लेकिन जब बुआ जी ने कहा, “ये हमारी मीता है,” तो समीर के माथे पर भी सिलवटें पड़ गईं। उसे थोड़ा बुरा भी लगा। क्या लड़की वालों ने उसे इतना हल्के में लिया है कि वे ठीक से तैयार भी नहीं हो सकते? क्या उसके पास पहनने के लिए एक ढंग का सूट नहीं था? वह खुद कितना सोच-समझकर तैयार होकर आया था।
बुआ जी ने माहौल के अजीब से सन्नाटे को तोड़ते हुए कहा, “मीता बेटा, समीर को छत वाले बगीचे में ले जाओ। वहाँ शांति है, तुम दोनों आराम से बैठकर एक-दूसरे को जान-समझ लो।”
रविवार की उस सुबह घर में एक अलग ही तरह की हलचल थी। रसोई से उठती देसी घी की खुशबू और बेसन के लड्डू भूनने की महक ने पूरे घर को अपने आगोश में ले रखा था। मीता की माँ, विमला जी, सुबह पाँच बजे से ही काम में जुटी थीं। आज उनके घर उनकी इकलौती बेटी मीता को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। विमला जी के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं, क्योंकि मीता की बुआ ने इस रिश्ते के लिए बहुत जोर लगाया था। लड़का एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, नाम था समीर। परिवार भी बहुत संस्कारी और सुलझा हुआ बताया जा रहा था। विमला जी चाहती थीं कि किसी भी तरह आज बात पक्की हो जाए।
परन्तु घर के एक कोने में, मीता के कमरे का नज़ारा बिल्कुल अलग था। कमरे की दीवारें किसी फिल्म स्टार की तस्वीरों से नहीं, बल्कि भारत के नक्शे, इतिहास के टाइमलाइन और प्रेरणादायक सुविचारों से पटी पड़ी थीं। टेबल पर ‘इंडियन पॉलिटी’, ‘स्पेक्ट्रम मॉडर्न हिस्ट्री’ और न जाने कितनी ही मोटी-मोटी किताबें एक के ऊपर एक सजी थीं। मीता अपनी कुर्सी पर बैठी एक बहुत ही पुरानी, घिसी हुई नीली कुर्ती पहने हुए थी। उसके बाल ऐसे लग रहे थे मानो उसने हफ्तों से कंघी न की हो, और उस पर उसने चंपी करने के अंदाज में बालों में ढेर सारा नारियल का तेल थोप रखा था। आँखों पर एक मोटा सा चश्मा लगा लिया था, जबकि वह पिछले दो सालों से कॉन्टैक्ट लेंस पहन रही थी।
उसने शीशे में खुद को देखा और एक फीकी सी मुस्कान उसके होठों पर तैर गई। आज वह हर वो कोशिश कर रही थी जिससे सामने वाला लड़का उसे पहली ही नज़र में नापसंद कर दे। वह किसी भी कीमत पर अभी शादी नहीं करना चाहती थी। उसका एकमात्र लक्ष्य यूपीएससी (UPSC) परीक्षा पास करके आईएएस अधिकारी बनना था। पिछले दो प्रयासों में वह इंटरव्यू राउंड तक पहुँच कर रह गई थी, लेकिन उसे पूरा विश्वास था कि इस बार वह जरूर सफल होगी। मगर परिवार वालों के तानों और बुआ जी की जिद ने उसे इस अजीबोगरीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया था।
तभी विमला जी कमरे में दाखिल हुईं। मीता का हुलिया देखते ही उनके हाथों से मानो थाली छूटते-छूटते बची। “अरी ओ लड़की! ये क्या बना रखा है अपना हाल? लड़के वाले बस दरवाजे पर पहुँचने ही वाले हैं और तू ये भिखारियों वाले कपड़े पहन कर बैठी है? और ये बालों में तेल का डिब्बा क्यों उड़ेल लिया?” विमला जी गुस्से और रुलाई के मिले-जुले भाव से बोलीं।
“माँ, मुझे समय नहीं मिला। मैं अपनी रिवीज़न कर रही थी, और वैसे भी, जो मुझे पसंद करेगा वो मेरी सीरत देखेगा, सूरत नहीं,” मीता ने जानबूझकर ऐसा जवाब दिया जो किसी भी माँ का ब्लड प्रेशर बढ़ा दे।
इससे पहले कि विमला जी कुछ और कहतीं, बाहर से बुआ जी की आवाज़ आ गई कि मेहमान आ गए हैं। विमला जी ने अपना माथा पीटा और बड़बड़ाते हुए बाहर चली गईं।
