कर्ज रोशनी का – गोविंद गुप्ता

राधिका उनके चरणों में गिर पड़ी और रोने लगी। उसने अपना परिचय दिया और अपनी पहली तनख्वाह का लिफाफा उनके हाथों में रख दिया। “मांजी, मैं राधिका। आपने मुझे जो जीवनदान दिया था, आज मैं आपका वह कर्ज चुकाने आई हूँ। यह मेरी पहली तनख्वाह है। आपकी उस रात की मदद ने एक गरीब की … Read more

उजले सवेरे की ओर – सपना बबेले

राधिका और सुमित की शादी को हुए अभी पाँच साल ही बीते थे। उनका एक प्यारा सा चार साल का बेटा था, जिसका नाम उन्होंने अनमोल रखा था। सुमित एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर था और राधिका एक कुशल गृहिणी। उनकी जिंदगी किसी शांत नदी की तरह बह रही थी, जिसमें सुख-दुख की … Read more

रेत की तरह फिसलती जिंदगी – अनीता वर्मा 

 रजत की आँखें छत को घूर रही थीं। नींद उनकी आँखों से कोसों दूर जा चुकी थी। ऐसा नहीं था कि वह पहली बार इस बड़े से कमरे में अकेले सो रहे थे। अपने व्यापार के सिलसिले में, मीटिंग्स और विदेशी दौरों के कारण वह अक्सर हफ्तों तक घर से बाहर रहा करते थे। लेकिन … Read more

पराए की पहचान

कौशल्या देवी अपने बहुमंजिला इमारत की बालकनी में बैठी शून्य में ताक रही थीं। सामने शहर की चमचमाती रोशनियां थीं, लेकिन उनके भीतर एक अजीब सा अंधेरा पसरा हुआ था। उनके हाथ में फोन था, जिस पर अभी-अभी उनकी बेटी रितु का कॉल कटा था। रितु की बातें उनके कानों में किसी विषैले बाण की … Read more

अंधी दौड़ – गरिमा चौधरी 

आलोक एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर था। उसकी ज़िंदगी सुबह मोबाइल के अलार्म से शुरू होती थी और रात को लैपटॉप की स्क्रीन बंद होने पर खत्म होती थी। अपनी माँ, सुमित्रा देवी को गाँव में अकेला न छोड़कर वह शहर अपने साथ तो ले आया था, लेकिन उन्हें देने … Read more

 एक नया रिश्ता

सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड के बावजूद मेघा के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। गैस के एक बर्नर पर कुकर सीटी दे रहा था और दूसरे पर वह तेजी से रोटियां सेंक रही थी। आज ऑफिस में मेघा का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन था, जिसके लिए … Read more

संस्मरण – मधु वशिष्ठ

 जीवन में अब तक बहुत से दोस्त मिले। कुछ अच्छे और कुछ बहुत अच्छे। लेकिन वह दोस्त भले ही हमारे ऑफिस के सहकर्मी थे या हम जब सरकारी मकान में रहते थे, वहां के पड़ोसी लेकिन यह बात नितांत सत्य है कि जब जब भी वह सहकर्मी ट्रांसफर होकर दूसरे विभाग में चले जाते थे … Read more

आपसी समझ भी जरूरी है – डॉ बीना कुण्डलिया 

ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन कॉलवेल की बजती आवाज सबके कानों को बेध रही थी। मगर आज भोर सवेरे जबकि सन्डे की छुट्टी का दिन और फिर सर्दियों की सुबह जब कि सूरज भी निकलने को तैयार नजर नहीं आ रहा, ऐसे में बिस्तर को छोड़कर बाहर आने की हिम्मत कौन करता भला ?  जयंत बाबू … Read more

असली दौलत

प्रकाश बाबू ने एक बार अपने भाई की ओर देखा, कुछ कहना चाहा, लेकिन उनका गला रुंध गया। वे चुपचाप उठे, हाथ जोड़े और भारी कदमों से उस आलीशान बंगले से बाहर निकल आए। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पैदल चलते हुए उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके दिमाग में रमेश के शब्द … Read more

फुर्सत – प्रतिमा श्रीवास्तव

भाभी आप तो कभी हमारे साथ बैठतीं हीं नहीं है। आखिर हम ननदें हैं आपकी ,थोड़ा बहुत समय हमारे लिए भी निकाल लिया करें। संगीता जिसकी शादी को अभी कुछ ही समय हुए थे।पति रोहित की तीन बहनें और मां – पापा से भरा पुरा परिवार था। जूही बड़ी ननद एम .ए. कर रही थी, … Read more

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