शारदा जी के भीतर न जाने कहाँ से एक अजीब सा साहस जागा। उन्होंने व्हीलचेयर को बिस्तर के पास लगाया। अपने पूरे शरीर का बल लगाकर, हांफते हुए उन्होंने ओंकारनाथ जी को सहारा दिया और खींचकर व्हीलचेयर पर बिठाया। ओंकारनाथ जी डर गए कि कहीं वे गिर न जाएं, पर शारदा जी के चेहरे पर उस दिन एक अनोखा दृढ़ संकल्प था। उन्होंने उनके पैरों पर एक गर्म शॉल डाली और व्हीलचेयर को धकेलते हुए फ्लैट के मुख्य लिविंग रूम से होती हुई बड़ी बालकनी के स्लाइडिंग दरवाजे तक ले आईं।
शारदा जी कांच की बड़ी खिड़की के पास रखी बेंत की पुरानी कुर्सी पर बैठी थीं। सामने का दृश्य किसी अंधी दौड़ जैसा था। चौबीसवीं मंजिल से नीचे की सड़कें पतली लकीरों जैसी दिखती थीं, जिन पर चींटियों की मानिंद गाड़ियाँ सरक रही थीं। लोग इतने बौने लग रहे थे मानो कोई खिलौना चाबी भरकर छोड़ दिया गया हो। यह शाम का वही पहर था जब उनके अपने कस्बे में मंदिरों के घंटे बजने लगते थे, चौपाल पर बूढ़े-बुजुर्ग अपनी लाठियां टिकाए बतकही शुरू कर देते थे, और घर के आंगन में तुलसी के चबूतरे पर दीया जलाया जाता था। यहाँ दूर-दूर तक केवल कंक्रीट की चट्टानें खड़ी थीं, जिनमें न कोई खुशबू थी, न कोई अपनापन।
लगभग बारह वर्ष बीत गए थे उस कस्बे को छूटे, जहाँ शारदा जी का बचपन बीता, जवानी संवरी और गृहस्थी की जड़ें गहरी हुईं। मगर यह शहर आज भी उन्हें पराया ही लगता था। यहाँ की हवा में एक अजीब सा सूखापन था जो सीधे रूह को छू जाता था। न कोई पड़ोसी हाल-चाल पूछने आता, न किसी दरवाजे की सांकल खड़कती। फ्लैटों के भारी लकड़ी के दरवाजे हमेशा ऐसे बंद रहते जैसे कोई गहरा राज छिपा रहे हों। शारदा जी अक्सर सोचतीं कि इंसान ने तरक्की के नाम पर अपने ही बनाए संकरे कमरों में खुद को कैद कर लिया है।
अचानक शयनकक्ष से एक धीमी, अस्पष्ट सी घुरघुराहट और चादर के सरकने की आवाज़ आई। शारदा जी का तंद्रा-भंग हुआ। वे हड़बड़ाकर उठीं और सधे हुए, पर तेज़ कदमों से कमरे की ओर लपकीं। बिस्तर पर लेटे ओंकारनाथ जी का बायां हाथ हवा में कुछ टटोल रहा था। उनका चेहरा पसीने से भीगा था और वे खुद को थोड़ा ऊपर खींचने की असफल चेष्टा कर रहे थे।
“अरे, ठहरिए… इतनी हड़बड़ी क्यों करते हैं? मैं यहीं तो थी,” शारदा जी ने मृदु स्वर में कहा और दोनों हाथों से उनकी पीठ को सहारा देकर तकिये के सहारे थोड़ा ऊंचा बिठाया। उन्होंने तौलिए से उनका माथा पोंछा, तांबे के लोटे से गुनगुना पानी निकाला और छोटी कटोरी-चम्मच से घूंट-घूंट पिलाने लगीं। ओंकारनाथ जी की बेबस आँखें शारदा जी के चेहरे पर टिक गईं। उन नज़रों में एक गहरा अपराध-बोध तैर रहा था—एक ऐसी खामोश माफी, जो वे पिछले बारह सालों से हर रोज़ मांगते थे।
जिंदगी कभी-कभी इतनी बेरहमी से मोड़ लेती है कि इंसान संभलने तक का अवसर नहीं पाता। एक समय था जब ओंकारनाथ जी अपने छोटे से शहर के सबसे जीवंत इंसान थे। डाक विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपनी साइकिल पर सवार होकर पूरे कस्बे का चक्कर लगाते थे। किसी के ब्याह-शादी का काम हो या किसी के इलाज की भागदौड़, ओंकारनाथ जी हमेशा आगे रहते। उनका छोटा सा मकान, जिसमें एक बड़ा सा अमरूद का पेड़ था, हमेशा रिश्तेदारों और मोहल्ले वालों के हंसी-ठहाकों से गूंजता रहता था।
