घरवाला

क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि तुम एक ‘औरत’ का काम कर रहे हो? या शिखा तुम पर हुक्म चला रही है?” समीर ने झिझकते हुए वह सवाल पूछ ही लिया जो उसके मन में अटका था।

अभिनव ज़ोर से हंस पड़ा। उसकी हंसी में कोई बनावट नहीं थी। “औरत का काम? खाना पकाना जीवन जीने की एक बुनियादी कला है मेरे भाई, यह किसी जेंडर का पेटेंट नहीं है। रही बात हुक्म चलाने की, तो जहाँ प्यार और सम्मान होता है, वहाँ हुक्म नहीं चलता, वहाँ सिर्फ समझदारी चलती है। शिखा ने मुझे कभी खाना बनाने के लिए नहीं कहा। यह मेरी अपनी चॉइस है।

दोपहर के ठीक एक बज चुके थे। शहर के बीचों-बीच स्थित उस बहुमंजिला आईटी कंपनी के आठवें फ्लोर का कैफेटेरिया कर्मचारियों की चहल-पहल से गूंज रहा था। काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से बाहर की भागती-दौड़ती ज़िंदगी साफ नज़र आ रही थी, लेकिन कैफेटेरिया के अंदर हर कोई अपने कुछ पलों के सुकून को समेटने में लगा था। इसी भीड़-भाड़ के बीच, कोने की एक टेबल पर बैठे थे समीर और अभिनव। दोनों एक ही प्रोजेक्ट पर काम करते थे और पिछले तीन सालों से अच्छे दोस्त भी थे।

समीर ने एक गहरी सांस लेते हुए अपना टिफिन खोला। आज फिर से वही सूखी आलू की सब्जी और सुबह की बनी हुई रोटियां थीं, जो अब तक थोड़ी कड़क हो चुकी थीं। समीर के चेहरे पर एक निराशा का भाव तैर गया। उसने मन ही मन सोचा कि आखिर कब उसे भी लंच में कुछ अच्छा और ताज़ा खाने को मिलेगा।

तभी उसकी नज़र अभिनव के टिफिन पर पड़ी, जिसे वह अभी-अभी खोल रहा था। टिफिन खुलते ही मसालों की एक हल्की और बेहद लुभावनी महक उठी। पहले डिब्बे में से शाही पनीर की खुशबू आ रही थी, जिसकी ग्रेवी का रंग देखकर ही भूख दोगुनी हो जाए। दूसरे डिब्बे में नरम, परतदार जीरा पराठे करीने से रखे हुए थे, और तीसरे में ताज़ा कटा हुआ खीरे और गाजर का सलाद था।

समीर से रहा नहीं गया। उसने अपनी आलू की सब्जी को एक तरफ खिसकाते हुए कहा, “यार अभिनव, सच में तुम इस पूरी कंपनी में सबसे खुशकिस्मत इंसान हो। मैं तो रोज़ देखता हूँ, तुम्हारे लंचबॉक्स में किसी फाइव-स्टार होटल जैसा खाना होता है। कभी स्टफ्ड शिमला मिर्च, कभी मलाई कोफ्ता, तो आज यह लज़ीज़ शाही पनीर।”

अभिनव ने मुस्कुराते हुए अपना टिफिन समीर की तरफ थोड़ा खिसका दिया और बोला, “खाकर देखो, आज मसाले थोड़े अलग डाले हैं।”

समीर ने पनीर का एक टुकड़ा तोड़ा और मुंह में रखते ही उसकी आँखें खुशी से बंद हो गईं। “वाह! क्या बात है! यार, मानना पड़ेगा, तुम्हारी पत्नी शिखा जी के हाथों में तो साक्षात अन्नपूर्णा का वास है। वह खुद भी एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर हैं, दिन भर काम करती हैं, फिर भी तुम्हारे लिए सुबह-सुबह उठकर इतनी मेहनत से ऐसा लाजवाब खाना बनाती हैं। मेरी वाली को तो देख लो, उसे भी सुबह ऑफिस जाना होता है, तो बस किसी तरह खानापूर्ति कर देती है। कहती है कि सुबह टाइम नहीं मिलता। काश! मेरी पत्नी भी शिखा जी की तरह घर और बाहर दोनों को इतनी खूबी से संभाल पाती।”

समीर की बातों में अपनी पत्नी के प्रति एक छिपी हुई शिकायत और शिखा के लिए बहुत सारा सम्मान था। उसे लगा कि उसकी बात सुनकर अभिनव गर्व से मुस्कुराएगा और अपनी पत्नी की और तारीफ करेगा।

लेकिन अभिनव की मुस्कान अचानक थोड़ी गंभीर हो गई। उसने पानी का घूंट पिया और समीर की आँखों में देखते हुए बड़ी ही शांति से कहा, “समीर भाई, तुम मेरी किस्मत की तारीफ कर रहे हो, यह बहुत अच्छी बात है। और हाँ, शिखा वाकई में बहुत बेहतरीन इंसान है। लेकिन तुम्हें एक छोटी सी गलतफहमी हो गई है।”

“गलतफहमी? कैसी गलतफहमी?” समीर ने पराठे का दूसरा टुकड़ा तोड़ते हुए पूछा।

“यही कि यह शाही पनीर और यह सारा लज़ीज़ खाना शिखा ने बनाया है,” अभिनव ने कहा।

समीर का हाथ बीच में ही रुक गया। वह हैरानी से अभिनव को देखने लगा। “क्या मतलब? तो क्या तुमने कोई कुक लगा रखा है? या तुम्हारी माँ आई हुई हैं आजकल?”

