उम्र की ढलान

“ये आप क्या कर रहे हैं? इस उम्र में आकर हाथ जोड़ने शोभा नहीं देते। पति-पत्नी का रिश्ता तो एक गाड़ी के दो पहियों जैसा होता है। कभी एक पहिया घिस जाता है, तो दूसरा उसका भार सँभाल लेता है। इसमें माफी कैसी?” सावित्री की आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था। “और वैसे भी, जो बीत गया सो बीत गया। आज आप मेरे साथ हैं, यही मेरे लिए बहुत है।”

बाहर बारिश की बूँदें अस्पताल की बड़ी सी काँच की खिड़की पर लगातार दस्तक दे रही थीं। कमरे में मशीनों की धीमी ‘बीप-बीप’ के अलावा एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। पचहत्तर वर्षीय दीनानाथ जी बिस्तर पर लेटे हुए छत को घूर रहे थे। लकवे के एक हल्के झटके ने उनके शरीर के बाएँ हिस्से को सुन्न कर दिया था। लेकिन उनका दिमाग पूरी तरह सजग था, और शायद इसी सजगता ने उनके भीतर एक गहरे पश्चाताप को जन्म दे दिया था।

उनकी नज़रें बार-बार कमरे के कोने में रखी एक छोटी सी कुर्सी पर जातीं, जहाँ उनकी पत्नी, सावित्री, सिर झुकाए बैठी थीं। उनके हाथ में एक छोटी सी डायरी थी जिसमें वह दीनानाथ की दवाइयों का समय लिख रही थीं। दीनानाथ जी ने अपनी आँखें मूँद लीं। उनकी बंद आँखों के सामने पैंतालीस साल का वैवाहिक जीवन किसी चलचित्र की तरह घूमने लगा।

एक सरकारी विभाग में उच्च पद पर रहे दीनानाथ जी स्वभाव से बेहद कड़क और अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। उनके लिए उनका रुतबा, उनका काम और उनका अहम् ही सब कुछ था। सावित्री एक बेहद साधारण, शांत और कम पढ़ी-लिखी महिला थीं, जो उनके जीवन में एक पत्नी से ज्यादा एक व्यवस्थापिका बनकर रह गई थीं। दीनानाथ को याद आया कि कैसे उन्होंने कभी सावित्री की पसंद-नापसंद की परवाह नहीं की। जब भी सावित्री ने कोई राय देनी चाही, उन्होंने यह कहकर उसे चुप करा दिया कि “तुम्हें दुनियादारी की क्या समझ!” घर में कोई मेहमान आता, तो वह सावित्री को रसोई तक ही सीमित रखते, इस डर से कि कहीं वह अपनी देहाती बातों से उनका रुतबा कम न कर दे।

और आज? आज जब वह इस बिस्तर पर बेबस पड़े थे, तो जिन सहकर्मियों और दोस्तों पर उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी, उनमें से कोई एक पल के लिए भी उनके पास नहीं था। यहाँ तक कि उनका इकलौता बेटा, जो अमेरिका में एक बड़ी आईटी कंपनी में काम करता था, सिर्फ फोन पर ही अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था। “पापा का ध्यान रखना माँ, मैं अगले महीने छुट्टी मिलते ही आऊँगा, मैंने अस्पताल के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं,” बेटे के ये शब्द दीनानाथ के कानों में अभी भी गूँज रहे थे। पैसे! क्या पैसे से वह सूनापन भरा जा सकता था जो आज उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था?

