अतिथि देवो भव – प्रतिमा श्रीवास्तव

इंसान दौलत भले ही कम कमाए पर परिवार का साथ हो तो हर तकलीफ से निकल ही जाता है। परिवार ऐसी पूंजी है जिसमें हमें बहुत कुछ लगाना होता है बेटा।सब कुछ सब का है, अपने से पहले अपने परिवार को अहमियत देना और अपनों की खुशी  खुद से पहले सोचना, त्याग, धैर्य, सम्मान और … Read more

सच्ची अमीरी

लॉन में बैठी मालती देवी बुत बनकर यह पूरा नज़ारा देख रही थीं। उनके हाथों में पकड़ी हुई नीली रजाई अब उन्हें कांटों की तरह चुभने लगी थी। उनकी रईसी, उनका बड़ा घर, और उनके महँगे कपड़े—सब कुछ उस गरीब बंजारन के उस एक कृत्य के सामने बौने पड़ गए थे।  दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड … Read more

आँगन की नई धूप

सुमित्रा जी के हाथों में चाय की दो प्यालियां थीं, जिनसे उठती भाप सुबह की शांति में घुल रही थी। आज रविवार था, छुट्टी का दिन। सुमित्रा जी के कदमों की आहट बहुत धीमी थी, मानो वो इस शांत सुबह की लय को तोड़ना नहीं चाहती थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान थी, … Read more

पिता के हिस्से का आसमान

  मीरा कल ही अपने पति के साथ रोहन के नए घर को देखने और कुछ दिन साथ बिताने के लिए आई थी। “तूने बाबूजी को रामेश्वरम और तिरुपति के दर्शन करवा कर बहुत बड़ा पुण्य का काम किया है रोहन,” मीरा ने एल्बम का पन्ना पलटते हुए कहा, जिसमें दीनानाथ जी एक मंदिर के प्रांगण … Read more

कशमकश – प्रतिमा श्रीवास्तव

लड़कियों की उम्र गुजर जाती है दो घरों को आपस में बांधने की लेकिन सच कहूं तो वही घर हमेशा की तरह इतिहास दोहराते हुए प्रश्न पूछ ही बैठता है कि आखिर कौन से घर को वो अपना कहें? एक मायका जहां के आंगन के हर कोनों में उसकी मौजूदगी दर्ज है,दूसरा ससुराल जहां वो … Read more

बिखरे धागों की डोर – कंचन श्रीवास्तव 

 “पापा, जिंदगी बहुत छोटी है। हम साल में एकाध बार तो घर आते हैं, उसमें भी अगर आप लोग इन्हीं पुरानी बातों और जायदाद के झगड़ों को लेकर बैठे रहेंगे, तो हम यहां वापस आना ही छोड़ देंगे। हम बड़े शहरों में अकेले रहते हैं, हमें परिवार की अहमियत पता है। आप लोग साथ रहते … Read more

रिश्तों की अटूट छाँव – रणजीत सिंह भाटिया

मुझे कभी एक पल के लिए भी यह महसूस नहीं हुआ कि मेरा कोई बेटा नहीं है। जिस दिन आरती का रिश्ता पक्का हुआ, अविनाश और कुणाल ने आकर मुझे सोफे पर बैठा दिया और कहा, “जीजा जी, आरती हमारी भी बेटी है। आप सिर्फ आशीर्वाद दीजिए, बाकी मंडप से लेकर विदाई तक की सारी … Read more

मायके की दहलीज और बंदिशें

विवेक आज सुबह से ही बेहद खुश था। उसके चेहरे की रौनक और पैरों की थिरकन साफ बता रही थी कि उसके मन की कोई मुराद पूरी होने वाली है। वजह सिर्फ इतनी थी कि थोड़ी देर पहले ही उसकी पत्नी, काव्या ने अपने मायके जाने की बात कही थी। जब भी काव्या अपने माता-पिता … Read more

बहू का मायका – अनामिका मिश्रा

 शादी के सात साल बीत चुके थे, लेकिन इन सात सालों में अंजलि ने कभी खुद को पहले स्थान पर नहीं रखा। वह उस मध्यमवर्गीय संस्कार की उपज थी जहाँ सिखाया जाता है कि ‘सबकी खुशी में ही तुम्हारी खुशी है’। पिछले तीन सालों से वह अपने पिता के घर, यानी अपने मायके नहीं जा … Read more

तीसरी दस्तक: किस्मत का फैसला – रीता मक्कड़

  सरिता रसोई में बड़े ही जतन से दही और चीनी मिला रही थी। बाहर हॉल में चहल-पहल थी। आज उनकी सबसे छोटी बेटी, ईशानी, अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि की ओर कदम बढ़ाने वाली थी। वह आज शहर के जिला अस्पताल में ‘चीफ मेडिकल ऑफिसर’ के रूप में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने वाली थी। … Read more

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