राख में दबी चिंगारी

“नहीं नितेश,” मैंने गर्व से भीगे स्वर में कहा। “भाभी हारी हुई नहीं थीं। अवधेश भैया ने जिस औरत को अनपढ़ और बेमेल समझकर फेंक दिया था, उसी औरत ने गाँव की सौ लड़कियों का भविष्य संवारा। आज जब उनका अंतिम संस्कार हो, तो उनके पार्थिव शरीर को किसी असहाय परित्यक्ता की तरह विदा मत करना। उनके बनाए उस सिलाई केंद्र की सारी बेटियों को बुलाना। वे उस औरत की अर्थी को कंधा देंगी जिसने उन्हें सिर उठाकर जीना सिखाया। शारदा भाभी केवल सांसें नहीं ले रही थीं, वे अपने वजूद की आग से कई बुझे हुए दीयों को रौशन कर के गई हैं।”

रसोई में चाय की केतली धीमी आँच पर सुलग रही थी। सुबह की पहली किरण अभी खिड़की के काँच से छनकर अंदर आ ही रही थी कि डाइनिंग टेबल पर रखे मोबाइल की घंटी अचानक बज उठी। स्क्रीन पर मेरे चचेरे भाई नितेश का नाम चमक रहा था। हाथ का काम बीच में ही छोड़कर मैंने फोन उठाया और कान से लगाया। दूसरी तरफ से नितेश की भारी और थकी हुई आवाज़ सुनाई दी—”अनुराधा, रात को बड़ी भाभी चल बसीं।”

एक पल के लिए मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। मेरे मुँह से बस इतना ही निकला, “क्या? अचानक कैसे? अभी पिछले महीने ही तो ठीक थीं!”

नितेश ने एक ठंडी सांस खींची और बोला, “वही पुराना फेफड़ों का इन्फेक्शन था। पिछले एक हफ्ते से अस्पताल में थीं। सच कहूँ तो, उनके लिए यह मुक्ति ही है। जी गईं वो इस तिल-तिल कर मरने वाली ज़िंदगी से।”

कॉल कट गई। मैं वहीं पास रखी कुर्सी पर ढह सी गई। बाहर का सन्नाटा अचानक मेरे भीतर गूँजने लगा। पास के कमरे में मेरे दोनों बच्चे अभी गहरी नींद में सो रहे थे, और यह अच्छा ही था। मुझे उस वक़्त अपने भीतर उठ रहे तूफ़ान से अकेले रूबरू होने के लिए इसी तन्हाई की ज़रूरत थी। मेरे दिमाग में नितेश का वह एक वाक्य गूंज रहा था—”जी गईं वो।”

क्या सचमुच? क्या चलती-फिरती सांसें, चूल्हे की तपिश में जलती काया और दूसरों की आज्ञाओं को सिर झुकाकर ढोने वाली उस औरत को हम इतने बरसों तक ‘जीवित’ मान रहे थे? जिसे कभी अपने अस्तित्व का मान नहीं मिला, जिसकी हँसी घर की दीवारों में घुटकर दम तोड़ चुकी थी, क्या वह सचमुच जी रही थी? या फिर वह केवल एक मूक परछाईं थी जो परिवार की व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए साँसें ले रही थी? सोचते-सोचते मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े और मैं अपने अतीत की उन गलियों में लौट गई जहाँ मेरा बचपन बीता था।

उस हवेलीनुमा पुराने पुश्तैनी मकान में शारदा भाभी हम सबके लिए केवल ‘बड़ी बहू’ नहीं थीं, बल्कि घर की वह धुरी थीं जिसके बिना किसी का काम नहीं चलता था। जब मैंने होश संभाला, तो शारदा भाभी को हमेशा काम में डूबा हुआ ही पाया। उनके हाथों में गजब का हुनर था। शादी-ब्याह के पकवान हों, साल भर के लिए डाले जाने वाले खट्टे-मीठे अचार हों, या कसीदाकारी से सजे सुंदर तकिए के गिलाफ़—शारदा भाभी का कोई सानी नहीं था। पूरा मोहल्ला किसी भी तीज-त्योहार या मांगलिक कार्य में सलाह लेने या मदद मांगने सीधे उन्हीं के पास आता था। कोई बीमार पड़ता तो काढ़े से लेकर मालिश तक का जिम्मा उनका होता।

