रघुनाथ जी दौड़कर अपनी बेटी के पास पहुँचे और उसके पैरों में गिर पड़े। उनके आँसुओं से अवनि के पैर भीग गए। वे फफक-फफक कर रोते हुए बोले, “बेटी, मुझे माफ कर दे! हमने तुझे घर का बोझ समझा, तेरे दर्द को नहीं समझा और तुझे जिंदा लाश समझकर छोड़ दिया। तूने तो आज हमारा सिर फख्र से इतना ऊँचा कर दिया कि हम आसमान छू रहे हैं।”
गाँव की पुरानी हवेली के आँगन में लगे नीम के पेड़ से छनकर आती सुबह की धूप अब अवनि की आँखों में नहीं उतरती थी। दो साल पहले हुए उस भयानक सिलेंडर विस्फोट ने न केवल उसके चेहरे की मुस्कान झुलसा दी थी, बल्कि दोनों आँखों की रोशनी भी हमेशा के लिए छीन ली थी। उस हादसे से पहले अवनि पूरे घर की धड़कन हुआ करती थी। पिता रघुनाथ जी की लाडली, माँ मालती देवी की परछाई और छोटे भाई रोहन की मार्गदर्शक। जब वह चलती थी तो उसकी पायल की झनकार पूरे घर में खुशियाँ बिखेर देती थी। मगर नियति के एक क्रूर थप्पड़ ने सब कुछ बदल कर रख दिया।
हादसे के कुछ महीनों तक तो रिश्तेदारों और घर के लोगों ने सहानुभूति दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे उस सहानुभूति की जगह उपेक्षा और बेचारगी के भाव ने ले ली। जिस आँगन में कभी अवनि के ठहाके गूँजते थे, अब वहाँ उसके कदम पड़ते ही एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता था। माँ जब भी उसे देखती, उसकी आँखों से आँसू छलक पड़ते और वह लंबी आह भरकर कहती कि हे भगवान, इस अंधी लड़की की जिंदगी अब कैसे कटेगी, कौन करेगा इससे शादी और कौन उठाएगा इसका बोझ। पिता रघुनाथ जी पहले की तरह उसके सिर पर हाथ तो फेरते थे, लेकिन उनकी उस छुअन में अब प्यार से ज्यादा बेचारगी और लाचारी का अहसास होता था। वे उससे नजरें चुराने लगे थे, शायद इसलिए कि उसकी निष्प्राण आँखें उनके सीने में दर्द का खंजर घोंप देती थीं।
सबसे ज्यादा दुख अवनि को अपने छोटे भाई रोहन के बर्ताव से होता था। वही रोहन जो कभी स्कूल का होमवर्क करने के लिए अवनि के आगे-पीछे घूमता था, अब अपने दोस्तों के सामने उसे दीदी कहने में भी कतराने लगा था। एक दिन अवनि रसोई की तरफ जा रही थी, तभी रोहन के दोस्त घर आए। रोहन ने तपाक से अवनि का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए अंदर के कमरे में ले गया। उसने दरवाजे की कुंडी चढ़ाते हुए धीरे से कहा कि दीदी, जब मेरे दोस्त आया करें तो बाहर मत निकला करो, सब तुम्हारा यह चेहरा और सफेद आँखें देखकर अजीब बातें बनाते हैं।
उस दिन अवनि के सीने में जो दर्द उठा, वह उस आग की जलन से भी कहीं ज्यादा तीखा था जिसने उसकी आँखें छीनी थीं। वह अंधेरे कमरे के एक कोने में सिमट कर बैठ गई। उसने महसूस किया कि समाज और परिवार के लिए शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति केवल दया का पात्र बनकर रह जाता है, और दया इंसान को अंदर से खोखला कर देती है। लोग आपको जिंदा तो रखते हैं, लेकिन आपके वजूद को हर रोज मारते हैं।
उस रात अवनि ने अपनी तकिया को आँसुओं से भिगोते हुए एक बड़ा फैसला लिया। उसने खुद से कहा कि आँखें चली गई हैं तो क्या हुआ, सोचने-समझने की शक्ति और हौसला तो अब भी जिंदा है। वह किसी पर बोझ बनकर तिल-तिल मरने के बजाय अपने दम पर अपनी पहचान बनाएगी।