लेकिन सावित्री? वह औरत जिसे उन्होंने जीवन भर एक फर्नीचर से ज्यादा अहमियत नहीं दी, आज वही उनका इकलौता सहारा थी। पिछले पंद्रह दिनों से वह ठीक से सोई नहीं थी। कभी उनका बिस्तर ठीक करना, कभी स्पंज से उनका शरीर पोंछना, कभी चम्मच से उन्हें सूप पिलाना—सावित्री बिना किसी शिकायत के सब कुछ कर रही थीं। उनके चेहरे पर थकान की लकीरें गहरी हो गई थीं, लेकिन माथे पर शिकन का एक भी निशान नहीं था।

“आप जाग गए?” सावित्री की धीमी आवाज़ ने दीनानाथ जी की तंद्रा तोड़ी।

दीनानाथ जी ने धीरे से आँखें खोलीं। सावित्री उनके बिस्तर के पास खड़ी थीं। उन्होंने आज अपनी उन पारंपरिक भारी सूती साड़ियों की जगह एक ढीला-ढाला सूती सलवार-कुर्ता पहना हुआ था। बालों को लापरवाही से एक जूड़े में बाँध रखा था।

“हाँ…” दीनानाथ जी के गले से एक भारी सी आवाज़ निकली।

“पानी दूँ? मुँह सूख रहा होगा आपका,” सावित्री ने टेबल से पानी का गिलास उठाते हुए पूछा।

दीनानाथ जी ने ‘ना’ में सिर हिलाया और फिर सावित्री के कपड़ों को देखकर बोले, “सावित्री… आज तुमने साड़ी नहीं पहनी? तुम तो हमेशा कहती थी कि बिना साड़ी के तुम्हें घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं लगता।”

सावित्री हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं, “अरे, अब वो उम्र और वो शौक कहाँ रहे! अस्पताल में दिन-रात भागदौड़ करनी पड़ती है। कभी डॉक्टर के केबिन में, कभी दवाई की दुकान पर। साड़ी में उलझन होती थी, इसलिए कल जब मैं घर गई थी तो बेटी के पुराने कपड़ों में से ये कुर्ता निकाल लाई। बहुत आराम है इसमें। काम करने में कोई अड़चन नहीं आती।”

यह बात कहते हुए सावित्री के स्वर में कोई दुख नहीं था, बस एक सहजता थी। लेकिन दीनानाथ जी के सीने में जैसे किसी ने सुई चुभो दी। उन्हें याद आया कि एक बार शादी की शुरुआत में सावित्री ने बाजार से अपने लिए एक सलवार-सूट खरीदा था, जिस पर उन्होंने खूब तमाशा किया था। “मेरे घर की औरतें ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं,” कहकर उन्होंने वह सूट अलमारी में ही पड़े रहने दिया था। और आज, उसी औरत ने उनकी सहूलियत और सेवा के लिए अपने जीवन भर के उसूल और पहनावे को बिना किसी शोर-शराबे के बदल दिया था।

“सावित्री…” दीनानाथ जी का गला रुँध गया।

“क्या हुआ? दर्द बढ़ गया है क्या? डॉक्टर को बुलाऊँ?” सावित्री घबराकर उनके माथे पर हाथ रखने लगीं। उनका खुरदरा और गरम हाथ जैसे ही दीनानाथ के माथे पर पड़ा, दीनानाथ ने अपने दाएँ (जो हाथ ठीक था) हाथ से सावित्री का हाथ पकड़ लिया।

सावित्री ठिठक गईं। पैंतालीस साल के इस रिश्ते में ऐसा स्पर्श बहुत दुर्लभ था।

“दर्द शरीर में नहीं… यहाँ है सावित्री,” दीनानाथ जी ने अपने सीने की ओर इशारा किया। उनकी आँखों के किनारे भीगने लगे थे। उन्होंने नजरें चुराते हुए खिड़की के बाहर देखना शुरू कर दिया, क्योंकि वह अपनी टूटती हुई ढाल को अपनी पत्नी के सामने कमजोर नहीं पड़ने देना चाहते थे।

सावित्री ने उनका चेहरा अपनी ओर मोड़ा, “क्या बात है? आप ऐसे रो क्यों रहे हैं? डॉक्टर ने कहा है आप जल्दी ठीक हो जाएँगे। आपको बस थोड़ा आराम करना है।”

