रूही ने अपनी माँ के पैर छुए। जानकी ने कांपते हाथों से अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। जब रूही ने अपना लैपटॅाप बैग संभाला और मुस्कुराते हुए एयरपोर्ट के स्वचालित दरवाज़ों की ओर कदम बढ़ाए, तो जानकी की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली।
यह आँसू उन पुराने दुखों, जिल्लतों और गर्दिशों के नहीं थे। ये आँसू उस माँ की तपस्या की पूर्णता के थे। जानकी को लगा मानो वह कोई सपना देख रही हो। उसे याद आया वह दिन जब उसके पास रूही की स्कूल की फीस के लिए पाँच रुपये नहीं थे और उसने अपनी चाँदी की इकलौती लौंग बेच दी थी। आज वही बेटी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी में एक सम्मानित पद पर अपनी ज़िम्मेदारी संभालने जा रही थी।
धूप जब जेठ के महीने में आग बरसाती थी, तो ईंट-भट्ठे की तपिश में सांस लेना भी किसी सज़ा जैसा लगता था। चारों ओर लाल धूल, कोयले का काला धुआँ और पसीने की तीखी गंध। उस भयंकर माहौल में एक महिला अपने सिर पर गीली मिट्टी से भरी तगाड़ी उठाए तेज़ कदमों से साँचे की ओर बढ़ रही थी। उसका नाम था जानकी। जानकी के पैरों में कोई चप्पल नहीं थी, बस बिवाइयों से फटी एड़ियाँ थीं, जिनमें से कई बार खून रिसने लगता था। लेकिन उसके चेहरे पर थकान से ज़्यादा एक बेचैनी थी—उसे आज शाम होने से पहले कम से कम आठ सौ ईंटें पाथनी थीं, ताकि उस दिन की पूरी दिहाड़ी मिल सके।
जानकी के पति माधव की मौत सात साल पहले ही टीबी की बीमारी की वजह से हो गई थी। अपने पीछे वे छोड़ गए थे सिर्फ एक कच्ची झोपड़ी, कुछ कर्ज़ और सात साल की एक नन्ही सी बेटी—रूही। गाँव के लोगों ने तब जानकी को बहुत समझाया था, “जानकी, अकेले औरत जात कैसे पार पाएगी? किसी दूसरे मर्द का हाथ थाम ले या फिर छोकरी को किसी सेठ के घर चौका-बर्तन करने लगा दे। कम से कम दो जून की रोटी तो मिलेगी।”
लेकिन जानकी ने उस दिन अपनी हथेलियों में छाले लिए भगवान के आगे माथा टेका था और संकल्प लिया था, “मेरी बच्ची किसी की दासी नहीं बनेगी। चाहे मेरी हड्डियाँ गल जाएँ, चाहे खून का पानी हो जाए, पर मैं अपनी रूही को पढ़ाऊँगी।”
उस शाम जब जानकी दिन भर के काम के बाद अपनी झोपड़ी में लौटी, तो उसकी देह टूटकर बिखर रही थी। हाथ-पाँव कांप रहे थे और कमर सीधी नहीं हो रही थी। वह झोपड़ी के बाहर रखी टूटी हुई खटिया पर लगभग गिर सी पड़ी।
तभी अंदर से चौदह साल की रूही एक लोटे में ठंडा पानी लेकर दौड़ी आई। रूही की आँखों में गजब की समझदारी और करुणा थी। उसने माँ के पैर धोए, पल्लू से पसीना पोंछा और फिर अपने नन्हे, कोमल हाथों से माँ के तपते हुए माथे को दबाने लगी।
“माई! तू इतना काम काहे करती है? देख तो, तेरे हाथ-पैर में कितने छाले पड़ गए हैं,” रूही का गला भर आया। उसने अपनी हथेलियों से जानकी के खुरदुरे, छालेदार हाथों को छूते हुए कहा, “माई, तू चिंता मत कर। बस कुछ साल की बात है। मैं जब खूब पढ़-लिखकर बड़ी अफ़सर बनूँगी ना, तब तुझे यह मजदूरी कभी नहीं करने दूँगी। तुझे महलों जैसी रानी बनाकर रखूँगी।”
जानकी ने अपनी बेटी को सीने से चिपका लिया। उसकी आँखों से आँसू छलक कर रूही के बालों में समा गए। वह रुंधे गले से बोली, “मेरी गुड़िया, मेरी सारी थकान तो तेरा यह चेहरा देखकर उतर जाती है। बस तू मन लगाकर पढ़ना। यही साल तेरी दसवीं की बोर्ड परीक्षा है। गाँव के मास्टर जी कहते हैं कि तू बहुत होशियार है, अगर अच्छे नंबर ले आई तो आगे का रास्ता खुल जाएगा।”
