रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।”
मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहूँ? जब आपको पता है कि माँ जी की तबीयत ठीक नहीं रहती, उन्हें चलने-फिरने में तकलीफ होती है, तो फिर आप रोज सुबह उन्हें चाय देने के लिए बाहर क्यों बुलाते हैं? क्या आप खुद अंदर जाकर चाय नहीं पी सकते? या मैं नहीं दे सकती आपको? उन्हें इतना कष्ट देना क्या ज़रूरी है?”
सुबह की पहली किरण के साथ ही घर के आँगन में चहल-पहल शुरू हो गई थी। रसोई में बर्तनों की खनक के साथ मीरा अपने दिन की शुरुआत कर रही थी। चूल्हे पर चाय उबल रही थी और उसमें से उठती इलायची और अदरक की महक पूरे घर में फैल रही थी। तभी बाहर बरामदे से एक भारी लेकिन जानी-पहचानी आवाज़ आई, “अरे सावित्री! मेरी सुबह की चाय अभी तक नहीं आई क्या? सूरज सिर पर आ गया है और तुम्हारी चाय का कहीं अता-पता नहीं है।”
यह आवाज़ मीरा के ससुर, रघुनाथ जी की थी, जो हर सुबह अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए इसी तरह अपनी पत्नी को आवाज़ लगाया करते थे।
कमरे के अंदर से सावित्री देवी की कराहने की आवाज़ आई। “हाय राम! इस आदमी को तो जरा भी चैन नहीं है। मेरी कमर में रात भर से इतना दर्द है कि करवट तक नहीं ली जा रही, और इन्हें अपनी चाय की पड़ी है।” सावित्री देवी धीरे-धीरे अपने पलंग से उठने की कोशिश कर रही थीं। उनके चेहरे पर दर्द की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। उम्र के इस पड़ाव पर गठिया और कमर दर्द ने उनका चलना-फिरना काफी मुश्किल कर दिया था।
मीरा दौड़कर अपनी सास के कमरे में गई और उन्हें सहारा देते हुए बोली, “माँ जी, आप क्यों उठ रही हैं? बाबूजी को चाय मैं दे आती हूँ। आप आराम कीजिए। आपकी कमर का दर्द तो वैसे ही बढ़ा हुआ है।”
सावित्री देवी ने एक गहरी साँस ली और मीरा का हाथ थामते हुए खड़ी हुईं। “रहने दे बहू, तू तो जानती है ना इनके स्वभाव को। जब तक मैं खुद अपने हाथों से इन्हें चाय का कप नहीं पकड़ाऊँगी, इनका अख़बार का पन्ना आगे नहीं पलटेगा। पूरी उम्र बीत गई इनकी ये जिद सहते-सहते, अब इस बुढ़ापे में क्या बदलेंगे।”
मीरा को अपने ससुर जी की यह बात कभी-कभी बहुत बुरी लगती थी। उसे लगता था कि बाबूजी कितने स्वार्थी हैं। जब उन्हें पता है कि माँ जी को चलने में इतनी तकलीफ होती है, तो फिर वो रोज सुबह अपनी चाय बाहर आँगन में क्यों मँगवाते हैं? वो खुद भी तो अंदर आकर पी सकते हैं या फिर मीरा के हाथ से ले सकते हैं। लेकिन नहीं, उन्हें तो बस अपनी पत्नी को परेशान करने में ही जैसे मज़ा आता था।
सावित्री देवी धीरे-धीरे, एक-एक कदम बढ़ाते हुए रसोई तक आईं। मीरा ने चाय कप में छानकर ट्रे में सजा दी। सावित्री देवी कांपते हाथों से ट्रे पकड़कर बाहर बरामदे की तरफ बढ़ीं। उनके हर कदम के साथ उनके चेहरे पर दर्द झलक रहा था।
“आ गई महारानी! मैं तो सोच रहा था कि आज चाय की जगह सीधा दोपहर का खाना ही मिलेगा,” रघुनाथ जी ने अख़बार से नज़रें हटाए बिना ही व्यंग्य करते हुए कहा।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं! आप तो बस बैठे-बैठे हुक्म चलाइए। यहाँ मेरी कमर टूटी जा रही है दर्द से, लेकिन आपको तो अपने गले को तर करने की पड़ी है,” सावित्री देवी ने ट्रे को छोटी सी मेज़ पर रखते हुए कहा और पास ही रखी लकड़ी की बेंच पर धम्म से बैठ गईं।