ड्राइंग रूम में समीर अपने माता-पिता के साथ बैठा था। वह एक बेहद सलीकेदार, आत्मविश्वासी और आधुनिक विचारों वाला युवा लग रहा था। उसने एक बहुत ही डीसेंट सी स्काई ब्लू शर्ट और डार्क ट्राउजर पहना हुआ था। चाय-नाश्ते का दौर शुरू हुआ। दोनों परिवारों के बीच हँसी-मज़ाक और औपचारिक बातें होने लगीं। समीर की माँ ने धीरे से कहा, “विमला जी, अब बेटी को भी बुला लीजिए, बच्चे आपस में मिल लें।”
विमला जी का दिल धक-धक करने लगा। उन्होंने भारी मन से मीता को आवाज़ दी।
मीता जब हाथ में चाय की ट्रे लेकर बाहर आई, तो कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। समीर ने फोटो में जिस लड़की को देखा था, वो बहुत ही खूबसूरत, आत्मविश्वास से भरी और सलीके वाली थी। लेकिन सामने जो लड़की खड़ी थी, वह किसी भी एंगल से उस फोटो वाली लड़की से मेल नहीं खा रही थी। तेल से चिपके बाल, मोटा चश्मा, और एकदम बेतरतीब कपड़े। समीर को एक पल के लिए लगा कि शायद उसके साथ कोई मज़ाक हो रहा है या फिर ये मीता की कोई बड़ी बहन है।
लेकिन जब बुआ जी ने कहा, “ये हमारी मीता है,” तो समीर के माथे पर भी सिलवटें पड़ गईं। उसे थोड़ा बुरा भी लगा। क्या लड़की वालों ने उसे इतना हल्के में लिया है कि वे ठीक से तैयार भी नहीं हो सकते? क्या उसके पास पहनने के लिए एक ढंग का सूट नहीं था? वह खुद कितना सोच-समझकर तैयार होकर आया था।
बुआ जी ने माहौल के अजीब से सन्नाटे को तोड़ते हुए कहा, “मीता बेटा, समीर को छत वाले बगीचे में ले जाओ। वहाँ शांति है, तुम दोनों आराम से बैठकर एक-दूसरे को जान-समझ लो।”
मीता ने बिना किसी भाव के सिर हिलाया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। समीर चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
छत पर बने छोटे से बगीचे में बहुत सुंदर पौधे लगे थे। एक तरफ एक छोटी सी मेज और दो कुर्सियाँ रखी थीं। मीता जाकर एक कुर्सी पर ऐसे बैठ गई जैसे उस पर कोई बहुत बड़ा बोझ डाल दिया गया हो। समीर भी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। शुरुआत के कुछ मिनटों तक सिर्फ हवा की सरसराहट और दूर सड़क से आती गाड़ियों की आवाज़ें ही सुनाई दे रही थीं। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
समीर ने माहौल को हल्का करने के लिए पास ही रखी एक किताब की तरफ इशारा करते हुए पूछा, “यह ‘अंतर्राष्ट्रीय संबंध’ की किताब है न? आपको राजनीति और दुनिया भर की ख़बरों में बहुत दिलचस्पी लगती है?”
मीता ने उसकी तरफ एक रूखी सी नज़र डाली और तल्ख लहजे में कहा, “हाँ है। तो? लड़कियों को सिर्फ सिलाई-बुनाई और कुकिंग की मैगजीन पढ़नी चाहिए क्या?”
समीर इस तीखे जवाब से थोड़ा अवाक रह गया। उसने मन ही मन सोचा, ‘ये लड़की न सिर्फ अजीब दिख रही है, बल्कि इसका स्वभाव भी बेहद चिड़चिड़ा है। बिना बात के ही लड़ने को तैयार है।’ उसे भी अब थोड़ा गुस्सा आने लगा था।
समीर ने एक गहरी साँस ली और मीता को ध्यान से देखा। अचानक उसे मीता के कानों के पीछे कुछ दिखा। वहाँ चश्मे की डंडी की वजह से लाल निशान नहीं थे, जो आमतौर पर लगातार मोटा चश्मा पहनने वालों को होते हैं। उसने मीता के चेहरे के भावों को पढ़ा, जिसमें नर्वसनेस कम और एक तरह की बगावत ज्यादा थी। वह एक पल के लिए चुप रहा, और फिर अचानक उसके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान आ गई, जो धीरे-धीरे एक हल्की हँसी में बदल गई।
मीता ने अजीबोगरीब नजरों से उसे देखा। “आप हँस क्यों रहे हैं? मैंने कोई जोक सुनाया है क्या?”