रूही ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ माई! तू पैसों की फ़िक्र मत कर। स्कूल के हेडमास्टर सर ने बताया है कि जो गरीब लड़कियाँ पढ़ने में अव्वल आती हैं, उनके लिए सरकार वज़ीफ़ा (स्कॉलरशिप) देती है। किताबें, कॉपियाँ और साइकिल भी मुफ़्त मिलती हैं। और अगर मैंने दसवीं में ज़िले में टॉप किया, तो आगे की पढ़ाई के लिए सरकार से बहुत बड़ा पुरस्कार और पूरी फ़ीस मिलेगी। फिर तुझे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।”
“ईश्वर करे ऐसा ही हो मेरी बच्ची। उस ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती, पर वो सब देखता है,” जानकी ने हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा।
दिन बीतते गए और रूही की तपस्या गहरी होती गई। झोपड़ी में बिजली नहीं थी, इसलिए वह मिट्टी के तेल की ढिबरी जलाकर देर रात तक पढ़ती रहती थी। तेल खत्म हो जाता, तो वह सड़क के किनारे लगी सरकारी स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर गणित के सवाल हल करती। गाँव के कुछ मनचले और संकीर्ण सोच वाले लोग ताने भी मारते थे, “देखो तो, भट्ठे वाली की बेटी कलेक्टर बनने का सपना देख रही है! आखिर में तो इसे भी किसी चूल्हे में ही झोंकना है।” लेकिन रूही इन सब बातों को अनसुना कर देती। उसके ज़हन में सिर्फ माँ की वो फटी हुई हथेलियाँ घूमती थीं।
दसवीं बोर्ड की परीक्षाएँ समाप्त हुईं और कुछ महीनों बाद जब परिणाम आया, तो पूरा गाँव सन्न रह गया। ईंट-भट्ठे पर काम करने वाली एक लाचार विधवा की बेटी, रूही, ने न केवल अपने स्कूल में पहला स्थान पाया था, बल्कि पूरे ज़िले के मेरिट लिस्ट में दूसरा स्थान हासिल किया था।
उस दिन स्कूल के प्रधानाचार्य खुद मिठाई का डिब्बा लेकर जानकी की झोपड़ी पर आए थे। उन्होंने जानकी के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, “जानकी बहन, तुम्हारी बेटी ने तुम्हारा ही नहीं, पूरे गाँव का नाम रोशन कर दिया है। सरकार की मेधावी छात्रा योजना के तहत रूही को आगे की पढ़ाई के लिए पचास हज़ार रुपये का विशेष पुरस्कार और पूरी स्कॉलरशिप मिली है। अब यह बिटिया आगे शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ेगी।”
जानकी खुशी से सुबक पड़ी। उसने अपनी बेटी को ऐसे देखा जैसे कोई अंधेरे में भटकता मुसाफ़िर अचानक सूरज को देख ले।
शहर के कॉलेज में दाखिला तो हो गया, लेकिन चुनौतियाँ अभी खत्म नहीं हुई थीं। शहर की चमक-दमक के बीच रूही अपने साधारण सूती सूट और सादगी के कारण कभी-कभी उपहास का पात्र बनती, लेकिन उसकी मेधा के आगे हर कोई नतमस्तक हो जाता। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ उसने कंप्यूटर साइंस में विशेष रुचि दिखाई। वह कॉलेज की लाइब्रेरी में घंटों बैठकर कोडिंग सीखती। जहाँ बाकी छात्र कैफे और सिनेमा में समय बिताते, वहीं रूही ऑनलाइन प्रोजेक्ट्स ढूँढकर छोटे-मोटे फ्रीलांसिंग काम करती, ताकि अपनी माँ को गाँव से हर महीने कुछ पैसे भेज सके और माँ को भट्ठे का काम छुड़वा सके।
पर जानकी ने काम नहीं छोड़ा। वह कहती, “जब तक मेरी साँस चलेगी, मैं तेरे रास्ते में कोई रुकावट नहीं आने दूँगी। तू बस आगे देख।”