लेकिन कुदरत ने उन्हें हुनर तो बेहिसाब दिया था, बस चेहरे-मोहरे की तराश में शायद वह कशिश नहीं भर पाया जिसे दुनिया ‘रूप’ कहती है। सांवला रंग, भारी और थुलथुल बदन, और चेहरे पर फैली एक उदास सादगी। बहुत कम उम्र में, जब वे शायद ज़िंदगी का फलसफ़ा भी नहीं जानती थीं, उनका ब्याह मेरे बड़े ताऊजी के बेटे यानी अवधेश भैया से कर दिया गया था। अवधेश भैया तब शहर के एक बड़े कॉलेज में पढ़ रहे थे। महत्वाकांक्षी, गोरे-चिट्टे और आधुनिक विचारों की नुमाइश करने वाले।

शादी के कुछ साल बाद भैया ने मुंबई में एक विदेशी बैंक में नौकरी पा ली। वे शहर के रंग-ढंग में पूरी तरह रंग गए, लेकिन शारदा भाभी कभी उस शहर की चौखट तक नहीं पहुँच पाईं। संयुक्त परिवार की देखरेख, सास-ससुर की सेवा और खेती-बाड़ी के हिसाब-किताब के नाम पर उन्हें हमेशा गाँव वाले घर में ही बांधकर रखा गया। सच तो यह था कि अवधेश भैया को उनके अनगढ़ रूप और ठेठ देहाती लहजे से शर्म आती थी। वे उन्हें अपने दोस्तों या पार्टी-समारोहों में ले जाने लायक नहीं समझते थे। भाभी के हिस्से में पत्नी का कोई अधिकार नहीं आया, न प्रेम, न मान, न सहचर्य। उनके हिस्से आई तो बस एक अंतहीन प्रतीक्षा और चूल्हे-चौके की ज़िम्मेदारी।

दिन के उजाले में तो वे खुद को काम के अंबार तले दबाए रखती थीं, ताकि सोचने का वक़्त न मिले। पर दोपहर के सन्नाटे में, जब घर के बड़े-बूढ़े सो रहे होते, वे आँगन के नीम के पेड़ तले बैठकर पुरानी कसीदाकारी करतीं और बेहद धीमे स्वर में लोकगीत गुनगुनातीं। उनका कंठ इतना सुरीला और गहरा था कि सुनने वाले का कलेजा मुँह को आ जाए। उन गीतों में विरह और उपेक्षा की ऐसी टीस होती थी कि गाते-गाते उनकी आँखों से मूक अश्रुधारा बहने लगती थी।

बचपन में मुझे यह सब समझ नहीं आता था। एक बार जब मैंने उन्हें दुपट्टे के छोर से आँसू पोंछते देखा, तो मैं अपनी माँ के पास दौड़कर गई, “माँ, बड़ी भाभी गाते-गाते रोती क्यों हैं? क्या उनके पेट में दर्द है या उन्हें किसी ने डांटा है?”

माँ ने मुझे तुरंत झिड़क दिया, “जा, बाहर जाकर खेल। बड़ों के मामले में टांग अड़ाना अच्छी बात नहीं है।”

लेकिन बच्चों का मन तो उसी ओर भागता है जहाँ रहस्य का पर्दा गिरा हो। एक दिन जब भाभी अकेली पापड़ सुखा रही थीं, मैं उनके पास जाकर बैठ गई और भोली सी ज़िद करने लगी, “भाभी, आप रोया मत करो न। अवधेश भैया जब आते हैं तो आप खुश क्यों नहीं होतीं?”

शारदा भाभी ने अपनी नम आँखें ऊपर उठाईं, मेरे सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और एक लंबी साँस भरकर बोलीं, “बिटिया, नसीब की लकीरें जब टेढ़ी खिंच जाती हैं, तो कोई लाख जतन करे, सीधी नहीं होतीं। हमारी तो तकदीर ही फूटी थी।” फिर तुरंत मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बात पलट दी, “छोड़ो ये सब। तुम जब बड़ी होकर अपनी ससुराल जाओगी, तो हमें भी अपने साथ ले चलोगी न? इस घर में अब दम घुटता है।”

उस समय मैं उनकी बात की गहराई नहीं समझ पाई थी, लेकिन उनके चेहरे का वह खालीपन मेरे बालमन पर छप गया था।