रघुनाथ जी ने अख़बार मोड़कर एक तरफ रखा और चाय का कप उठाते हुए बोले, “अरे तो इसमें इतना भड़कने वाली क्या बात है? पत्नी हो मेरी, इतना तो हक़ बनता है मेरा तुम पर। और वैसे भी, चाय तो तुम्हारे हाथों की ही अच्छी लगती है मुझे।”
“रहने दीजिए अपना ये मक्खन लगाना। बहू कितनी अच्छी चाय बनाती है, लेकिन नहीं, आपको तो मुझे ही दौड़ाना है,” सावित्री देवी ने अपना पीठ सहलाते हुए कहा।
“अच्छा लाओ, इधर दो अपना हाथ,” रघुनाथ जी ने अचानक चाय का कप नीचे रखते हुए कहा।
“क्यों? अब क्या हो गया?” सावित्री देवी ने झिझकते हुए पूछा।
“अरे दो तो सही,” रघुनाथ जी ने आगे बढ़कर अपनी पत्नी का झुर्रियों भरा हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम लिया और धीरे-धीरे उनकी कलाइयों और उँगलियों को दबाने लगे। “कितनी बार कहा है कि सुबह-सुबह थोड़ा मालिश कर लिया करो, लेकिन तुम्हें तो घर के कामों से फुरसत मिले तब ना।”
सावित्री देवी कुछ नहीं बोलीं, बस उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। दर्द से भरी उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी।
मीरा रसोई की खिड़की से यह सब देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस दृश्य को देखकर मुस्कुराए या फिर बाबूजी की इस अजीब सी जिद पर गुस्सा करे। आखिर एक तरफ तो वो माँ जी को इतना परेशान करते हैं और दूसरी तरफ हाथ भी दबा रहे हैं।
दिन बीतने लगे, लेकिन यह सुबह का सिलसिला कभी नहीं बदला। मीरा के मन में बाबूजी के प्रति एक हल्की सी नाराजगी घर कर गई थी। उसे लगता था कि बाबूजी का यह रवैया ठीक नहीं है।
एक रविवार की सुबह, जब सावित्री देवी की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी और उनके पैरों में सूजन आ गई थी, तब मीरा से रहा नहीं गया। उसने ठान लिया कि आज वह बाबूजी को खुद चाय देकर आएगी और उनसे साफ-साफ कह देगी कि वो माँ जी को इस तरह परेशान ना किया करें।
मीरा ने चाय बनाई और सीधे बरामदे में पहुँच गई। रघुनाथ जी अपने पौधों को पानी दे रहे थे।
“बाबूजी, आपकी चाय,” मीरा ने ट्रे आगे बढ़ाते हुए कहा।
रघुनाथ जी ने मुड़कर देखा और थोड़े आश्चर्य से बोले, “अरे बहू, तू क्यों ले आई? तेरी माँ जी कहाँ हैं? वो ठीक तो हैं ना?”
“बाबूजी, माँ जी के पैरों में बहुत सूजन है और कमर में भी दर्द है। उनसे चला नहीं जा रहा है। इसलिए आज चाय मैं ले आई,” मीरा ने थोड़ा रुखेपन से कहा।
रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।”
मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहूँ? जब आपको पता है कि माँ जी की तबीयत ठीक नहीं रहती, उन्हें चलने-फिरने में तकलीफ होती है, तो फिर आप रोज सुबह उन्हें चाय देने के लिए बाहर क्यों बुलाते हैं? क्या आप खुद अंदर जाकर चाय नहीं पी सकते? या मैं नहीं दे सकती आपको? उन्हें इतना कष्ट देना क्या ज़रूरी है?”
