“अनन्या, मुझे माफ़ कर दो,” राघव की आवाज़ थोड़ी भारी थी। “उस दिन जब मैंने कहा था कि तुम गृहस्थी संभालो और मुझे पढ़ने-लिखने दो, तब मैं एक बहुत बड़े मुगालते में जी रहा था। मुझे लगता था कि पैसा कमाकर और सुख-साधन जुटाकर मैंने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मैंने समझा कि गृहस्थी किसी एक का बोझ नहीं, दोनों की साझी ज़िम्मेदारी है। तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा रिसर्च और तुम्हारे सपने भी उतने ही कीमती हैं जितने मेरे।”
सोसाइटी की बारहवीं मंज़िल पर बने उस नए फ्लैट की बालकनी से पूरा शहर एक खूबसूरत कैनवास जैसा नज़र आ रहा था। शाम की हल्की सुनहरी धूप लिविंग रूम की दीवारों पर तैर रही थी। राघव ने हाथ में पकड़ी नेमप्लेट को मुख्य दरवाज़े के पास टिकाया, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—’राघव और अनन्या’।
राघव एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर डेटा साइंटिस्ट था। पिछले छह महीनों की अथक मेहनत, लोन के कागज़ातों की दौड़-धूप और अपनी जमा-पूंजी के सहारे उसने आखिरकार इस शहर में अपना एक आशियाना बना ही लिया था। शादी को अभी मुश्किल से दो महीने हुए थे। अनन्या, जो पास के ही एक सरकारी कॉलेज में अर्थशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर थी, हाथ में पूजा की थाली लिए गृहप्रवेश के बाद बची रोली और अक्षत को समेट रही थी। लाल बनारसी साड़ी में लिपटी अनन्या के चेहरे पर एक सौम्य और शांत चमक थी।
राघव बालकनी से लौटकर सोफे पर बैठ गया। उसने अपने चारों ओर फैले आलीशान इंटीरियर, मॉडर्न किचन, महंगे सोफे और दूर दीवार पर टंगे बड़े टीवी स्क्रीन को बड़े गर्व से देखा। फिर उसने अनन्या की ओर देखा, जो डाइनिंग टेबल को व्यवस्थित कर रही थी। राघव के मन में एक आत्मसंतुष्टि का भाव था, जिसे वह अपने शब्दों में ढालने से रोक नहीं पाया।
“अनन्या, ज़रा यहाँ बैठो तो,” राघव ने सोफे की खाली जगह की ओर इशारा करते हुए बड़े अपनत्व से कहा।
अनन्या अपने पल्लू को संभालते हुए आई और उसके पास बैठ गई। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए उसने पूछा, “हाँ राघव, कहिए? थक गए न आज?”
राघव ने अनन्या के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आवाज़ में एक अधिकारपूर्ण स्नेह था, “अनन्या, देखो इस घर को। मैंने अपनी ज़िंदगी की सारी कमाई, अपना दिन-रात एक करके यह फ्लैट तुम्हारे लिए तैयार किया है। तुम्हारी अलमारी नए कपड़ों और गहनों से भरी है। गैरेज में गाड़ी खड़ी है, किचन पूरी तरह मॉड्यूलर है। तुम्हें दुनिया के किसी सुख-साधन की कमी नहीं होने दी मैंने। अब बस मेरी एक ही ख़्वाहिश है।”
अनन्या ने सवालिया नज़रों से उसकी ओर देखा, “कैसी ख़्वाहिश?”
