवाब नहीं बचा। वे अचानक अपने अतीत में चली गईं। तीस साल पहले, जब वे नई-नवेली बहू बनकर इस घर में आई थीं, तब उनकी सास ने भी उन्हें हू-ब-हू यही बातें कही थीं। उस दिन निर्मला देवी ने चुपचाप सिर झुका लिया था और जीवन भर अपनी तकलीफों को अपने अंदर दबाकर घुट-घुट कर जीती रहीं। उन्होंने जो दर्द सहा, आज अनजाने में वे वही दर्द शिखा को विरासत में दे रही थीं। पितृसत्तात्मक समाज के इस कड़वे नियम को उन्होंने भी सच मान लिया था।

लेकिन आज शिखा के चंद सवालों ने निर्मला देवी की बरसों पुरानी उस जकड़न को तोड़ दिया। उन्हें एहसास हुआ कि घर की इज़्ज़त बहुओं की खामोशी में नहीं, बल्कि उनके खुश रहने में होती है। अगर घर के अंदर प्यार और समझदारी का माहौल हो, तो बाहर शिकायत करने की नौबत ही नहीं आती।

निर्मला देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और शिखा के सिर पर प्यार से फेरते हुए कहा, “तू सही कह रही है बेटी। हमने तो बस एक पिंजरा बनाना सीखा था, लेकिन तूने आज मुझे उस पिंजरे का दरवाज़ा खोलना सिखा दिया। आज से यह घर सच में तेरा है, और यहाँ तुझे अपनी बात कहने का पूरा हक है।”

उस सुबह की चाय की मिठास कुछ और ही थी। शिखा को अब वह घर एक ससुराल नहीं, बल्कि अपना एक नया आशियाना लगने लगा था, जहाँ नियम नहीं, रिश्ते पनपने वाले थे।

क्या आपको भी लगता है कि लड़कियों को शादी के बाद अपने मायके से भावनात्मक रूप से अलग होने के लिए मजबूर करना गलत है? क्या एक स्वस्थ परिवार वो नहीं है जहाँ बहू को अपनी तकलीफें साझा करने की आज़ादी हो? अपने विचार हमारे साथ ज़रूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

लेखिका : आरती देवी 

error: Content is protected !!