खंडहरों से आसमां तक

वैदेही की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कांपती आवाज में चिन्मय से कहा, “चिन्मय… जिस समंदर को मैं अपनी जिंदगी समझती थी, उसने आज हमसे हमारी छत ही छीन ली। देखो न, आज हमारे सिर पर वही खुला आसमान है, वही तारे हैं जिन्हें हम ढूंढते थे… लेकिन आज मुझे इनसे नफरत हो रही है। आज समझ आ रहा है कि सर पर चार दीवारें और एक मामूली सी छत होना कितना बड़ा वरदान होता है। छत सिर्फ धूप और बारिश से नहीं बचाती, वह इंसान के आत्मसम्मान और सुरक्षा की ढाल होती है। आज हम बेघर हैं चिन्मय… सब खत्म हो गया।”

रत्नागिरी के शांत समुद्री तट के किनारे बसा वह छोटा सा सुंदर घर किसी चित्रकार की कल्पना जैसा लगता था। घर की बालकनी सीधे अरब सागर के सीने पर खुलती थी, जहाँ से दूर क्षितिज तक फैला अथाह पानी, ढलते सूरज की लालिमा और लहरों का मधुर संगीत हर पल जीवन को एक नए उत्सव में बदल देता था। इस आशियाने में कदम रखे वैदेही को अभी कुल जमा सात महीने ही हुए थे। शादी से पहले उसने जिस जीवनसाथी का सपना अपनी आँखों में सजाया था, चिन्मय उस सांचे में एकदम खरा उतरता था। वह संवेदनशील था, जिम्मेदार था और सबसे बढ़कर वैदेही की छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल अपनी पलकों पर रखता था।

वैदेही को बचपन से ही बहते पानी, दरिया और समंदर से एक अजीब सा रूहानी लगाव था। वह जब भी पानी की लहरों को तट से टकराकर लौटते देखती, तो घंटों उसमें खोई रहती थी। चिन्मय भी उसके इस शौक का पूरा मान रखता था। सुबह जब समंदर की ठंडी नम हवाएं खिड़कियों से छनकर आतीं, तो दोनों बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ दिन का स्वागत करते। चिन्मय पेशे से एक आर्किटेक्ट था, जो पुराने पारंपरिक घरों को नया रूप देने का काम करता था, जबकि वैदेही एक स्कूल में संगीत सिखाती थी। दोनों का तालमेल ऐसा था जैसे किसी पुरानी गजल में सुर और साज का संगम।

एक शाम जब सूरज ढल चुका था और आसमान में सिंदूरी रंग की जगह स्याह नीलेपन ने ले ली थी, वैदेही बालकनी की रेलिंग पकड़कर समंदर को निहार रही थी। चिन्मय पीछे से आया और उसके कंधों पर शॉल डालते हुए बोला, “इतनी एकाग्रता से क्या देख रही हो वैदेही? लहरें तो रोज ही ऐसे आती और जाती हैं।”

वैदेही ने मुड़कर उसकी आँखों में देखा और मुस्कुरा दी, “चिन्मय, समंदर की ये लहरें जब दूर से आती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई गहरी बात फुसफुसा रही हों। बचपन में मेरी नानी कहती थीं कि समंदर के पास जो दिल की सच्ची पुकार लेकर जाता है और लहरों में सिक्का डालकर मन्नत मांगता है, समंदर उसकी झोली कभी खाली नहीं रखता। लहरें सारी उदासी सोख लेती हैं और बस सुकून छोड़ जाती हैं।”

चिन्मय हंस पड़ा, “अच्छा! तो फिर हमारी बेगम साहिबा ने आज क्या मन्नत मांगी इस विशाल समंदर से?”