एक बार जब मैं आठवीं कक्षा में थी, अवधेश भैया साल भर बाद शहर से गाँव लौटे थे। उनके आने की कोई खुशी भाभी के चेहरे पर नहीं थी, बल्कि एक खौफ़ था। दोपहर में जब सब आराम कर रहे थे, मुझे लगा कि भैया-भाभी के कमरे से कुछ फुसफुसाहट और बहस की आवाज़ें आ रही हैं। बाल सुलभ उत्सुकतावश मैं पानी का जग देने के बहाने उनके कमरे की ओर बढ़ी। दरवाज़ा आधा भिड़ा हुआ था।

अंदर का दृश्य देखकर मेरे कदम वहीं जम गए। अवधेश भैया के हाथ में कुछ कानूनी दस्तावेज़ थे और उनके चेहरे पर खीझ और गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था। वे फुसफुसाते हुए लेकिन बेहद सख्त आवाज़ में कह रहे थे, “शारदा, तमाशा मत बनाओ। सीधे-सीधे इन कागज़ों पर अपने अंगूठे का निशान या दस्तखत करो। मैं इस बेमेल रिश्ते को ढोते-ढोते थक चुका हूँ। शहर में मुझे अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करनी है। मैंने तुम्हारे नाम पर गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा कर दिया है, ताकि तुम्हारा गुज़ारा होता रहे। बस मुझे आज़ाद कर दो।”

भाभी ज़मीन पर बैठी अपने आँचल में मुँह छिपाकर सुबक रही थीं। वे हाथ जोड़कर मना कर रही थीं, “भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। इस दहलीज से मेरा जनाज़ा ही उठेगा। दुनिया क्या कहेगी? मैंने आपकी कौन सी सेवा में कमी रखी?”

“सेवा? मुझे कोई नौकरानी नहीं चाहिए थी, एक पत्नी चाहिए थी जो मेरी बराबरी कर सके!” भैया ने कागज़ उनकी गोद में फेंकते हुए गुर्रा कर कहा।

मैं उस दिन डरकर वहाँ से भाग आई थी। तब मुझे ‘तलाक’ शब्द का अर्थ भी ठीक से नहीं पता था। बस इतना जानती थी कि भैया कुछ ऐसा छीन रहे थे जो भाभी का आखिरी सहारा था।

उस घटना के कुछ महीनों बाद घर में भारी बवंडर उठा। समाज के डर से परिवार ने तलाक तो नहीं होने दिया, पर अवधेश भैया ने गाँव से अपना नाता हमेशा के लिए तोड़ लिया। उन्होंने शहर में किसी अन्य सहकर्मी के साथ लिव-इन में रहना शुरू कर दिया और भाभी को उस बड़े से मकान में एक ज़िंदा लाश की तरह छोड़ दिया गया। परिवार वालों ने भी कुछ दिन सहानुभूति दिखाई, फिर धीरे-धीरे सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए। भाभी उस घर के कोने में सिमट कर रह गईं—एक ऐसी छाया जिसका कोई नाम नहीं था।

वर्ष बीतते गए। मैं पढ़-लिखकर शहर आ गई, मेरी शादी हो गई। गाँव का आना-जाना बहुत कम हो गया। जब भी कभी गाँव जाती, भाभी के सिर पर पके सफेद बाल और उनकी झुकी कमर देखकर मेरा मन भर आता। वे खाती थीं, चलती थीं, घर का काम करती थीं, पर उनकी आँखों की जोत बुझ चुकी थी।

लेकिन आज, जब मुझे उनकी मृत्यु की खबर मिली, तो अचानक मेरे स्मृति पटल पर एक और घटना कौंध गई—वह घटना जो उनकी ज़िंदगी का सबसे सुंदर और प्रेरणादायी मोड़ थी, जिसे शायद परिवार के लोग भूल गए थे, पर मैं कभी नहीं भूली।

यह बात तब की है जब अवधेश भैया के घर छोड़े करीब पाँच साल बीत चुके थे। भाभी की हालत देखकर हमारे कस्बे के एक रिटायर्ड शिक्षक, जो सामाजिक कार्यकर्ता भी थे, गाँव आए थे। उन्होंने महिलाओं के लिए एक ‘स्वयं सहायता समूह’ और कुटीर उद्योग की शुरुआत की थी। उन्होंने किसी तरह भाभी को अपने हुनर—पापड़, अचार और पारंपरिक कढ़ाई—को उस समूह की बाकी गरीब और बेसहारा महिलाओं को सिखाने के लिए मना लिया।