राघव मुस्कुराया और बड़े सहज भाव से बोला, “अब तुम इस गृहस्थी को अपनी पूरी शिद्दत से संभालो। घर, रसोई, परिवार का ध्यान रखना तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। मुझे… मुझे अब सिर्फ अपने काम और रिसर्च पर ध्यान देना है। कंपनी में मेरा नया प्रोजेक्ट शुरू हो रहा है, जिसका प्रमोशन सीधे मुझे वाइस प्रेसिडेंट की कुर्सी तक ले जा सकता है। मुझे रात-दिन कोडिंग और एनालिसिस करनी होगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि घर के किसी भी झंझट का असर मुझ पर न पड़े।”
राघव को लगा था कि अनन्या उसकी इस व्यवस्था से गद्गद हो जाएगी, शायद उसकी मेहनत की तारीफ़ करेगी या कहेगी कि वह भाग्यशाली है।
लेकिन अनन्या ने पल भर के लिए राघव की आँखों में देखा। न तो उसके चेहरे पर कोई गुस्सा उभरा, न ही कोई झिझक। उसने अपने हाथ राघव के हाथों से धीरे से छुड़ाए, चेहरे पर एक बेहद मीठी और साफ़ मुस्कान बिखेरी और बोली, “राघव, यह तो बहुत ही अद्भुत विचार है! सच कहूँ तो मैं भी ठीक यही चाहती थी। पीएचडी पूरी होने के बाद मेरी रिसर्च ‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था’ पर अधूरी पड़ी है और मुझे अपने पेपर्स इंटरनेशनल जर्नल में भेजने हैं। मैं भी यही चाहती हूँ कि आपकी तरह मैं भी सिर्फ अपने अध्ययन, पढ़ाने और रिसर्च पर ध्यान दूँ। बाकी घर, चूल्हा-चौका और गृहस्थी तो अपने आप चलते ही रहेंगे, है ना?”
अनन्या की यह बात सुनकर राघव सन्न रह गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिमाग जैसे कुछ पलों के लिए सुन्न हो गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक पढ़ी-लिखी, सुलझी हुई महिला के सामने जब वह ‘पारंपरिक गृहस्थी’ का प्रस्ताव रखेगा, तो उत्तर इतने सटीक और तार्किक आईने के रूप में सामने आएगा।
“अनन्या! तुम… तुम मज़ाक कर रही हो?” राघव की आवाज़ लड़खड़ाई।
“बिल्कुल नहीं राघव,” अनन्या ने उतने ही शांत स्वर में कहा, “जितनी मेहनत आपने अपनी कॉर्पोरेट डिग्री और इस नौकरी के लिए की है, उतनी ही रातें मैंने भी लाइब्रेरी में किताबें पढ़कर और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करके बिताई हैं। अगर आपकी तरक्की का सपना बड़ा है, तो मेरी बौद्धिक यात्रा भी मेरे आत्मसम्मान का हिस्सा है। अगर भौतिक सुख देना ही आपकी तरफ से सब कुछ है, तो उन सुखों को अकेले भोगने के बदले अपनी पहचान को चूल्हे के धुएं में खो देना मेरे लिए संभव नहीं होगा।”
उस रात घर में एक अजीब सी खामोशी छा गई। दोनों ने खाना चुपचाप खाया, पर बात आगे नहीं बढ़ी। राघव के भीतर का पुरुषवादी अहंकार बुरी तरह आहत हुआ था। वह अपने कमरे में लैपटॉप खोलकर बैठा तो था, लेकिन कोड की लाइनों की जगह उसे अनन्या के शब्द बार-बार कचोट रहे थे। उसे लगा कि अनन्या ने उसके एहसानों की कद्र नहीं की।
अगले कुछ दिन दोनों के बीच केवल औपचारिकता की दीवार खड़ी रही। सुबह दोनों तैयार होते, अनन्या अपने कॉलेज चली जाती और राघव अपने दफ्तर। लेकिन घर की व्यवस्था चरमराने लगी थी। राघव को आदत थी कि घर में सब कुछ व्यवस्थित मिले। माँ के घर में उसने कभी पानी का गिलास तक खुद नहीं उठाया था। जब उसने देखा कि अनन्या कॉलेज से लौटकर पहले अपने रिसर्च पेपर्स पर काम करती है, फिर सादा सा भोजन बनाती है, तो उसे खीझ होने लगी।