“मन्नत बताई नहीं जाती चिन्मय, बस शिद्दत से महसूस की जाती है,” वैदेही ने चिढ़ाते हुए कहा।

“तो फिर चलो, बालकनी से दूर क्यों रहना? सीधे किनारे चलते हैं,” चिन्मय ने उसका हाथ थाम लिया। उस रात पूर्णिमा के आसपास का समय था। समंदर की सतह पर चांदनी ऐसे चमक रही थी मानो किसी ने नीले मखमली कालीन पर पिघली हुई चांदी उड़ेल दी हो। दोनों रेत पर नंगे पांव चलते रहे। लहरें आतीं और उनके पैरों को छूकर एक सिहरन पैदा कर जातीं।

“हम इंसान भी कितने अजीब हैं न चिन्मय,” वैदेही ने रेत पर बैठते हुए कहा, “दिनभर चारदीवारी, पंखों और कंक्रीट के कमरों में कैद रहते हैं। प्रकृति ने इतनी अपार सुंदरता हमारे चारों तरफ बिखेर रखी है, पर हम इसे देखने के लिए वक्त ही नहीं निकालते। आज देखो, यह खुला आसमान, यह खामोश समंदर और यह शीतल हवा… ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया की शांति यहीं सिमट आई हो।”

चिन्मय ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, “तुम सच कह रही हो। जब तक हम प्रकृति के करीब नहीं आते, हमें अपनी ही बनाई बनावटी दुनिया सबसे खूबसूरत लगती है। आज हम यहीं रेत पर बैठकर इस रात को महसूस करेंगे।”

दोनों घंटों बातें करते रहे। जीवन के छोटे-छोटे किस्से, भविष्य के सपने, और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम। बात करते-करते कब वैदेही का सिर चिन्मय के कंधे पर ढुलक गया और कब चिन्मय की आँखें भारी हो गईं, पता ही नहीं चला। जब सुबह दूर मंदिर की घंटियों और मछुआरों की आवाजों से उनकी नींद खुली, तो पूरब में सूरज की पहली किरण समंदर को चूम रही थी। वह एक ऐसा अनुभव था जिसने दोनों की आत्मा को एक नई ताजगी से भर दिया था।

इसके बाद तो यह सिलसिला उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। काम की तमाम थकान के बाद रात को समंदर किनारे टहलना, कभी छत पर बैठकर लहरों का शोर सुनना और कभी ठंडी हवाओं में सांस लेना उनका नियम बन गया।

समय अपनी गति से पहिया घुमाता रहा। दो साल बीत गए। उनके छोटे से संसार में खुशियों की एक और नई किरण फूट पड़ी जब वैदेही की गोद में एक नन्ही सी परी आई, जिसका नाम उन्होंने ‘अवनि’ रखा। अवनि के आने से घर की हर दीवार जैसे मुस्कुराने लगी थी। अब जब भी चिन्मय और वैदेही समंदर किनारे जाते, नन्ही अवनि चिन्मय के सीने से चिपकी रहती और लहरों की आवाज सुनकर अपनी नन्ही हथेलियां हिलाती। जीवन अपनी सबसे खूबसूरत लय में बह रहा था।

लेकिन जीवन कब किस मोड़ पर कौन सा इम्तिहान सामने खड़ा कर दे, कोई नहीं जानता।

यह मई का अंतिम सप्ताह था। मौसम विभाग ने पिछले दो दिनों से तटीय इलाकों में भारी चक्रवात और तूफान की चेतावनी जारी की थी, लेकिन उस इलाके के लोगों के लिए तेज हवाएं और बारिश कोई नई बात नहीं थी। सबने सोचा कि सामान्य तूफानों की तरह यह भी कुछ तेज बौछारों के बाद निकल जाएगा।

उस रात हवा में अजीब सी भारी उमस और बेचैनी थी। देर रात करीब तीन बजे अचानक समंदर से एक ऐसी भयानक गड़गड़ाहट उठी मानो पाताल का सीना चीरकर कोई दैत्य बाहर निकल आया हो। खिड़कियों के कांच थरथरा कर टूटने लगे। वैदेही की आँख अचानक खुली। अवनि पालने में जोर-जोर से रो रही थी। वैदेही ने जैसे ही बिस्तर से पैर नीचे रखा, कमरे में टखनों तक खारा पानी भर चुका था।

“चिन्मय! उठो चिन्मय! पानी अंदर आ रहा है!” वैदेही घबराकर चिल्लाई।

चिन्मय हड़बड़ाकर उठा। उसने देखा कि खिड़की के बाहर समंदर अब शांत नहीं था, बल्कि दस-दस फीट ऊंची विकराल लहरें उनके अहाते की दीवारों को तोड़कर सीधे घर के अंदर घुस रही थीं। तेज चक्रवाती तूफान ने पेड़ों को उखाड़ना शुरू कर दिया था।