रघुनाथ जी ने मीरा की बातों को बहुत ध्यान से सुना। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक शांत और गहरी मुस्कान थी। उन्होंने चाय का कप मेज़ पर रखा और मीरा को अपने पास बैठने का इशारा किया।
“बैठो बहू,” रघुनाथ जी ने नरमी से कहा।
मीरा थोड़ा झिझकते हुए पास रखी कुर्सी पर बैठ गई।
रघुनाथ जी ने एक लंबी साँस ली और सामने खिले हुए गेंदे के फूलों को देखते हुए बोले, “तू ठीक कह रही है बहू। बाहर से देखने वाले को यही लगेगा कि मैं एक जिद्दी और अड़ियल बूढ़ा हूँ जिसे अपनी बीमार पत्नी की कोई परवाह नहीं है। लेकिन सच क्या है, यह शायद तू अभी नहीं समझ पाएगी।”
मीरा ने सवालिया नज़रों से उनकी तरफ देखा।
“तुझे क्या लगता है बहू, कि मुझे नहीं पता कि तेरी माँ जी के पैरों में दर्द रहता है? या मुझे यह नहीं पता कि तू उनसे लाख गुना अच्छी चाय बनाती है?” रघुनाथ जी हल्का सा हँसे।
“फिर क्यों बाबूजी?” मीरा ने पूछा।
“क्योंकि बहू, अगर मैं उन्हें चाय के बहाने बाहर नहीं बुलाऊँगा, तो वो पूरा दिन अपने उस अंधेरे कमरे में पलंग पर ही पड़ी रहेंगी,” रघुनाथ जी ने गंभीर स्वर में कहा। “डॉक्टर ने कहा है कि उनकी हड्डियों के लिए सुबह की ताज़ा धूप और चलना-फिरना बहुत ज़रूरी है। लेकिन तेरी माँ जी का स्वभाव तू जानती है। अगर मैं उनसे सीधे कहूँगा कि बाहर धूप में चलो या कसरत करो, तो वो कभी नहीं मानेंगी। कोई ना कोई बहाना बना देंगी।”
मीरा ध्यान से सुन रही थी।
“इसलिए,” रघुनाथ जी ने आगे कहा, “मैंने यह ज़िद पाल रखी है कि सुबह की चाय मुझे उनके ही हाथों की चाहिए। इसी बहाने वो बिस्तर से उठती हैं, थोड़े कदम चलती हैं, उनके पैरों की थोड़ी कसरत हो जाती है। और जब वो चाय लेकर यहाँ आती हैं, तो कम से कम पंद्रह-बीस मिनट मेरे साथ इस बेंच पर बैठती हैं। सुबह की गुनगुनी धूप उनके शरीर पर पड़ती है, ताज़ी हवा फेफड़ों में जाती है। यही उनका विटामिन डी है और यही उनका व्यायाम।”
मीरा अवाक रह गई। वह जो अब तक सोच रही थी, सच उसके बिल्कुल विपरीत था।
रघुनाथ जी की आँखें थोड़ी नम हो गईं। “और दूसरी बात बहू… ये उम्र का ऐसा पड़ाव है जहाँ हमारे पास एक-दूसरे के अलावा और कोई नहीं है। तुम बच्चे अपने कामों में व्यस्त हो। इस चाय के बहाने मुझे उसके साथ कुछ पल अकेले बिताने का मौका मिल जाता है। जब वो चाय देने आती है, तब मैं उसका हाथ पकड़ता हूँ, उसे सहारा देता हूँ। वो इसी बहाने मुझसे लड़ती है, शिकायतें करती है, और मुझे अच्छा लगता है। ये उसका झिड़कना, मेरा उसे चिढ़ाना… यही तो हमारे प्यार की भाषा है। अगर ये छोटी-छोटी नोकझोंक खत्म हो गई, तो हम दोनों तो अंदर से ही मर जाएँगे।”