अगले ही दिन उसने अपने पुराने रेडियो को अलमारी से निकाला। वह ब्रेल लिपि सीखने की जिद पर अड़ गई। शुरुआत में घर वालों ने इसे पागलपन समझा। पिता ने कहा कि अब पढ़कर क्या करोगी, घर में चुपचाप बैठी रहो, जो रूखा-सूखा मिलेगा खा लेना। लेकिन अवनि ने हार नहीं मानी। उसने पास के शहर में स्थित एक नेत्रहीन विद्यालय के शिक्षक माधव जी से संपर्क किया, जो कभी उसके स्कूल में आया करते थे। माधव जी ने अवनि के भीतर की तड़प को पहचाना। उन्होंने उसे ब्रेल लिपि की किताबें और एक ऑडियो प्लेयर उपलब्ध कराया।
शुरू-शुरू में उंगलियों के पोरों से उभरे हुए बिंदुओं को पहचानना बेहद कठिन था। कई बार उसकी उंगलियों में दर्द होता, सिर चकराने लगता, लेकिन अवनि ने रुकना नहीं सीखा। जब पूरा परिवार रात को सो जाता, अवनि अपने अंधेरे कमरे में कान में इयरफोन लगाकर ऑडियो लेक्चर सुनती और ब्रेल लिपि पर उंगलियाँ फेरती रहती। उसके लिए दिन और रात का फर्क मिट चुका था, उसके भीतर सिर्फ एक ही धुन सवार थी—सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी।
गाँव और परिवार के लोग अक्सर ताने मारते। चाची जब भी आतीं, कहतीं कि जब साबुत आँख वाले बच्चे कुछ नहीं कर पा रहे, तो यह अंधी क्या तीर मार लेगी। माँ को भी लगता था कि बेटी का दिमाग हादसे के सदमे से फिर गया है। लेकिन अवनि ने इन सारी बातों को अपने कानों के बाहर ही रोक दिया। उसने अपनी एकांत साधना को ही अपना संसार बना लिया। किताबों की रिकॉर्डिंग सुनते-सुनते वह इतिहास की लड़ाइयों, भूगोल की सीमाओं और संविधान की धाराओं को अपने दिमाग में ऐसे बैठा लेती जैसे कोई कलाकार कैनवास पर रंग भरता है।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। दो साल बीत गए। घर की आर्थिक स्थिति रघुनाथ जी की बीमारी के चलते और खराब हो गई थी। रोहन पढ़ाई में लापरवाह निकला और बुरी संगत में पड़कर पैसे उड़ाने लगा था। परिवार पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा था और हर तरफ निराशा के बादल छाए हुए थे। ऐसे माहौल में अवनि ने बिना किसी को बताए राज्य प्रशासनिक सेवा (PCS) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के फॉर्म भरे। परीक्षा केंद्र तक जाने के लिए उसने अपने पुराने शिक्षक माधव जी की मदद ली। परिवार को बस इतना पता था कि अवनि किसी काम से शहर गई है।
मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब साक्षात्कार का बुलावा आया, तब भी उसने घर में किसी को भनक नहीं लगने दी। साक्षात्कार बोर्ड के सदस्यों ने जब एक दृष्टिहीन लड़की के आत्मविश्वास, तीक्ष्ण बुद्धि और समाज के प्रति उसके सकारात्मक दृष्टिकोण को देखा, तो वे दंग रह गए। अवनि ने हर सवाल का जवाब इतनी शालीनता और गहराई से दिया कि कमरे में बैठे सभी अधिकारी मंत्रमुग्ध हो गए।
आखिरकार वह दिन आ ही गया जब परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित होना था। उस दिन हवेली के आँगन में भारी तनाव था। साहूकार रघुनाथ जी के दरवाजे पर अपने पैसे मांगने आ धमका था और जोर-जोर से चिल्लाकर बेइज्जत कर रहा था। रघुनाथ जी हाथ जोड़े सिर झुकाए खड़े थे, माँ आँचल में मुँह छिपाकर रो रही थी और रोहन डर के मारे अंदर दुबक गया था।
उसी समय बाहर एक सरकारी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी से जिले के वरिष्ठ अधिकारी और स्थानीय थाने की पुलिस नीचे उतरी। गाँव के लोग तमाशा देखने के लिए रघुनाथ जी के दरवाजे पर जमा हो गए। रघुनाथ जी घबरा गए कि कहीं साहूकार ने पुलिस तो नहीं बुला ली। वे कांपते हुए आगे बढ़े और हाथ जोड़कर बोले कि साहब, मुझसे क्या गलती हो गई?