“वैदेही, अवनि को लो और तुरंत छत की तरफ भागो, जल्दी!” चिन्मय चिल्लाया।

लेकिन इससे पहले कि वे सीढ़ियों तक पहुँच पाते, एक जोरदार धमाके के साथ मुख्य दरवाजा टूट गया और पानी का एक प्रचंड रेला घर के भीतर समा गया। पूरा घर हिलने लगा। नींव से पत्थरों के चटकने की आवाजें आने लगीं। चिन्मय ने किसी तरह वैदेही और बच्ची को सहारा देकर पीछे के ऊंचे टीले की तरफ धकेला। वे तीनों जान हथेली पर रखकर उस दलदली टीले की ओर भागे ही थे कि एक तेज कड़कड़ाहट हुई और उनका प्यारा घर, जिसे चिन्मय ने अपनी मेहनत के एक-एक पैसे से संवारा था, ताश के पत्तों की तरह ढहकर लहरों के मलबे में तब्दील हो गया।

उस वक्त तो सिर्फ इस बात का शुक्र था कि तीनों की सांसें सलामत थीं। अगर वैदेही चंद सेकंड भी देर करती, तो तीनों उसी मलबे के नीचे दफन हो जाते।

लेकिन असली त्रासदी तो अब शुरू हुई थी। तूफान भले ही सुबह तक धीमा पड़ गया था, लेकिन वह अपने पीछे तबाही का एक ऐसा मंजर छोड़ गया था जिसे देखकर रूह कांप जाए। चारों तरफ पानी ही पानी था। नारियल के विशाल पेड़ जड़ों समेत उखड़े पड़े थे। बिजली के खंभे मुड़े हुए थे और सड़क का नामोनिशान मिट चुका था। जो लोग रात को महलों में सोए थे, वे सुबह फटेहालों में खुले आसमान के नीचे कीचड़ से सने खड़े थे।

किसी के पास तन ढकने के लिए सूखे कपड़े नहीं थे, किसी के जूते चप्पल बह गए थे। चिन्मय केवल एक टी-शर्ट और पजामे में था, जबकि वैदेही गीली साड़ी में लिपटी ठिठुरती अवनि को अपनी छाती से चिपकाए हुए थी। बच्ची भूख और ठंड से नीली पड़ रही थी, लगातार रोए जा रही थी। वैदेही खुद पिछले चौबीस घंटे के सदमे और भूख से इतनी बेदम थी कि बच्ची का पेट भरने के लिए उसके सीने में दूध भी नहीं उतर रहा था।

दोपहर ढलते-ढलते कुछ राहत दल और स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं नावों के जरिए बिस्कुट, पानी की बोतलें और तिरपाल लेकर पहुँचे। लेकिन हालात इतने भयावह थे कि मदद हर किसी तक आसानी से नहीं पहुँच पा रही थी। हर कोई अपने टूटे हुए घर के मलबे के सामने पथराई आँखों से बैठा था, इस उम्मीद में कि शायद मलबे से उनकी जिंदगी की कोई पुरानी निशानी, कोई कागजात या कोई जरूरी सामान सलामत निकल आए। कोई भी उस जगह को छोड़ने को तैयार नहीं था।

शाम घिर आई। वही समंदर, जिसकी लहरों में कभी वैदेही को संगीत सुनाई देता था, आज किसी आदमखोर जैसा लग रहा था। वही चांदनी, जो कभी चांदी की तरह बदन को सहलाती थी, आज रात खुले आसमान के नीचे ओस बनकर उनकी हड्डियों को कंपा रही थी।

वैदेही ने एक गीले पत्थर पर बैठकर ऊपर देखा। आसमान बिल्कुल साफ था, पूर्णिमा का चांद चमक रहा था और तारे टिमटिमा रहे थे। लेकिन आज उन तारों में कोई जादू नहीं था, कोई रहस्य नहीं था। आज वे तारे किसी क्रूर तमाशबीन की तरह लग रहे थे जो उनकी बेबसी पर हंस रहे हों।