एक इतवार की सुबह, राघव ने चाय की टेबल पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर ही दी।
“अनन्या, मुझे लगता है तुम शादी का मतलब नहीं समझतीं। सदियों से औरतें घर संभालती आई हैं। इसका मतलब यह नहीं कि वे कमतर हैं। लेकिन कोई तो एक होगा जो घर की रीढ़ बनेगा!” राघव ने तल्ख लहजे में कहा।
अनन्या ने अपनी चाय का कप नीचे रखा और बेहद संजीदगी से राघव को देखने लगी। उसकी आवाज़ में कटुता नहीं, बल्कि एक गहरी संवेदना थी।
“राघव, सदियों से जो चला आ रहा था, क्या वह हमेशा न्यायसंगत था? घर की रीढ़ सिर्फ औरत क्यों बने? और अगर औरत रीढ़ बनती है, तो क्या पुरुष को केवल बाहरी दीवार बनकर रह जाना चाहिए? शादी दो बराबर के इंसानों का सफ़र है। आपने घर खरीदा, यह आपकी मेहनत है और मैं इसका दिल से सम्मान करती हूँ। लेकिन इस घर को ‘हमारा’ बनाने के लिए मुझे अपनी पहचान को होम करना पड़े, यह सौदा बराबरी का नहीं है।”
राघव चुप रहा, पर उसके मन का द्वंद्व कम नहीं हुआ।
बदलाव तब आया जब करीब दो हफ्ते बाद राघव की कंपनी में एक बड़ा क्राइसिस आ गया। यूरोपियन क्लाइंट का डेटा मॉडल क्रैश हो गया था और राघव पर चौबीस घंटे के भीतर नया सॉल्यूशन देने का भारी दबाव था। राघव पूरी रात जागा। तनाव इतना बढ़ गया कि अगले दिन दोपहर को ऑफिस में ही उसे तेज़ सिरदर्द और बेचैनी के कारण चक्कर आ गया। सहकर्मियों ने उसे घर पहुँचाया।
जब राघव ने घर का दरवाज़ा खोला, तो वह पसीने से तरबतर और थका हुआ था। अनन्या कॉलेज से आ चुकी थी। उसने राघव की हालत देखी, तो बिना कोई सवाल पूछे, उसका हाथ पकड़कर बिस्तर पर ले गई। उसने राघव के जूते उतारे, उसे पानी दिया और माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखी।
अगले तीन दिन राघव बिस्तर पर रहा। वायरल फीवर और काम के तनाव ने उसे तोड़ दिया था। उन तीन दिनों में राघव ने एक अलग ही नज़ारा देखा। अनन्या सुबह पाँच बजे उठती, उसके लिए काढ़ा और दलिया बनाती, समय पर दवाइयाँ देती। फिर वह कॉलेज जाती, दोपहर में जल्दी लौटकर उसके स्वास्थ्य का हाल लेती, और रात को जब राघव सो जाता, तब वह लिविंग रूम के धीमे लैंप की रोशनी में बैठकर अपनी थीसिस पर काम करती।
एक रात, करीब दो बजे राघव की आँख खुली। प्यास लगी थी। वह धीरे-धीरे उठकर लिविंग रूम की तरफ बढ़ा। उसने देखा कि अनन्या सोफे पर सिर टिकाए सो गई थी। टेबल पर उसकी खुली हुई रिसर्च की फाइलें थीं, पास में ठंडी हो चुकी चाय का कप था, और हाथ में एक पेन दबा हुआ था।
राघव वहीं ठिठक कर खड़ा रह गया। उसने अनन्या के थके हुए चेहरे को देखा। उस चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी, बस एक गहरी लगन और असीम थकान थी।
राघव के दिल में जैसे बिजली सी कौंध गई। उसने खुद से पूछा—”मैं क्या कर रहा था? मैं अपने काम को करियर कह रहा था और इसके काम को महज़ एक शौक? मैं चाहता था कि यह दिन भर घर की चाकरियों में उलझी रहे ताकि मेरी तरक्की की राह आसान हो सके? क्या प्यार का मतलब किसी के पंख काटकर उसे सोने के पिंजरे में बिठाना है?”