समीर ने अपनी हँसी रोकते हुए कहा, “नहीं-नहीं, जोक नहीं। बस मैं यह सोच रहा था कि आपने मुझे भगाने के लिए जो ये पूरा ‘गेटअप’ लिया है, इसमें काफी मेहनत लगी होगी। चश्मा तो शायद आपके दादाजी का है, और ये बालों में तेल… मुझे लगता है आपने पूरा एक डिब्बा खाली कर दिया है।”
मीता एकदम सन्न रह गई। उसकी चोरी पकड़ी गई थी। वह झेंपते हुए बोली, “आपको जो सोचना है सोचिए। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे वैसे भी शादी-वादी नहीं करनी है। मैं नीचे जाकर यही कहने वाली हूँ कि मुझे आप पसंद नहीं हैं। बात खत्म।”
समीर ने बहुत ही शांति से कहा, “ठीक है, आप नीचे जाकर मना कर दीजिएगा। मेरा भी ईगो इतना बड़ा नहीं है कि मैं बुरा मानूँ। लेकिन कम से कम मुझे ये तो जानने का हक है कि आखिर मुझमें या इस रिश्ते में ऐसी क्या खराबी है कि आपने मुझे रिजेक्ट करने के लिए इतना बड़ा नाटक रच दिया? क्या आपकी जिंदगी में पहले से कोई और है?”
“कोई और? अरे नहीं!” मीता ने तुरंत जवाब दिया। “मेरी जिंदगी में सिर्फ मेरी किताबें और मेरा लक्ष्य है। मैं यूपीएससी की तैयारी कर रही हूँ। मेरे दो अटेम्प्ट हो चुके हैं और मैं बस मंजिल के करीब हूँ। मुझे पता है कि शादी के बाद लड़कियों की जिंदगी कैसी हो जाती है। घर, परिवार, रिश्तेदार, बच्चे… इन सबके बीच मेरे सपने का गला घुट जाएगा। मैं किसी भी कीमत पर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ, एक अधिकारी बनना चाहती हूँ। लेकिन मेरे घरवाले खासकर ये बुआ जी, बस मेरी शादी करवा कर अपने सिर का बोझ हल्का करना चाहते हैं।”
मीता बोलते-बोलते भावुक हो गई थी। उसकी आवाज़ में एक दर्द था, एक छटपटाहट थी अपने वजूद को बचाने की।
समीर ने बहुत ही ध्यान से उसकी पूरी बात सुनी। उसके चेहरे पर अब एक गंभीरता और मीता के लिए सम्मान था। “तो आपने सीधे-सीधे घर पर मना क्यों नहीं कर दिया?”
“किया था न!” मीता ने एक ठंडी आह भरते हुए कहा। “लेकिन बुआ जी ने कहा कि लड़का बहुत अच्छा है, हीरा है, हाथ से निकल जाएगा। मम्मी-पापा को इमोशनल ब्लैकमेल किया। मेरे रोने-धोने का कोई असर नहीं हुआ। इसलिए मेरे पास यही एक रास्ता बचा था कि मैं कुछ ऐसा करूँ कि आप खुद ही मुझे नापसंद करके मना कर दें।”
समीर मुस्कुराया। “मतलब आप मानती हैं कि आप असल में ऐसी नहीं दिखतीं?”