वैदेही की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कांपती आवाज में चिन्मय से कहा, “चिन्मय… जिस समंदर को मैं अपनी जिंदगी समझती थी, उसने आज हमसे हमारी छत ही छीन ली। देखो न, आज हमारे सिर पर वही खुला आसमान है, वही तारे हैं जिन्हें हम ढूंढते थे… लेकिन आज मुझे इनसे नफरत हो रही है। आज समझ आ रहा है कि सर पर चार दीवारें और एक मामूली सी छत होना कितना बड़ा वरदान होता है। छत सिर्फ धूप और बारिश से नहीं बचाती, वह इंसान के आत्मसम्मान और सुरक्षा की ढाल होती है। आज हम बेघर हैं चिन्मय… सब खत्म हो गया।”

चिन्मय ने अपनी पत्नी के कांपते हाथों को थामा और फिर अपनी नन्ही बेटी के चेहरे को देखा जो अब थककर सो चुकी थी। चिन्मय की आँखों में भी नमी थी, लेकिन उस नमी के पीछे एक चट्टान जैसी दृढ़ता अचानक उभर आई। उसने वैदेही के आंसू पोंछे।

“नहीं वैदेही, सब खत्म नहीं हुआ है,” चिन्मय ने एक बहुत ही शांत और गंभीर स्वर में कहा। “समंदर ने हमारी दीवारें तोड़ी हैं, हमारी सांसें नहीं छीनीं। उसने कंक्रीट का ढांचा बहाया है, हमारे भीतर का हुनर, हमारा हौसला और हमारा एक-दूसरे पर विश्वास नहीं बहा पाया। यह आसमान आज हमें बेबस लग रहा है क्योंकि हमारी छत गिर गई है, लेकिन यही खुला आसमान हमें यह भी याद दिला रहा है कि हमारे उड़ने की कोई सीमा नहीं है।”

वैदेही ने अचरज से अपने पति का चेहरा देखा। जिस शख्स का सब कुछ लुट चुका था, उसके चेहरे पर यह तेज कहाँ से आ रहा था?

चिन्मय ने आगे कहा, “एक आर्किटेक्ट होने के नाते मैंने हमेशा दूसरों के लिए मजबूत घर बनाए, लेकिन अपने लिए जो बनाया वह कुदरत के एक थपेड़े को भी नहीं झेल पाया। यह मेरी हार नहीं, बल्कि कुदरत का एक सबक है। मैं वादा करता हूं वैदेही, हम यहां रोकर अपनी किस्मत को नहीं कोसेंगे। हम फिर से खड़े होंगे। मैं न सिर्फ अपने परिवार के लिए, बल्कि इस पूरे गांव के लिए ऐसे घर बनाऊंगा जो किसी भी तूफान के आगे कभी नहीं झुकेंगे।”

अगली सुबह जब सूरज निकला, तो चिन्मय टूटे हुए लोगों की कतार में नहीं बैठा था। उसने राहत शिविर के कार्यकर्ताओं के साथ हाथ मिलाया। उसने अपनी वास्तुकला की समझ का इस्तेमाल करते हुए वहां पड़े बांस, मजबूत रस्सियों और तिरपालों से सबसे पहले महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए आपातकालीन सुरक्षित शेल्टर तैयार करवाए। उसकी इस पहल ने बाकी हताश ग्रामीणों के भीतर भी एक नई ऊर्जा फूंक दी। जो लोग कल तक छाती पीट रहे थे, वे चिन्मय के साथ मिलकर मलबा हटाने और पुनर्वास के काम में जुट गए।

आने वाले महीनों में जिंदगी बेहद कठिन रही। वे कई हफ्तों तक राहत कैंपों में रहे। चिन्मय ने सरकारी योजनाओं, गैर-सरकारी संगठनों और अपनी पुरानी जमा-पूंजी जो बैंक में सुरक्षित थी, उसके सहारे एक नया अभियान शुरू किया—’सुरक्षित तटीय आवास मिशन’। उसने स्थानीय पत्थरों, बांस और आधुनिक तकनीक का एक ऐसा अनोखा मॉडल तैयार किया जो चक्रवात और बाढ़-रोधी था।