राघव की आँखें भर आईं। उसने चुपचाप एक शॉल उठाई और धीरे से अनन्या के कंधों पर डाल दी। फिर उसने टेबल पर बिखरे कागज़ातों को करीने से समेटा और अनन्या को बिना जगाए धीरे से उसके कमरे में सुला दिया।
अगली सुबह जब अनन्या की आँख खुली, तो घड़ी में सात बज चुके थे। वह घबराकर उठी कि राघव की दवाई और नाश्ते का समय हो गया था। जैसे ही वह हड़बड़ाते हुए किचन की तरफ भागी, वह चौंक कर दरवाज़े पर ही रुक गई।
किचन में राघव खड़ा था। उसने एप्रन पहन रखा था। गैस पर अदरक वाली चाय खौल रही थी और तवे पर टोस्ट सिक रहे थे।
अनन्या को देखकर राघव पलटा। उसके चेहरे पर वह पुराना दंभ नहीं था, बल्कि एक नई, परिपक्व और सच्ची मुस्कान थी।
“उठ गईं प्रोफेसर साहिबा?” राघव ने बहुत कोमलता से कहा।
“राघव! आपकी तबीयत ठीक नहीं है, आप किचन में क्या कर रहे हैं?” अनन्या ने आगे बढ़ते हुए कहा।
राघव ने उसे कंधे से पकड़कर डाइनिंग चेयर पर बैठा दिया और उसके सामने चाय का कप रखते हुए बोला, “बैठो अनन्या। आज चाय मेरी तरफ से।”
राघव उसके सामने बैठा और उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। इस बार उसकी पकड़ में अधिकार नहीं, साझेदारी का भाव था।
“अनन्या, मुझे माफ़ कर दो,” राघव की आवाज़ थोड़ी भारी थी। “उस दिन जब मैंने कहा था कि तुम गृहस्थी संभालो और मुझे पढ़ने-लिखने दो, तब मैं एक बहुत बड़े मुगालते में जी रहा था। मुझे लगता था कि पैसा कमाकर और सुख-साधन जुटाकर मैंने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मैंने समझा कि गृहस्थी किसी एक का बोझ नहीं, दोनों की साझी ज़िम्मेदारी है। तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा रिसर्च और तुम्हारे सपने भी उतने ही कीमती हैं जितने मेरे।”
अनन्या की आँखों में नमी तैर गई, पर वह मुस्कुरा दी।
राघव ने आगे कहा, “अब इस घर का नियम बदलेगा। सुबह का नाश्ता और किचन का आधा काम मेरा, आधा तुम्हारा। घर की सफाई और बाकी ज़िम्मेदारियों में हम दोनों बराबर के हिस्सेदार होंगे। तुम भी अपनी रिसर्च पूरी करोगी और मैं भी अपनी कोडिंग करूंगा। हम दोनों पढ़ेंगे, दोनों बढ़ेंगे। यह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों और ऐशो-आराम का शो-पीस नहीं बनेगा, यह हम दोनों की आज़ाद उड़ानों का सुरक्षित घोंसला बनेगा।”
अनन्या ने राघव के हाथों को कसकर थाम लिया। उसके होठों से सिर्फ इतना निकला, “अब यह सच में ‘हमारा’ घर बन गया है, राघव।”
उस दिन के बाद से फ्लैट नंबर 1204 की सुबहें बदल गईं। अब वहाँ कोई एक व्यक्ति हुक्म नहीं चलाता था, बल्कि चाय की चुस्कियों के साथ रिसर्च पेपर्स और डेटा एल्गोरिदम पर एक साथ चर्चा होती थी। दोनों ने मिलकर यह साबित कर दिया था कि गृहस्थी पहियों पर दौड़ती उस गाड़ी की तरह है, जहाँ दोनों पहियों का एक बराबर और एक दिशा में घूमना ही रिश्ते को मंज़िल तक ले जाता है।
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आज के आधुनिक दौर में भी क्या गृहस्थी संभालने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी केवल पत्नी की ही होनी चाहिए? या राघव की तरह हर पति को घर के कामों में बराबर का साझीदार बनना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।
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