“हाँ, मैंने गलती की। मैं धन बटोरने में अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है।” रघुनाथ जी का गला रुंध गया। “लेकिन सबसे बड़ा पाप जो हमने किया है, वह विक्रम को बिगाड़ना नहीं है। वह पाप है इस मासूम लड़की मीरा की जिंदगी बर्बाद करना। याद है तुम्हें? जब विक्रम को रिहैब सेंटर भेजना पड़ा था, तब तुमने अपनी झूठी इज्जत बचाने के लिए एक सीधे-सादे परिवार की लड़की ढूंढी। तुमने मुझे मजबूर किया कि मैं मीरा के पिता से झूठ बोलूं कि हमारा बेटा बहुत बड़ा बिजनेसमैन है।
रघुनाथ प्रताप सिंह के बड़े से पुश्तैनी बंगले में आज जो सन्नाटा पसरा था, वह किसी तूफान के गुजर जाने के बाद की शांति जैसा था। उस आलीशान घर के दालान में बिखरा हुआ खून का वह दाग चीख-चीख कर उस रिश्ते की गवाही दे रहा था, जो अब पूरी तरह से तार-तार हो चुका था। कुछ ही घंटों पहले उस घर की दीवारों ने एक बेटे की बदतमीजी और एक लाचार पिता की चीख सुनी थी। रघुनाथ जी का इकलौता बेटा विक्रम, जो शहर के सबसे नामी कॉलेज से पढ़ा तो था, लेकिन उसकी डिग्रियां शराब और जुए की लत के आगे कब की दम तोड़ चुकी थीं। आज सुबह भी वही हुआ जो पिछले कई सालों से इस घर की रोजमर्रा की कहानी बन चुका था। विक्रम नशे में धुत्त होकर घर आया और आते ही उसने जुए का कर्ज चुकाने के लिए एक बड़ी रकम की मांग कर दी। रघुनाथ जी, जो अब तक उसकी हर गलती पर पर्दा डालते आए थे, आज उनका धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने जब साफ शब्दों में पैसे देने से इंकार कर दिया, तो विक्रम की आंखों में खून उतर आया। नशे और गुस्से में अंधे हो चुके विक्रम ने अपने सत्तर वर्षीय पिता को इतनी जोर से धक्का दिया कि रघुनाथ जी का संतुलन बिगड़ गया और उनका सिर पास रखे भारी शीशे के मेज से जा टकराया। खून का फव्वारा फूट पड़ा और वे वहीं अचेत होकर गिर पड़े।
उस वक्त घर में विक्रम की माँ कौशल्या और पत्नी मीरा मौजूद नहीं थीं। दोनों किसी रिश्तेदार के यहाँ गृह-प्रवेश के पूजा में गई हुई थीं। घर का पुराना नौकर रामू जब बगीचे से पौधे सींच कर लौटा, तो दालान का दृश्य देखकर उसकी चीख निकल गई। विक्रम तब तक अपने पिता को उसी हालत में छोड़कर वहां से फरार हो चुका था। रामू ने बिना समय गंवाए एंबुलेंस बुलाई और रघुनाथ जी को शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती कराया। जब डॉक्टरों ने रघुनाथ जी के होश में आने पर पुलिस को बुलाने और चोट का कारण पूछा, तो एक मजबूर पिता की ममता फिर आड़े आ गई। उन्होंने अपनी नम आंखों को छिपाते हुए धीमी आवाज में कह दिया कि उनका पैर सीढ़ियों से फिसल गया था। डॉक्टरों को भी उनकी बात पर पूरी तरह यकीन नहीं हुआ, लेकिन मरीज के बयान के आगे वे मजबूर थे। उम्र के इस पड़ाव पर हड्डियों को जुड़ने में वक्त लगता है, इसलिए रघुनाथ जी को कुछ हफ्तों के लिए अस्पताल में ही रहना था। लेकिन शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा बड़ा वह घाव था, जो उनके बेटे ने उनके स्वाभिमान और आत्मा पर दिया था। बिस्तर पर लेटे-लेटे उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उन्हें अपने बेटे की चोट से ज्यादा उस गुनाह का पछतावा हो रहा था, जो उन्होंने और उनकी पत्नी ने एक मासूम लड़की के साथ किया था।