वैदेही ने भी हिम्मत नहीं हारी। उसने कैंपों के बच्चों को इकट्ठा किया, उन्हें पढ़ाना और संगीत सिखाना शुरू किया ताकि बच्चों के कोमल मनों से उस खौफनाक रात का डर निकल सके। पत्नी के इस आत्मबल ने चिन्मय को दोगुनी ताकत दी।

कड़ी मेहनत, पसीने और कभी न हार मानने वाले जज्बे के बल पर तीन साल के भीतर उस इलाके की तस्वीर बदल गई। उस वीरान और तबाह हो चुके तट पर अब मजबूत, सुंदर और पर्यावरण-अनुकूल घरों की एक नई बस्ती खड़ी थी। और उसी बस्ती के एक ऊंचे, सुरक्षित टीले पर चिन्मय और वैदेही का नया घर भी बनकर तैयार हो गया था। इस बार यह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों का नहीं था, बल्कि अनुभव, संघर्ष और अटूट प्रेम की नींव पर खड़ा था।

नए घर में गृह-प्रवेश की रात थी। संयोग से वह भी शरद की एक पूर्णिमा की ही रात थी।

घर के आंगन में चिन्मय, वैदेही और अब चार साल की हो चुकी अवनि बैठे हुए थे। दूर समंदर की लहरें अपने पुराने अंदाज में मचल रही थीं। ठंडी, मीठी हवा बह रही थी। आसमान में अनगिनत तारे टिमटिमा रहे थे।

अवनि चिन्मय की गोद में बैठकर अपनी नन्ही उंगली से आसमान के एक चमकते तारे की तरफ इशारा करते हुए बोली, “पापा, देखो वो तारा कितना चमक रहा है!”

वैदेही ने चिन्मय की तरफ देखा। उसकी आँखों में आज कोई भय नहीं था, कोई शिकन नहीं थी।

“चिन्मय,” वैदेही ने धीरे से कहा, “आज फिर वही तारे हैं, वही चांदनी है और वही समंदर है। पर आज मुझे इनसे डर नहीं लग रहा।”

चिन्मय मुस्कुराया, “जानती हो क्यों? क्योंकि उस रात हम इन तारों को जमीन पर बेबस होकर देख रहे थे, लेकिन आज हम इन्हें अपनी उस छत के नीचे से देख रहे हैं जिसे हमने अपनी मेहनत, उम्मीद और विश्वास से दोबारा खड़ा किया है। कुदरत हमें कभी-कभी खुले आसमान के नीचे इसलिए ला पटकती है ताकि हम यह जान सकें कि हमारे भीतर खुद का एक नया आसमां रचने की कितनी ताकत है।”

वैदेही ने चिन्मय के कंधे पर सिर रख दिया। समंदर की लहरें आज फिर एक मधुर लोरी जैसी लग रही थीं। उन्होंने सीख लिया था कि जीवन में असली छत ईंट और सीमेंट की नहीं होती, असली छत तो परिवार का आपसी प्यार, एक-दूसरे का संबल और विपत्ति में भी न डगमगाने वाला हौसला होती है। जब तक यह आंतरिक छत सलामत है, दुनिया का कोई भी तूफान आपको बेघर नहीं कर सकता।

जीवन कभी भी एक सीधी लकीर पर नहीं चलता। कभी खुशियों की सौगात होती है, तो कभी दुखों का अप्रत्याशित सैलाब। लेकिन क्या किसी विपदा के आ जाने से जिंदगी वहीं ठहर जानी चाहिए? जब हालात हमारे आशियाने उजाड़ दें, तो क्या हमें किस्मत का रोना रोना चाहिए या फिर चिन्मय और वैदेही की तरह उम्मीद का एक-एक तिनका जोड़कर एक नया सवेरा रचना चाहिए?

इस कहानी और चिन्मय के संघर्ष पर आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि इंसान का सबसे बड़ा संबल उसका अपना परिवार और उसका अटूट आत्मविश्वास होता है? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

मूल लेखिका : कमलेश राणा 

error: Content is protected !!