“मैं ठीक होकर भी क्या करूँगा सावित्री?” दीनानाथ जी की आवाज़ में एक गहरा कंपन था। “मैंने पूरी जिंदगी सिर्फ अपना सोचा। अपनी इज्जत, अपनी पसंद, अपना आराम। मैंने कभी तुम्हें वो सम्मान नहीं दिया जिसकी तुम हकदार थीं। तुम मेरी परछाई बनकर चुपचाप मेरे पीछे चलती रहीं और मैं खुद को सूरज समझता रहा। आज जब मैं इस बिस्तर पर अपाहिज की तरह पड़ा हूँ, तो मुझे अहसास हो रहा है कि सूरज मैं नहीं, तुम थीं। जिसने बिना कुछ कहे हमेशा मुझे रौशनी दी।”

सावित्री चुपचाप सुन रही थीं। उनकी अपनी आँखें भी डबडबा आई थीं।

दीनानाथ जी ने अपना काँपता हुआ हाथ जोड़ा। “हम मर्द कितने खोखले होते हैं न! जीवन भर एक झूठे गुरूर में जीते हैं। और तुम औरतें… पानी की तरह होती हो। जिस बर्तन में डालो, उसी का आकार ले लेती हो। हर तकलीफ सह लेती हो बिना उफ़ किए। मुझे माफ कर दो सावित्री। अगर हो सके तो मुझे मेरी उन तमाम गलतियों के लिए माफ कर दो, जिनके लिए मैंने कभी तुमसे माफी माँगने की जहमत नहीं उठाई।”

अस्पताल के उस सर्द कमरे में दीनानाथ जी के वो आँसू जैसे बरसों की जमी हुई बर्फ को पिघला रहे थे।

सावित्री ने आगे बढ़कर उनके जुड़े हुए हाथों को अपने दोनों हाथों में ले लिया। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से—जिसे वह भूल गई थीं कि आज उन्होंने पहना ही नहीं है—अपनी आँखें पोंछने की कोशिश की, फिर कुर्ते की आस्तीन से आँसू पोंछते हुए मुस्कराईं।

“ये आप क्या कर रहे हैं? इस उम्र में आकर हाथ जोड़ने शोभा नहीं देते। पति-पत्नी का रिश्ता तो एक गाड़ी के दो पहियों जैसा होता है। कभी एक पहिया घिस जाता है, तो दूसरा उसका भार सँभाल लेता है। इसमें माफी कैसी?” सावित्री की आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था। “और वैसे भी, जो बीत गया सो बीत गया। आज आप मेरे साथ हैं, यही मेरे लिए बहुत है।”

दीनानाथ जी ने देखा, उनके बिस्तर के पास वाली मेज पर एक छोटा सा पारदर्शी जार रखा था, जिसमें किसी शुभचिंतक द्वारा दिया गया गेंदे का एक पीला फूल रखा था। दीनानाथ जी ने बड़ी मुश्किल से अपना दायाँ हाथ बढ़ाया, उस फूल को उठाया और सावित्री की हथेली पर रख दिया।

“ये फूल उस नई शुरुआत के लिए, जो शायद मैंने बहुत देर से की है। लेकिन अब जब तक साँस है, ये हाथ सिर्फ तुम्हारा साथ निभाने के लिए उठेगा, तुम्हें पीछे धकेलने के लिए नहीं।”

सावित्री के झुर्रियों वाले चेहरे पर एक ऐसी चमक उभर आई, जो शायद उनकी शादी के पहले दिन भी नहीं थी। बाहर बारिश रुक चुकी थी। बादलों के बीच से ढलते सूरज की एक सुनहरी, गुनगुनी किरण खिड़की से छनकर सीधे उस बिस्तर पर पड़ रही थी। उम्र की ढलान पर ही सही, लेकिन उनके जीवन के इस सूने आँगन में आज एक नई, खूबसूरत और बेहद सुकून भरी सुबह ने दस्तक दे दी थी।

क्या आपने भी कभी किसी रिश्ते में किसी अपने को समझने में देर की है? या आपके जीवन में भी कोई ऐसा है जिसने बिना किसी शिकायत के हर परिस्थिति में आपका साथ निभाया हो? अपने विचार और अनुभव कमेंट करके जरूर बताएँ! हमें आपकी कहानियाँ पढ़ने का इंतज़ार रहेगा।

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लेखिका : निधि गुप्ता

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