फिर एक दिन बेटे अनिकेत और बहू स्वाति का फोन आया। वे दोनों इस महानगर की बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों में काम करते थे। उन्होंने बेहद लाड़ और जिद से कहा, “बाबूजी, आप लोग जीवन भर वहीं खपते रहे। अब कुछ दिन यहाँ आकर रहिए। पोती रिया भी दादा-दादी के साथ रहना चाहती है। कुछ महीने महानगर की चकाचौंध देखिए, घूमिए-फिरिए।”
ओंकारनाथ जी और शारदा जी पहले तो हिचकिचाए, फिर नाती-पोती के मोह में टिकट कटा ली। जब वे पहली बार इस गगनचुंबी इमारत में दाखिल हुए थे, तो बच्चों जैसे कौतूहल से भर उठे थे। इतनी तेज़ लिफ्ट कि पेट में तितलियाँ उड़ने लगें, इतना ऊंचा घर कि बादल खिड़कियों से छूते हुए निकलें। शाम को जब छोटी रिया स्कूल से आती, तो ओंकारनाथ जी उसे अपनी पीठ पर बिठाकर घोड़ा-घोड़ा खेलते। शारदा जी रसोई में अपनी पुरानी यादों के स्वाद घोलतीं। सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा चल रहा था। पंद्रह दिन बीत चुके थे और वे अगले हफ्ते की वापसी का आरक्षण कराने की सोच ही रहे थे कि नियति ने अपना क्रूर खेल खेल दिया।
उस रात ओंकारनाथ जी को अचानक सीने में भारीपन और सिर में तेज चक्कर महसूस हुआ। जब तक अनिकेत गाड़ी निकालकर अस्पताल ले जाता, तब तक उनके मस्तिष्क की एक नस फट चुकी थी। डॉक्टरों की टीम ने जान तो बचा ली, लेकिन दायां हिस्सा पूरी तरह संज्ञाशून्य हो गया। वे अर्धांगघात यानी पैरालिसिस का शिकार हो गए थे। आवाज़ गले में ही घुटकर रह गई थी, सिर्फ टूटे-फूटे शब्दों की अस्पष्ट ध्वनियां ही बाहर आ पाती थीं।
उस एक रात ने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया। जो इंसान कभी किसी का सहारा हुआ करता था, वह खुद पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गया। अनिकेत और स्वाति ने कोई कसर नहीं छोड़ी। शहर के सबसे महंगे न्यूरोलॉजिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट, आयुर्वेदिक मालिश—हर संभव उपाय किया गया। पर विज्ञान की भी अपनी सीमाएं होती हैं। समय बीतने के साथ डॉक्टरों ने कह दिया कि अब यह स्थिति स्थायी है, केवल सेवा और देखभाल ही सहारा है।
इसके बाद लौटने का सारा रास्ता ही बंद हो गया। कस्बे के उस बड़े घर में, जहाँ पानी भी कुएं या हैंडपंप से खींचना पड़ता था, एक बिस्तर पर पड़े लाचार पति के साथ शारदा जी अकेले कैसे रहतीं? वहाँ कोई आपातकालीन अस्पताल भी पास नहीं था। मजबूरी ने उन्हें इसी चौबीसवीं मंजिल के फ्लैट में बांध दिया।
शारदा जी ने हालात को स्वीकार तो कर लिया, पर उनका मन कभी इस कंक्रीट के ढांचे को अपना घर नहीं मान पाया। उन्हें अपनी वह खुली धूप वाली छत याद आती जहाँ वे सर्दियों में बड़ियां और पापड़ सुखाया करती थीं। उन्हें पड़ोस की शांति भाभी और कौशल्या चाची याद आतीं, जिनके साथ बैठकर दोपहर कट जाती थी। यहाँ फ्लैट में बेटा-बहू सुबह आठ बजे लैपटॉप का बैग टांगकर निकल जाते और देर रात थके-हारे लौटते। पोती रिया स्कूल, ट्यूशन और ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया में खोई रहती। दिन भर के सन्नाटे में सिर्फ दीवार घड़ी की सुइयां चलतीं या फिर बिस्तर से ओंकारनाथ जी की कराहने की आवाज़ आती।