रामू का फोन पाकर बदहवास हालत में कौशल्या और मीरा अस्पताल पहुंचीं। मीरा के चेहरे पर खौफ और चिंता साफ झलक रही थी, जबकि कौशल्या रो-रो कर बुरा हाल कर चुकी थीं। अभी वे रघुनाथ जी के पास पहुंचकर उनका हालचाल पूछ ही रही थीं कि कमरे का दरवाजा खुला और शहर के जाने-माने वकील शर्मा जी अपने हाथ में एक फाइल लिए अंदर दाखिल हुए।
कौशल्या शर्मा जी को इस वक्त अस्पताल में देखकर हैरान रह गईं। वह कुछ पूछ पातीं, उससे पहले ही शर्मा जी ने फाइल रघुनाथ जी के सामने कर दी। रघुनाथ जी ने चश्मा पहना, पन्नों को एक बार गौर से देखा और बिना किसी झिझक के उन पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।
कौशल्या की बेचैनी अब बर्दाश्त के बाहर हो गई थी। उन्होंने लगभग कांपती हुई आवाज में पूछा, “यह सब क्या है जी? आप इस हालत में अस्पताल के बिस्तर पर कौन से कागजों पर दस्तखत कर रहे हैं? अभी तो आपको आराम की जरूरत है, व्यापार और जायदाद के काम तो बाद में भी हो सकते हैं।”
रघुनाथ जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों में अब वह कमजोरी नहीं थी जो थोड़ी देर पहले थी। उनमें एक अजीब सा दृढ़ निश्चय झलक रहा था। उन्होंने कौशल्या की आंखों में सीधा देखते हुए कहा, “आराम तो मुझे तब मिलेगा कौशल्या, जब मैं अपने किए गए पापों का प्रायश्चित कर लूंगा। मैंने अपनी तमाम चल-अचल संपत्ति, अपने सारे बैंक अकाउंट्स, व्यापार का पूरा हिस्सा और वह पुश्तैनी बंगला… सब कुछ अपनी बहू मीरा के नाम कर दिया है।”
यह सुनते ही कमरे में जैसे बम फट गया। कौशल्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। “क्या कह रहे हैं आप? आपका दिमाग तो ठिकाने पर है? मेरे जीते-जी, आपके जीते-जी इस घर की पूरी चाबी, सारा मालिकाना हक आप इस बहू को दे देंगे? यह क्या पागलपन है!” कौशल्या गुस्से से आगबबूला हो उठीं।
रघुनाथ जी की आवाज में एक गजब की शांति और ठहराव था, “पागलपन यह नहीं है कौशल्या। पागलपन तो वह था जो हम पिछले तीस सालों से करते आ रहे हैं। हम बूढ़े हो रहे हैं। हमारी हड्डियां अब कमजोर हो चुकी हैं। विक्रम हमें नोच-नोच कर खा जाएगा। वह सारी संपत्ति जुए और शराब में उड़ा देगा और अंत में हमें और इन मासूम पोते-पोतियों को सड़क पर लाकर खड़ा कर देगा। इसलिए मैंने यह फैसला लिया है। अब कम से कम मेरे पोते-पोतियों की शिक्षा, उनका भविष्य और इस घर की इज्जत सुरक्षित रहेगी।”
कौशल्या अभी भी हार मानने को तैयार नहीं थीं। “यह सब तो मैं भी कर सकती थी! आप मेरे नाम सब कुछ कर देते। मैं अपने बेटे को सुधार लेती। मैं घर भी चला लेती। आपने मुझे इस लायक भी नहीं समझा?”