शुरुआत में परिवार और गाँव वालों ने बहुत ताने मारे। “घर की बहू अब बाहर जाकर औरतों को सिखाएगी?”, “घर की इज़्ज़त नीलाम होगी।” लेकिन उस दिन पहली बार शारदा भाभी के भीतर की सोई हुई औरत जागी थी। उन्होंने पहली बार अपनी आवाज़ उठाई थी। उन्होंने ससुर जी से सीधे नज़रे मिलाकर कहा था, “जब आपकी इज़्ज़त ने मुझे जिंदा दफ़न कर दिया था, तब कोई नहीं बोला। अब अगर मैं दो वक्त की रोटी और सम्मान अपने हाथों से कमाना चाहती हूँ, तो मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

उस दिन के बाद से शारदा भाभी बदल गई थीं। उन्होंने गाँव की दर्जनों परित्यक्ता, विधवा और अनपढ़ लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई और खाद्य प्रसंस्करण सिखाया। उनके बनाए आम और आंवले के अचार का स्वाद इतना लाजवाब था कि जिले के बड़े मेलों में उनके स्टॉल सबसे पहले खाली हो जाते थे। जिस औरत को उसके रूप और अनपढ़ होने के नाम पर दुत्कारा गया था, उसी औरत ने अगले पंद्रह वर्षों में सैकड़ों लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा करके दिखाया। उन्होंने अपनी कमाई से गाँव में लड़कियों के लिए एक छोटा सा सिलाई केंद्र और प्राथमिक वाचनालय भी बनवाया था।

हाँ, निजी ज़िंदगी में वे अकेली रहीं। जिस पुरुष को उन्होंने जीवन समर्पित किया, उसने उन्हें कभी नहीं अपनाया। उस घाव का दर्द शायद उनके अंतिम दिनों तक उनकी बीमारी का कारण बना रहा। लेकिन वे केवल आँसू बहाकर नहीं मरीं। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के उस खालीपन को, उस तिरस्कार को दूसरों की ज़िंदगी रोशन करने में झोंक दिया था।

मैंने फोन उठाया और नितेश को दोबारा कॉल मिलाया।

नितेश ने फोन उठाते ही पूछा, “हाँ अनुराधा, कुछ कहना था?”

मैंने अपनी आवाज़ को स्थिर करते हुए कहा, “नितेश, तुमने सुबह कहा था न कि भाभी ‘जी गईं’ क्योंकि उनकी ज़िंदगी निरर्थक थी?”

नितेश झिझका, “हाँ, मतलब… इतनी तकलीफ में थीं वो…”

“नहीं नितेश,” मैंने गर्व से भीगे स्वर में कहा। “भाभी हारी हुई नहीं थीं। अवधेश भैया ने जिस औरत को अनपढ़ और बेमेल समझकर फेंक दिया था, उसी औरत ने गाँव की सौ लड़कियों का भविष्य संवारा। आज जब उनका अंतिम संस्कार हो, तो उनके पार्थिव शरीर को किसी असहाय परित्यक्ता की तरह विदा मत करना। उनके बनाए उस सिलाई केंद्र की सारी बेटियों को बुलाना। वे उस औरत की अर्थी को कंधा देंगी जिसने उन्हें सिर उठाकर जीना सिखाया। शारदा भाभी केवल सांसें नहीं ले रही थीं, वे अपने वजूद की आग से कई बुझे हुए दीयों को रौशन कर के गई हैं।”

फोन के उस पार कुछ पल का सन्नाटा रहा, फिर नितेश की रुआंसी आवाज़ आई, “तुम सच कह रही हो अनुराधा। हमने हमेशा उनके आंसुओं को देखा, उनके संघर्ष की रौशनी को कभी समझा ही नहीं। आज गाँव उन्हें एक मिसाल की तरह विदा करेगा।”

मैंने फोन रखा और खिड़की के बाहर देखा। सुबह का सूरज अब पूरी प्रखरता के साथ चमक रहा था। शारदा भाभी भले ही इस नश्वर संसार से विदा हो चुकी थीं, लेकिन अपने आत्मसम्मान और कर्मठता की जो विरासत वे छोड़ गई थीं, वह उस गाँव की अनगिनत बेटियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगी। राख के नीचे दबी वह चिंगारी बुझी नहीं थी, बल्कि एक मशाल बनकर कई राहों को रोशन कर गई थी।

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लेखिका : यशोदा सिंह

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