अभिनव ने हल्की सी हंसी के साथ अपना सिर हिलाया। “नहीं यार, न तो कोई कुक है और न ही माँ यहाँ हैं। सच तो यह है कि पिछले तीन सालों से मेरे टिफिन में आने वाली ज़्यादातर सब्जियाँ, दालें और ये शाही पनीर जैसी चीज़ें मैं खुद बनाता हूँ।”

समीर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। “तुम? तुम मज़ाक कर रहे हो ना अभिनव? तुम ऑफिस के इतने बड़े प्रोजेक्ट लीड करते हो, रात-रात भर तुम्हारी क्लाइंट कॉल चलती हैं, और तुम सुबह उठकर खाना बनाते हो?”

अभिनव ने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया, “हाँ, बिल्कुल। इसमें मज़ाक की क्या बात है? तुम इन नरम परतदार पराठों के लिए शिखा की तारीफ कर सकते हो, क्योंकि आटा गूंथने से लेकर पराठे सेंकने का काम उसी का होता है। लेकिन जहाँ तक सब्ज़ियों और दाल का सवाल है, वह डिपार्टमेंट मेरा है।”

समीर का दिमाग इस जानकारी को प्रोसेस करने में थोड़ा समय ले रहा था। जिस समाज में वह पला-बढ़ा था, वहाँ रसोई को पूरी तरह से औरतों का साम्राज्य माना जाता था। पुरुष का काम सिर्फ कमाना और बाहर के काम देखना होता था।

“लेकिन यार… तुम दोनों ही तो वर्किंग हो। तुम भी थकते हो, वह भी थकती है। फिर तुम सुबह रसोई में क्यों जाते हो? मेरा मतलब है, लड़कियाँ तो यह सब मैनेज कर ही लेती हैं न?” समीर ने अपनी संकीर्ण सोच को अनजाने में ही ज़ाहिर कर दिया।

अभिनव ने समीर की बात को बहुत ध्यान से सुना। उसे समीर पर गुस्सा नहीं आया, बल्कि उसे लगा कि शायद समीर को ज़िंदगी के उस पहलू को समझाने की ज़रूरत है जो उसने कभी देखा ही नहीं।

“समीर,” अभिनव ने समझाते हुए कहा, “शादी कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है जहाँ काम जेंडर के हिसाब से बंटे हों। जब घर हम दोनों का है, भूख हम दोनों को लगती है, और ऑफिस हम दोनों जाते हैं, तो घर की ज़िम्मेदारी सिर्फ शिखा की कैसे हो सकती है? तुम ज़रा हमारी सुबह की कल्पना करो। सुबह के छह बजते हैं। शिखा उठकर सबसे पहले हमारी पाँच साल की बेटी रिया को जगाने और तैयार करने की मशक्कत करती है। बच्चों को सुबह उठाना कितना मुश्किल होता है, यह तो तुम जानते ही हो।”

समीर ने हामी में सिर हिलाया।

“उसी दौरान, मैं रसोई में जाता हूँ,” अभिनव आगे बोला। “मैं सब्जियाँ काटता हूँ, छौंक लगाता हूँ, मसालों की महक के साथ सुबह की शुरुआत करता हूँ। जब तक मेरी सब्जी पकती है, शिखा रिया को तैयार करके रसोई में आ जाती है। वह तेजी से आटा गूंथती है और रोटियां सेंकने लगती है। मैं दूसरी तरफ बच्चों का और हमारा टिफिन पैक करता हूँ। हम दोनों बिना कुछ ज़्यादा बोले, बिना एक-दूसरे को निर्देश दिए, बस अपना-अपना काम करते हैं। सिर्फ पैंतालीस मिनट में हमारा नाश्ता और लंच दोनों तैयार हो जाता है। फिर हम साथ बैठकर नाश्ता करते हैं। मैं रिया को उसके स्कूल छोड़ता हूँ और अपने ऑफिस आ जाता हूँ, और शिखा अपनी गाड़ी से अपने ऑफिस निकल जाती है।”

समीर यह सब सुनकर सुन्न सा रह गया था। उसने कभी किसी पति-पत्नी के बीच इस तरह के सामंजस्य के बारे में सोचा ही नहीं था। वह हमेशा यही सोचता था कि उसकी पत्नी सुबह उठकर सब कुछ जादू की तरह कर दे, और वह बस आराम से उठकर तैयार होकर ऑफिस आ जाए।