रघुनाथ जी के होठों पर एक कड़वी मुस्कान तैर गई। “तुम सुधारती? तुमने आज तक उसे सुधारा ही कब है? याद करो वो दिन जब उसने पहली बार स्कूल से पैसे चुराए थे, तुमने उसे सजा देने के बजाय मुझे झूठ बोला। जब वह कॉलेज में दोस्तों के साथ शराब पीकर घर आया था, तब मैंने उसे घर से निकालना चाहा था, लेकिन तुम बीच में आ गई थीं। तुमने अपने अंधेप्यार में उसे पैसे दिए, उसकी हर गलती पर पर्दा डाला। उसी का नतीजा है कि आज वह मुझे मार कर खून से लथपथ छोड़कर भाग गया। तुम गांधारी बन चुकी हो कौशल्या, जिसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है।”
कौशल्या भी अब बचाव की मुद्रा में आ गईं, “सारा दोष मेरा ही है? आप क्या कर रहे थे? आप तो बस पैसे कमाने में लगे रहे। व्यापार के नाम पर महीनों घर से गायब रहते। मैं अकेली एक जवान लड़के को कैसे संभालती? मैंने तो बस उसे प्यार दिया था।”
“हाँ, मैंने गलती की। मैं धन बटोरने में अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है।” रघुनाथ जी का गला रुंध गया। “लेकिन सबसे बड़ा पाप जो हमने किया है, वह विक्रम को बिगाड़ना नहीं है। वह पाप है इस मासूम लड़की मीरा की जिंदगी बर्बाद करना। याद है तुम्हें? जब विक्रम को रिहैब सेंटर भेजना पड़ा था, तब तुमने अपनी झूठी इज्जत बचाने के लिए एक सीधे-सादे परिवार की लड़की ढूंढी। तुमने मुझे मजबूर किया कि मैं मीरा के पिता से झूठ बोलूं कि हमारा बेटा बहुत बड़ा बिजनेसमैन है। तुमने कहा था कि शादी के बाद एक अच्छी पत्नी आएगी तो लड़का अपने आप सुधर जाएगा। क्या सुधरा वो? नहीं! हमने अपनी बीमारी का इलाज एक मासूम लड़की की जिंदगी की कीमत पर किया।”
रघुनाथ जी की बातें सुनकर मीरा, जो अब तक चुपचाप कोने में खड़ी थी, उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। वह दर्द जो उसने सालों से अपने सीने में दबा रखा था, आज उसके ससुर की जुबान से बह रहा था।
“मैं अब और कोई गलती नहीं करूँगा,” रघुनाथ जी ने फैसला सुनाते हुए कहा। “मीरा पढ़ी-लिखी है। वह समझदार है। मुझे उस पर पूरा भरोसा है। संपत्तियों से जो भी किराया आएगा, व्यापार से जो मुनाफा होगा, वह सब अब मीरा के हस्ताक्षर से ही निकलेगा। अब से इस परिवार की मुखिया मीरा है।”
कौशल्या सुबकते हुए बोलीं, “और मेरा क्या? क्या मैं अब इस घर में दाने-दाने को मोहताज हो जाऊंगी? आप मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ रहे?”
“मेरी पेंशन तुम्हारे और मेरे खाने-पीने के लिए बहुत है कौशल्या। तुम्हें अब यह सजा भुगतनी होगी। तुम्हें अब अपनी बहू के अधीन रहना होगा।”
यह सुनकर कौशल्या का अहंकार तिलमिला उठा। अस्पताल से घर लौटते ही उनका गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। घर के दरवाजे पर कदम रखते ही उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे मीरा के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। “चुड़ैल! पता नहीं कौन सा जादू कर दिया है मेरे पति पर कि उन्होंने अपने ही खून को बेदखल कर दिया और सब कुछ तेरे नाम कर दिया!”