गाड़ी से उतरे अनुविभागीय अधिकारी (SDM) मुस्कुराए और बोले, “रघुनाथ जी, गलती नहीं, आपने तो इस पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया है। क्या अवनि जी यहीं रहती हैं?”
रघुनाथ जी हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, “हाँ साहब, वह मेरी बेटी है… पर उसने क्या किया?”
तभी अधिकारी ने पूरे गाँव के सामने घोषणा की, “रघुनाथ जी, आपकी बेटी अवनि ने राज्य प्रशासनिक सेवा परीक्षा में पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान हासिल किया है! वह अब हमारे जिले में नई डिप्टी कलेक्टर बनकर आ रही हैं।”
यह सुनते ही पूरे आँगन में सन्नाटा पसर गया। साहूकार के हाथ से बहीखाता छूट गया। माँ मालती देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं और रोहन दरवाजे की ओट से अपनी उस अंधी दीदी को देखने लगा, जिसे वह दोस्तों से छिपाता फिरता था।
कमरे के अंदर से सफेद छड़ी की हल्की-हल्की खटखटाहट के साथ अवनि बाहर आँगन में आई। उसके चेहरे पर कोई अहंकार नहीं था, केवल एक शांत, दिव्य तेज था। अधिकारी ने आगे बढ़कर फूलों का गुलदस्ता अवनि के हाथों में थमाया और कहा, “मैडम, आपके संघर्ष और सफलता ने यह साबित कर दिया कि असली दृष्टि आँखों में नहीं, हमारे संकल्प में होती है।”
गाँव के लोग तालियाँ बजाने लगे। वही लोग जो कल तक उसे बेचारी और अपशकुन कहते थे, आज उसके कदमों में झुकने को तैयार थे। साहूकार चुपचाप हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए वहाँ से खिसक गया।
रघुनाथ जी दौड़कर अपनी बेटी के पास पहुँचे और उसके पैरों में गिर पड़े। उनके आँसुओं से अवनि के पैर भीग गए। वे फफक-फफक कर रोते हुए बोले, “बेटी, मुझे माफ कर दे! हमने तुझे घर का बोझ समझा, तेरे दर्द को नहीं समझा और तुझे जिंदा लाश समझकर छोड़ दिया। तूने तो आज हमारा सिर फख्र से इतना ऊँचा कर दिया कि हम आसमान छू रहे हैं।”
अवनि ने झुककर अपने पिता को उठाया और उनके गले से लग गई। उसने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए बेहद कोमल स्वर में कहा, “पिताजी, आपने मुझे पाला-पोसा, आप मुझसे माफी मत मांगिए। मेरी आँखें भले चली गई थीं, लेकिन आपने बचपन में मुझे जो हौसला और संस्कार दिए थे, वे मेरे साथ थे। अगर परिस्थितियाँ कठिन हो जाएँ, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि हम टूट जाएँ। मुझे बस यह साबित करना था कि कोई भी शारीरिक कमी इंसान की उड़ान को रोक नहीं सकती।”
माँ मालती देवी ने अवनि को अपने सीने से लगा लिया और रोते हुए उसके माथे को चूमने लगीं। छोटा भाई रोहन अपनी नजरें झुकाए, पश्चाताप के आँसुओं के साथ कोने में खड़ा था। अवनि ने अपनी सफेद छड़ी एक तरफ रखी और रोहन की तरफ हाथ बढ़ाया। रोहन दौड़कर उसके गले से लिपट गया और बोला, “दीदी, मुझे माफ कर दो, मैंने तुम्हें बहुत सताया।”
अवनि ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “रोहन, अब रोना बंद कर। आज के बाद हमारे घर में सिर्फ खुशियों के आँसू बहेंगे।”
पूरा परिवार जो बिखराव की कगार पर था, आज अवनि की उस अटूट इच्छाशक्ति के धागे में फिर से एक हो चुका था। जिस आँगन में कभी बेचारगी का मातम था, आज वहाँ जीत की गूँज थी। अवनि ने साबित कर दिया था कि पंखों से कुछ नहीं होता, अगर आपके इरादों में जान है तो खुला आसमान भी आपके कदमों में झुक जाता है।
जीवन में चाहे जितनी भी बड़ी त्रासदी क्यों न आ जाए, क्या हमें परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देने चाहिए या अवनि की तरह अपने भीतर के विश्वास को जगाकर अंधेरों को चीर देना चाहिए? क्या शारीरिक कमियों से जूझ रहे अपनों को हमारी दया की जरूरत होती है या फिर हमारे अटूट विश्वास और सहयोग की? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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