मीता को भी अब अपनी हरकत पर थोड़ी हँसी आ गई। “जी, कम से कम मैं लोगों को डराने का काम तो नहीं करती।”
“देखिए मीता,” समीर ने थोड़ा आगे की ओर झुकते हुए गंभीरता से कहा, “मैं आपकी भावनाओं की बहुत कद्र करता हूँ। मैं उन लड़कों में से नहीं हूँ जो एक पत्नी के रूप में सिर्फ एक होम-मेकर चाहते हैं। मुझे एक पार्टनर चाहिए, एक साथी, जो अपने सपनों को जिए। लेकिन मैं यह भी समझता हूँ कि यूपीएससी कोई छोटी-मोटी परीक्षा नहीं है। इसमें पूरा फोकस चाहिए।”
मीता उसे हैरानी से देख रही थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि यह लड़का उसकी बातों को इतनी गहराई से समझेगा।
“तो हम एक काम कर सकते हैं,” समीर ने अपनी बात जारी रखी। “अगर आप सच में मना करना चाहती हैं, तो मैं नीचे जाकर कह दूँगा कि हमारी कुंडलियाँ नहीं मिल रहीं या मुझे अभी शादी नहीं करनी, ताकि आप पर कोई इल्जाम न आए।”
मीता को समीर की यह बात बहुत भली लगी।
“लेकिन…” समीर ने एक पल रुककर कहा, “मेरे पास एक और विकल्प है, अगर आप सुनना चाहें तो।”
“क्या?” मीता ने उत्सुकता से पूछा।
“हम अभी सगाई कर लेते हैं। इससे आपके घरवालों को तसल्ली हो जाएगी और वे आप पर शादी का दबाव बनाना बंद कर देंगे। सगाई के बाद आप अपना पूरा समय पढ़ाई को दीजिए। शादी हम एक या डेढ़ साल बाद करेंगे, जब आपका एग्जाम क्लियर हो जाएगा। आपको पूरा समय मिलेगा।”
मीता की आँखों में एक चमक आ गई, लेकिन फिर वह थोड़ी आशंकित होकर बोली, “और अगर मैं एक साल में पास नहीं हो पाई तो? यूपीएससी में अनिश्चितता बहुत होती है। तब क्या होगा? क्या आप मेरा इंतजार करेंगे या फिर शादी के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी?”
समीर ने मीता की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “देखिए, अनंत काल तक तो कोई इंतजार नहीं कर सकता, यह व्यावहारिक नहीं है। लेकिन अगर एक साल बाद हमें शादी करनी भी पड़ी, तो मैं आपसे वादा करता हूँ कि शादी के बाद भी आपकी पढ़ाई नहीं रुकेगी। घर के कामों की जिम्मेदारी हम आधी-आधी बाँट लेंगे। अगर आपको पढ़ने के लिए रात को जगना पड़ा, तो सुबह का नाश्ता मैं बना दूँगा। आप तसल्ली से पढ़ना और जब तक आप अफसर नहीं बन जातीं, मैं एक मजबूत पिलर की तरह आपके साथ खड़ा रहूँगा। मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी एक आईएएस अधिकारी हो। बस मेरी एक शर्त है!”
मीता जो अब तक एक सपने जैसी दुनिया में खोई हुई समीर की बातें सुन रही थी, अचानक चौंक गई। “शर्त? कैसी शर्त?”
समीर ने अपनी हँसी दबाते हुए कहा, “शर्त ये है कि आप सगाई के दिन और उसके बाद कभी भी ये पुरानी, नीली रंग की अजीब सी कुर्ती नहीं पहनेंगी, और भगवान के लिए बालों में ये जो सरसों या नारियल का तेल भरा है, इसे आज ही शैम्पू से धो लेंगी। मेरे सिर में इसकी महक से दर्द होने लगा है।”
मीता यह सुनकर जोर से खिलखिला कर हँस पड़ी। उसकी हँसी इतनी बेबाक और खुशमिजाज थी कि समीर भी खुद को रोक नहीं पाया और दोनों छत पर जोर-जोर से हँसने लगे। उनके बीच का सारा तनाव, सारा डर और सारी गलतफहमियाँ उस एक हँसी के साथ हवा में उड़ गईं।
नीचे ड्राइंग रूम में बैठे सभी लोग अचानक छत से आती इन हँसी की आवाज़ों को सुनकर चौंक गए। विमला जी के चेहरे पर जो अब तक घबराहट थी, वह एक सुकून भरी मुस्कान में बदल गई।
बुआ जी ने गर्व से अपना सीना चौड़ा करते हुए समीर की माँ से कहा, “देखा बहन जी! मैंने तो पहले ही कहा था, मेरी मीता और आपका समीर बिल्कुल राम-सीता की जोड़ी हैं। देखिए कैसे दोनों की हँसी बता रही है कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं!”
समीर के माता-पिता भी खुशी से सिर हिला रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि छत पर जो रिश्ता तय हुआ है, वह राम-सीता की परंपरा से थोड़ा अलग, आज के दौर के दो समझदार और बराबरी के साथियों का रिश्ता है, जहाँ प्रेम की शुरुआत सपनों को बाँटने से हुई है।
आपके विचार:
दोस्तों, क्या आपको लगता है कि एक सफल शादी के लिए एक-दूसरे के सपनों का सम्मान करना सबसे ज्यादा जरूरी है? क्या समीर ने सही फैसला लिया?
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लेखिका : रीता शर्मा