“लेकिन अभिनव, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि तुम एक ‘औरत’ का काम कर रहे हो? या शिखा तुम पर हुक्म चला रही है?” समीर ने झिझकते हुए वह सवाल पूछ ही लिया जो उसके मन में अटका था।

अभिनव ज़ोर से हंस पड़ा। उसकी हंसी में कोई बनावट नहीं थी। “औरत का काम? खाना पकाना जीवन जीने की एक बुनियादी कला है मेरे भाई, यह किसी जेंडर का पेटेंट नहीं है। रही बात हुक्म चलाने की, तो जहाँ प्यार और सम्मान होता है, वहाँ हुक्म नहीं चलता, वहाँ सिर्फ समझदारी चलती है। शिखा ने मुझे कभी खाना बनाने के लिए नहीं कहा। यह मेरी अपनी चॉइस है। जब मैंने देखा कि सुबह वो कितनी परेशान हो जाती है—रिया के नखरे, ऑफिस की टेंशन, और फिर रसोई—तो मुझे लगा कि मुझे एक पार्टनर की तरह उसका साथ देना चाहिए, न कि एक मेहमान की तरह सोफे पर बैठकर चाय का इंतज़ार करना चाहिए।”

अभिनव की बातों में इतनी गहराई और सच्चाई थी कि समीर को अपने अंदर झाँकने पर मजबूर होना पड़ा। उसे याद आया कि कैसे आज सुबह जब उसकी पत्नी नीता ने कहा था कि आज वह बहुत थक गई है और सिर्फ आलू की सब्जी बना रही है, तो समीर ने कितना हंगामा किया था। उसने नीता को ताना मारा था कि वह घर को ठीक से नहीं संभाल पा रही है। नीता की आँखों में उस वक्त जो बेबसी और उदासी थी, वह अब समीर की आँखों के सामने तैरने लगी। नीता भी तो उसी की तरह आठ घंटे की नौकरी करती थी, ट्रैफिक से जूझकर घर आती थी, और फिर रात का खाना बनाती थी। समीर ने कभी एक गिलास पानी भी खुद लेकर नहीं पिया था।

“तुम्हें पता है समीर,” अभिनव ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “सच्ची खुशी और शांति किसी महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाने से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब आप अपने जीवनसाथी के साथ रसोई में खड़े होकर एक-दूसरे का हाथ बंटाते हैं। जब मैं सब्जी में नमक डालता हूँ और शिखा पीछे से आकर चखती है और कहती है ‘परफेक्ट है’, तो वो जो पल होता है ना, उसमें हमारे रिश्ते की मिठास और बढ़ जाती है। इसे मैं कोई काम नहीं मानता, बल्कि यह हमारे बीच का एक सुंदर और बिना शब्दों का संवाद है। यह कोई समझौते वाला तालमेल नहीं है भाई, यह एक प्यार भरा सुंदर तालमेल है, एक मीठी साझेदारी है।”

अभिनव ने मुस्कुराते हुए अपने हाथ से बनाए हुए पनीर के साथ शिखा के हाथ का बना एक और पराठा तोड़ा और समीर की प्लेट में रख दिया।

समीर ने उस निवाले को उठाया। इस बार जब उसने उसे खाया, तो उसे सिर्फ मसालों का स्वाद नहीं आ रहा था, बल्कि उसे उस निवाले में एक दूसरे के प्रति सम्मान, बराबरी, और उस अनकहे प्यार का स्वाद महसूस हो रहा था जिसकी कमी उसके खुद के वैवाहिक जीवन में थी। उसके चेहरे पर एक सुखद लेकिन पश्चाताप से भरी मुस्कान आ गई।

“क्या हुआ?” अभिनव ने पूछा।

“कुछ नहीं,” समीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा। “बस आज तुमने मुझे एक बहुत बड़ा सबक दे दिया है। तुम्हारे इस शाही पनीर और तुम दोनों पति-पत्नी के इस प्यार भरे सुंदर तालमेल ने मेरी आँखें खोल दी हैं। कल से तुम्हें मेरे टिफिन में सिर्फ सूखी आलू की सब्जी नहीं मिलेगी। कल का लंच मैं खुद बनाऊंगा, और नीता को थोड़ा आराम दूंगा।”

यह सुनकर अभिनव के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान फैल गई। दोनों दोस्त जोर से हंस पड़े और उन्होंने बाकी का लंच एक नई सोच और एक नई शुरुआत की खुशी के साथ खत्म किया।

दोस्तों, ज़िंदगी की गाड़ी दो पहियों पर चलती है। अगर एक पहिए पर ज़्यादा बोझ डाल दिया जाए, तो गाड़ी का डगमगाना तय है। लेकिन जब दोनों पहिए बराबर ज़िम्मेदारी उठाते हैं, तो सफर चाहे कितना भी लंबा और मुश्किल क्यों न हो, वह एक खूबसूरत यात्रा बन जाता है। क्या आपने अपने घर में इस मीठी साझेदारी की शुरुआत की है?

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लेखिका : नेहा पटेल

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