साँसों से भारी ज़िम्मेदारियाँ

सुधा की उम्र यही कोई पैंतालीस के आस-पास रही होगी। वह उन आम भारतीय महिलाओं में से एक थी, जिनके दिन की शुरुआत घर के सबसे छोटे सदस्य के जागने से पहले होती थी और रात तब होती थी जब घर का आखिरी बल्ब बुझ जाता था। सुधा का परिवार एक टिपिकल मध्यमवर्गीय परिवार था। … Read more

एक जीवन, सात रिश्ते

मैं आज तक उसे सिर्फ एक ‘लड़ाकू’, ‘चिकचिक करने वाली’ और ‘अनपढ़ गृहणी’ समझता रहा। मैं अपनी झूठी शान, अपने पैसों और अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे घर की उस चारदीवारी के अंदर, नमिता  मेरे लिए माँ, बहन, पिता, दोस्त … Read more

वो मीठा सा झूठ

 “बाबूजी कोई बच्चे नहीं हैं अनिकेत। उन्होंने दुनिया देखी है। वो जानते थे कि तुम झूठ बोल रहे हो, लेकिन उन्होंने तुम्हारा झूठ इसलिए सच मान लिया क्योंकि वो तुम्हारी खुशी देखना चाहते थे। और तुमने भी झूठ इसलिए बोला क्योंकि तुम उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकते थे। ये जो झूठ बोलने की बीमारी … Read more

कच्ची मिट्टी का पक्का घर

मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर … Read more

सावन के रंग – भारती अनिल सोनी

आज सुबह से ही दादी मां अत्यंत उत्साह के साथ पूरे घर में दौड़ भाग कर रही हे,, 2 दिन बाद सावन की तीज आ रही हे,, ओर इस बार तो उनकी लाड़ली पोती की पहली तीज है,, तो वो खुद सारी तैयारियां अपने अनुसार करवा रही हे,, बाहर वाले बड़े पेड़ पर झूला डलवा … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – सुदर्शन सचदेवा

सुबह की हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। रसोई से चाय की खुशबू और मंदिर की घंटियों की आवाज़ पूरे घर में घुल रही थी। सुमन रोज़ की तरह सबसे पहले उठ गई थी। सास-ससुर की चाय, पति राजेश का नाश्ता, बच्चों के टिफिन—सब कुछ उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। पिछले पंद्रह वर्षों से … Read more

 विश्वास की डोर

उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने … Read more

सुबह की मीठी धूप

“अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा। मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार … Read more

कर्ज़ ममता का: एक देवर की अपनी भाभी के लिए अनूठी भेंट

रोहन ने कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे। “भाभी, दुनिया कहती है कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने माँ बनाई है। लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसके पास आपके जैसी भाभी हो, उसे तो किसी भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। … Read more

रिश्तों की असली पहचान

वो भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि काश बाबूजी का आना किसी तरह टल जाए। वो नहीं चाहती थी कि जिन बाबूजी को कस्बे में इतना सम्मान मिलता है, उन्हें अपनी ही बेटी के घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़े। लेकिन सुबह हो चुकी थी। ट्रेन का समय हो गया था। मीरा ने … Read more

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