ओंकारनाथ जी अपनी इस लाचारी पर घुटते रहते थे। जब भी शारदा जी उनका गीला बिस्तर बदलतीं या उन्हें नहलातीं, तो उनकी आँखों से आंसू लुढ़क कर तकिये में समा जाते। वे अपने कांपते बाएं हाथ से शारदा जी का हाथ थामते और कुछ ऐसा इशारा करते मानो कह रहे हों, “मुझे माफ कर दो, मैंने तुम्हें इस उम्र में बंधुआ मजदूर बना दिया।” शारदा जी अपने पल्लू से उनके आंसू पोंछकर मुस्कुराने का अभिनय करतीं, “कैसी बातें करते हैं आप? जब तक सांस है, आपका साथ है।” पर रात को, जब पूरा फ्लैट सो जाता, तो वे बालकनी के अंधेरे कोने में खड़ी होकर अपनी छाती पर हाथ रखकर सिसकती थीं। उन्हें लगता था कि वे दोनों उखड़े हुए ऐसे पौधे हैं जिन्हें किसी गमले में ठूंस तो दिया गया है, पर जिनकी जड़ों को खाद-पानी नहीं मिल रहा।
दिन महीनों में और महीने सालों में ढलते रहे। जीवन एक ढर्रे पर चल रहा था, जिसमें कोई रंग नहीं था।
फिर एक दिन, मौसम कुछ अलग था। आसमान में घने काले बादल घिरे थे और ठंडी पुरवाई चल रही थी। अनिकेत उस दिन दफ्तर के किसी काम से शहर से बाहर था और स्वाति किसी आपातकालीन बैठक में फंसी थी। रिया अपने स्कूल के टूर पर गई हुई थी। घर में सिर्फ वे दोनों थे। दोपहर के समय अचानक जोरों की बारिश शुरू हो गई। बूंदें खिड़की के शीशों से टकराकर अजीब सा संगीत पैदा कर रही थीं।
शारदा जी ने देखा कि ओंकारनाथ जी की नज़रें लगातार खिड़की से बाहर बरसते पानी पर टिकी हैं। उनकी आँखों में एक अजीब सी प्यास थी—वही प्यास जो बंद कमरों में बरसों कैद रहने वाले पंछी की आँखों में नीले गगन को देखकर होती है।
शारदा जी के भीतर न जाने कहाँ से एक अजीब सा साहस जागा। उन्होंने व्हीलचेयर को बिस्तर के पास लगाया। अपने पूरे शरीर का बल लगाकर, हांफते हुए उन्होंने ओंकारनाथ जी को सहारा दिया और खींचकर व्हीलचेयर पर बिठाया। ओंकारनाथ जी डर गए कि कहीं वे गिर न जाएं, पर शारदा जी के चेहरे पर उस दिन एक अनोखा दृढ़ संकल्प था। उन्होंने उनके पैरों पर एक गर्म शॉल डाली और व्हीलचेयर को धकेलते हुए फ्लैट के मुख्य लिविंग रूम से होती हुई बड़ी बालकनी के स्लाइडिंग दरवाजे तक ले आईं।
उन्होंने कांच का दरवाजा पूरा खोल दिया। बारिश की हल्की, ठंडी फुहारें उड़कर अंदर आईं और सीधे ओंकारनाथ जी के झुर्रियों भरे चेहरे को भिगोने लगीं।
ओंकारनाथ जी ने चौंककर अपनी आँखें मूंद लीं, फिर धीरे से खोलीं। बारह सालों में यह पहला मौका था जब किसी बंद कमरे की कृत्रिम ठंडक (एसी) के बजाय प्रकृति की सीधी बयार और बारिश की बूंदों ने उनके चेहरे को छुआ था। मिट्टी की सोंधी खुशबू, जो नीचे किसी पार्क से उड़कर ऊपर आ रही थी, उनकी सांसों में भर गई। ओंकारनाथ जी के होंठ कांपे। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खिली, और बरसों बाद उनकी आँखों में बेबसी के नहीं, बल्कि एक असीम आनंद के आंसू थे।
शारदा जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। उस एक पल ने शारदा जी के भीतर के सारे अवसाद को धो दिया। उन्हें एक गहरा आत्मज्ञान हुआ: “हम हालात को नहीं बदल सकते, पर हालात को जीने का नज़रिया तो हमारे हाथ में है। हम बारह साल से केवल अपनी बीमारी, अपनी लाचारी और अपने छूटे हुए अतीत का रोना रो रहे थे। हमने वर्तमान को जीना ही छोड़ दिया था।”