मीरा की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसे अपने आप पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि उसने बाबूजी को कितना गलत समझा था। जिस चीज़ को वह उनका स्वार्थ समझ रही थी, वह दरअसल उनकी सबसे गहरी फिक्र और बेइंतहा प्यार था। एक ऐसा प्यार जिसे जताने के लिए उन्हें “आई लव यू” कहने की ज़रूरत नहीं थी, बल्कि उनकी वो झूठी डाँट और चाय की ज़िद ही उनके प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण थी।
“मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी। मैंने आपको बहुत गलत समझा,” मीरा ने रुंधे हुए गले से कहा।
रघुनाथ जी ने स्नेह से मीरा के सिर पर हाथ रखा। “अरे पगली, इसमें माफ़ी कैसी? तूने वही सोचा जो तुझे दिखा। लेकिन आज के बाद याद रखना, हर रिश्ते की अपनी एक अलग भाषा होती है। जरूरी नहीं कि प्यार हमेशा फूलों और मीठी बातों से ही जताया जाए। कभी-कभी किसी को जबरदस्ती धूप में बिठाना भी प्यार होता है।”
तभी अंदर से सावित्री देवी की आवाज़ आई, “अरे बहू! ये तुम्हारे बाबूजी अभी तक चाय पी रहे हैं या फिर मेरी बुराइयाँ कर रहे हैं तुम्हारे साथ बैठकर?”
रघुनाथ जी ने ज़ोर से ठहाका लगाया और बोले, “लो, आ गई इनकी आवाज़! लगता है इनकी सूजन कुछ कम हो गई है। जा बहू, जाकर अपनी माँ जी को बाहर ही ले आ। आज का नाश्ता हम सब यहीं धूप में बैठकर करेंगे।”
मीरा मुस्कुराते हुए अपनी सास को बुलाने अंदर चली गई। आज उसका मन बहुत हल्का था। उसने जीवन का एक बहुत बड़ा फलसफा सीख लिया था। उसे समझ आ गया था कि सच्चे जीवनसाथी का मतलब क्या होता है।
जब सावित्री देवी बाहर आईं, तो रघुनाथ जी ने तुरंत आगे बढ़कर उनका हाथ थाम लिया और उन्हें बेंच पर बिठाया। सावित्री देवी ने फिर से कोई शिकायत की, और रघुनाथ जी ने फिर से उन्हें चिढ़ाया। लेकिन आज, मीरा रसोई की खिड़की से यह सब देखकर गुस्सा नहीं हो रही थी। आज उसकी आँखों में एक सुकून था।
वह जानती थी कि ये दो बूढ़े दिल, जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं, वो एक-दूसरे की धड़कन बनकर जी रहे हैं। उनकी वो पुरानी लकड़ी की बेंच, सुबह की वो कड़क चाय और सूरज की गुनगुनी धूप… यही उनकी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें सिर्फ और सिर्फ एक अनकहा, गहरा और शाश्वत प्रेम बसता था।
जीवन की यही सच्चाई है। जब जवानी का जोश और रूप-रंग ढल जाता है, तब भी जो एक चीज़ हमेशा जवान रहती है, वो है परवाह। एक-दूसरे की छोटी-छोटी जरूरतों को समझना, बिना कहे उनके दर्द को महसूस करना और हर लड़ाई के बाद फिर से एक-दूसरे का हाथ थाम लेना।
उस दिन के बाद से मीरा ने कभी भी बाबूजी की उस ज़िद पर सवाल नहीं उठाया। बल्कि वह खुद इस बात का ध्यान रखती कि सुबह की चाय तैयार होने पर माँ जी ही उसे लेकर बाहर जाएँ। क्योंकि अब वह जान गई थी कि वो सिर्फ एक प्याली चाय नहीं थी, बल्कि उन दोनों के बीच बाँटी जाने वाली ज़िंदगी की संजीवनी थी।
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