कॉलेज के अंतिम वर्ष में देश-विदेश की बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल सॉफ्टवेयर कंपनियाँ कैंपस प्लेसमेंट के लिए आईं। रूही ने अपनी कड़ी मेहनत, तीक्ष्ण बुद्धि और अडिग आत्मविश्वास के बल पर सभी कठिन तकनीकी और साक्षात्कार के दौर पार कर लिए। जब अंतिम परिणाम की घोषणा हुई, तो दुनिया की एक शीर्ष तकनीकी कंपनी ने रूही को लाखों के सालाना पैकेज पर ‘सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट’ के पद पर चुन लिया था। इसके साथ ही उसे शुरुआती प्रशिक्षण के लिए सीधे कंपनी के मुख्यालय यानी बेंगलुरु बुलाया गया था।
गाँव में जब यह खबर पहुँची, तो किसी को अपनी आँखों और कानों पर विश्वास नहीं हुआ। जिन लोगों ने कभी जानकी का मज़ाक उड़ाया था, वे आज हाथ जोड़कर उसकी झोपड़ी के बाहर खड़े होकर बधाई दे रहे थे।
आज का दिन जानकी के जीवन का सबसे बड़ा दिन था।
शहर के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर का नज़ारा बेहद भव्य था। ऊँची-ऊँची शीशे की इमारतें, चमचमाती गाड़ियाँ और सूट-बूट में आते-जाते लोग। उसी टर्मिनल के बाहर, अपनी पुरानी लेकिन साफ-सुथरी सूती साड़ी का पल्लू कसकर पकड़े जानकी खड़ी थी। उसके साथ खड़ी थी रूही—फॉर्मल कपड़ों में सजी, आत्मविश्वास से भरपूर, एक सफल कॉर्पोरेट पेशेवर। कंपनी की कैब उसे सीधे एयरपोर्ट से ऑफिस ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी।
रूही ने अपनी माँ के पैर छुए। जानकी ने कांपते हाथों से अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। जब रूही ने अपना लैपटॅाप बैग संभाला और मुस्कुराते हुए एयरपोर्ट के स्वचालित दरवाज़ों की ओर कदम बढ़ाए, तो जानकी की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली।
यह आँसू उन पुराने दुखों, जिल्लतों और गर्दिशों के नहीं थे। ये आँसू उस माँ की तपस्या की पूर्णता के थे। जानकी को लगा मानो वह कोई सपना देख रही हो। उसे याद आया वह दिन जब उसके पास रूही की स्कूल की फीस के लिए पाँच रुपये नहीं थे और उसने अपनी चाँदी की इकलौती लौंग बेच दी थी। आज वही बेटी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी में एक सम्मानित पद पर अपनी ज़िम्मेदारी संभालने जा रही थी।
“हे भगवान… बिन बाप की इस बच्ची को तूने अपनी गोद में रख लिया। मेरी तपस्या सफल हो गई,” जानकी ने बुदबुदाते हुए अपने फटे आँचल के कोने से अपनी आँखें पोंछीं।
तभी उसकी नज़र पास के एक छोटे से घास के मैदान पर पड़ी। वहाँ एक आवारा गाय लेटी हुई थी, जिसके पैर में किसी गाड़ी से खरोंच लग गई थी और गहरा ज़ख्म था। उसकी नन्हीं बछड़ी बड़ी तन्मयता से, अपनी ममता भरी जीभ से माँ के उस ज़ख्म को बार-बार सहला रही थी, मानो कह रही हो कि ‘माँ, अब दर्द भूल जा, मैं आ गई हूँ।’
जानकी की आँखों में एक तृप्त, शांत और अलौकिक मुस्कान तैर गई। उसने समझा कि सृष्टि का नियम यही है—त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। माँ की दी हुई ममता और संस्कारों का ऋण जब कोई औलाद अपने कर्मों से चुकाती है, तो धरती पर ही स्वर्ग उतर आता है। जानकी ने गर्व से अपना सिर उठाया; आज वह किसी ईंट-भट्ठे की मजदूर नहीं, बल्कि एक विजयी बेटी की स्वाभिमानी माँ थी।
प्रिय पाठकों,
क्या आपको भी लगता है कि अगर हौसले बुलंद हों और माता-पिता का सच्चा आशीर्वाद साथ हो, तो गरीबी कभी किसी के सपनों की बेड़ी नहीं बन सकती? एक माँ के इस मूक संघर्ष और बेटी की इस ऐतिहासिक सफलता पर आपकी क्या राय है? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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