उस शाम जब स्वाति और अनिकेत लौटे, तो उन्होंने एक अभूतपूर्व दृश्य देखा। घर में हमेशा छाया रहने वाला उदास सन्नाटा गायब था। बालकनी में हल्के स्वर में पुराना शास्त्रीय संगीत बज रहा था। ओंकारनाथ जी व्हीलचेयर पर बैठे ताज़ी हवा ले रहे थे और शारदा जी पास बैठी चाय की चुस्कियां ले रही थीं।
शारदा जी ने उस दिन के बाद से हार मानना बंद कर दिया। उन्होंने अपनी दिनचर्या में क्रांतिकारी बदलाव किए। सबसे पहले उन्होंने सोसायटी की महिलाओं से मिलना-जुलना शुरू किया। हर शाम वे ओंकारनाथ जी को लिफ्ट से नीचे सोसायटी के हरे-भरे पार्क में ले जाने लगीं। शुरुआत में ओंकारनाथ जी झिझकते थे कि लोग उनकी लाचारी देखकर दया करेंगे, लेकिन शारदा जी अडिग रहीं।
पार्क में जाकर जैसे एक नई दुनिया खुल गई। वहाँ कई ऐसे बुजुर्ग थे जो अपनों से दूर या अकेलेपन से जूझ रहे थे। ओंकारनाथ जी बोल नहीं सकते थे, पर उनके चेहरे के भाव, उनकी मुस्कान और उनकी आँखें बहुत कुछ कह जाती थीं। धीरे-धीरे पार्क के बुजुर्ग उनके इर्द-गिर्द बैठने लगे। शारदा जी ने सोसायटी के क्लब हाउस में महिलाओं के साथ मिलकर भजन मंडली और हस्तकला का एक छोटा समूह बना लिया। वे अपने कस्बे की पुरानी कहानियाँ, लोकगीत और अचार-मुरब्बे बनाने के नुस्खे युवा बहुओं को सिखाने लगीं।
जिस फ्लैट को शारदा जी एक जेल समझती थीं, अब वह खुशियों का केंद्र बनने लगा। शाम को रिया अपने दोस्तों के साथ दादाजी के कमरे में आती। दादाजी इशारों में और कैरम के बोर्ड पर अपनी उंगलियों की हल्की हरकतों से बच्चों के साथ खेलते। अनिकेत और स्वाति अपनी माँ के इस नए रूप को देखकर दंग थे। जिस माँ का चेहरा हमेशा बुझा रहता था, अब उसमें एक अनोखा तेज था।
ओंकारनाथ जी के स्वास्थ्य में भी आश्चर्यजनक सुधार होने लगा। जब इंसान का मन प्रसन्न होता है, तो दवाइयां भी दुगुनी गति से काम करती हैं। उनके बाएं हाथ की पकड़ और मजबूत हो गई, और वे एक छड़ी के सहारे कुछ कदम घसीटकर चलने का प्रयास करने लगे। चेहरे पर अब अपराध-बोध नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के प्रति गहरा आदर और जीवन के प्रति कृतज्ञता थी।
शारदा जी को समझ आ गया था कि ‘जड़ें’ किसी जमीन या मकान की दीवारों में नहीं होतीं, जड़ें तो हमारे मन के भीतर होती हैं। जहाँ हम प्रेम, स्वीकार्यता और सकारात्मकता का जल डालते हैं, वहीं जीवन की हरी पत्तियां फूट पड़ती हैं। उखड़े हुए लोग भी अगर हौसले की ज़मीन तलाश लें, तो वे किसी भी बंजर कंक्रीट में अपनी दुनिया नए सिरे से बसा सकते हैं।
ज़िंदगी कभी भी वैसी नहीं होती जैसी हम योजना बनाते हैं, लेकिन वह वैसी ज़रूर बन सकती है जैसी हम उसे जीने की हिम्मत जुटाते हैं। क्या आप भी कभी जीवन के किसी ऐसे मोड़ पर आकर ठहरे हैं जहाँ सब कुछ पराया और रुका हुआ लगा हो? आपने उस ठहराव को कैसे तोड़ा? अपने विचार और जीवन के अनुभव हमें नीचे कमेंट में साझा करके ज़रूर बताएं।
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