मीरा अवाक रह गई। वह लड़की जिसने शादी के बाद से शराबी पति की मार सही, सास के ताने सहे, और कभी उफ्फ तक नहीं की, आज उसी सास ने उस पर हाथ उठाया था। मीरा का सब्र टूट गया। उसने एक शब्द नहीं कहा। वह सीधे अपने कमरे में गई, सूटकेस निकाला और अपने कपड़े पैक करने लगी। कौशल्या ने सोचा कि वह सिर्फ नाटक कर रही है, लेकिन जब मीरा सूटकेस लेकर मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ी, तब कौशल्या के होश उड़ गए।
अगर मीरा आज यह घर छोड़कर चली गई, तो उनके पास कुछ नहीं बचेगा। विक्रम के पास पैसे नहीं थे, रघुनाथ जी ने सब कुछ मीरा के नाम कर दिया था। कौशल्या का सारा गुरूर पल भर में टूट गया। वह भागकर दरवाजे पर गई और मीरा के पैरों में गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दे बेटी! मैं अंधी हो गई थी। तू चली गई तो हम सड़क पर आ जाएंगे। तेरा पति वैसे ही किसी दिन नाली में पड़ा मिलेगा। मुझे मत छोड़ कर जा।”
मीरा ने अपनी सास को उठाया। उसकी आंखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने फैसला किया कि वह भागेगी नहीं, बल्कि अपने ससुर द्वारा दी गई इस जिम्मेदारी को निभाएगी।
कुछ ही दिनों में मीरा ने घर और व्यापार की पूरी कमान अपने हाथों में ले ली। जब विक्रम वापस घर लौटा और उसने हमेशा की तरह तिजोरी की चाबी मांगी, तो मीरा ने साफ इंकार कर दिया। विक्रम ने हंगामा करना चाहा, लेकिन मीरा ने उसे स्पष्ट बता दिया कि अब घर का एक भी पैसा उसके नशे के लिए नहीं जाएगा। विक्रम ने अपनी माँ की तरफ देखा, लेकिन कौशल्या अब अपनी नजरें झुकाए खड़ी थीं। विक्रम को समझ आ गया कि पासा पलट चुका है। अब सत्ता उसकी पत्नी के हाथों में है।
शुरुआत में विक्रम ने बहुत विद्रोह किया, घर का सामान तोड़ा, लेकिन मीरा टस से मस नहीं हुई। उसने विक्रम का बाहर निकलना बंद करवा दिया और पैसे का एक-एक रास्ता ब्लॉक कर दिया। हारकर, जब नशे की तलब ने विक्रम को तोड़ दिया, तब मीरा ने उसके सामने शर्त रखी—या तो वह रिहैब सेंटर जाए और खुद को सुधारे, या फिर इस घर से हमेशा के लिए चला जाए। मजबूर होकर विक्रम को रिहैब सेंटर जाना पड़ा।
महीनों बीत गए। मीरा की सख्ती और सूझबूझ ने घर की स्थिति को पूरी तरह बदल दिया था। व्यापार फिर से मुनाफे में आ गया था। कौशल्या अब मीरा को अपनी बेटी से ज्यादा मानने लगी थीं। उन्हें समझ आ गया था कि उनका अंधा प्यार उनके बेटे को बर्बाद कर रहा था, जबकि मीरा का कठोर कदम उसे बचा रहा था।
करीब एक साल बाद जब विक्रम रिहैब से पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटा, तो वह एक बदला हुआ इंसान था। उसने आकर सबसे पहले अपने पिता के पैर छुए और रोते हुए माफी मांगी। रघुनाथ जी ने उसे गले लगा लिया।
रघुनाथ जी अब शारीरिक रूप से कमजोर जरूर हो गए थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उन्होंने जो वसीयत बनाई थी, वह महज कागज के चंद टुकड़े नहीं थे। वह एक पिता का प्रायश्चित था। एक ऐसा प्रायश्चित जिसने ना सिर्फ एक मासूम लड़की को उसका हक दिलाया, बल्कि एक भटकते हुए बेटे को जीवन की सही राह पर ला खड़ा किया। मीरा, जो कभी इस घर में सिर्फ एक बेबस बहू बनकर आई थी, आज इस परिवार की सबसे मजबूत ढाल बन चुकी थी। रघुनाथ जी की आत्मा का बोझ अब पूरी तरह उतर चुका था, क्योंकि उन्होंने रिश्ते की मोह-माया से ऊपर उठकर न्याय को चुना था।
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लेखिका : रमा शुक्ला