अवंतिका ने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए बहुत ही सौम्यता से कहा, “बाबूजी, आपको माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है। आपने मुझे जो संस्कार दिए थे, मैं उनके खिलाफ कभी नहीं थी। लेकिन मुझे यह समझ आ गया कि त्याग का अर्थ खुद को मिटा देना नहीं होता। अगर कोई स्त्री अपने हिस्से का उजाला किसी और को दे दे और खुद अंधेरे में बैठ जाए, तो वह संस्कार नहीं, बल्कि एक अन्याय है। ईश्वर ने बेटों और बेटियों दोनों को दो पंख दिए हैं, ताकि वे मिलकर इस संसार के आकाश में उड़ सकें। एक के पंख काटकर दूसरे को दोहरा आकाश देने से कभी किसी परिवार का भला नहीं हो सकता।”
मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर की संकरी गलियों में एक पुराना, पुश्तैनी मकान खड़ा था। मकान के बड़े से लकड़ी के मुख्य द्वार पर पीतल की सांकल लगी थी, जो खुलते समय एक भारी सी गूँज पैदा करती थी। उस घर में रहने वाले पंडित विद्याधर चतुर्वेदी अपने सख्त उसूलों और खानदानी मर्यादाओं के लिए पूरे इलाके में जाने जाते थे। उनकी पत्नी सुलोचना देवी एक ऐसी घरेलू महिला थीं, जिनका पूरा जीवन रसोई के चूल्हे और पति की आज्ञाओं के इर्द-गिर्द सिमट चुका था।
इस परिवार में दो बच्चे थे। बड़ा बेटा मयंक और उससे दो साल छोटी बेटी अवंतिका। बचपन में दोनों एक जैसे ही आँगन में दौड़ते, एक जैसे खिलौनों के लिए झगड़ते और एक जैसी मासूमियत के साथ बारिश में भीगने की ज़िद करते थे। लेकिन जैसे-जैसे उम्र के साल बढ़ते गए, घर की दीवारों के भीतर एक अदृश्य विभाजन रेखा गहरी होती चली गई।
अवंतिका जन्म से ही बेहद तीक्ष्ण बुद्धि, निडर और चंचल स्वभाव की थी। जब वह सात साल की थी, तो मोहल्ले के एक उद्दंड लड़के द्वारा पेड़ पर लटके पंछी के घोंसले को तोड़े जाने पर वह बिना डरे उससे भिड़ गई थी। उसने उस लड़के से घोंसला छीन लिया और उसे डांटकर भगा दिया था। शाम को जब यह बात घर पहुँची, तो विद्याधर जी ने अपनी भौंहें सिकोड़ लीं। उन्होंने अवंतिका को अपने पास बैठाया और बेहद गंभीर स्वर में कहा, “बेटी, निडर होना और सामने बोलना लड़कों का काम है। लड़कियों का सबसे बड़ा गहना संकोच और मौन होता है। कल से किसी के सामने अपनी आवाज़ मत उठाना।”
उस शाम अवंतिका ने अपनी निडरता की पहली आहुति दी। उसने अपनी बेबाक नज़रें झुकाना सीख लिया। दूसरी तरफ, मयंक जब भी बाहर किसी से झगड़कर आता, तो विद्याधर जी मुस्कुराकर कहते, “मेरा शेर बेटा है, अपना हक छीनना जानता है।” अवंतिका खामोशी से यह दोहरा मापदंड देखती और अपनी मासूम हथेलियों को भींच लेती।
कुछ साल और गुज़रे। अवंतिका को रंग-बिरंगे परिधान, खिलखिलाकर हँसना और दोस्तों के साथ ठहाके लगाना पसंद था। मगर जैसे ही उसने किशोरावस्था में कदम रखा, सुलोचना देवी ने उसकी हँसी पर भी पहरा लगा दिया। “लड़कियों की हँसी घर की चारदीवारी से बाहर नहीं जानी चाहिए अवंतिका। तुम्हारी चाल में शालीनता और कपड़ों में ऐसा सादगी भरा पर्दा होना चाहिए कि कोई तुम्हें घूर न सके।” अवंतिका ने अपनी उन्मुक्त हँसी को एक धीमे, दबे हुए संकोच में बदल लिया। मयंक चाहे जैसी भाषा बोले, चाहे जैसे कपड़े पहने, उसके लिए घर के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे। अवंतिका ने अपनी जीवंतता की जगह वह शालीनता ओढ़ ली, जो असल में एक बोझ थी।
घर में जब भी कोई मनपसंद चीज़ आती—चाहे वह ताज़े फल हों, बादाम का हलवा हो या कोई नई पत्रिका—अवंतिका से सहज भाव से कह दिया जाता, “मयंक बड़ा है, उसे बाहर जाकर नाम कमाना है, उसे ताकत चाहिए। तू तो पराया धन है, तुझे त्याग और ममता सीखनी चाहिए।” अवंतिका की थाली से सबसे अच्छा हिस्सा हमेशा मयंक की थाली में खिसका दिया जाता। अवंतिका ने अपनी पसंद-नापसंद को छुपाना शुरू कर दिया। उसने सीख लिया कि अपनी इच्छाओं को दबाकर दूसरों के चेहरे पर तृप्ति देखना ही एक ‘अच्छी लड़की’ का धर्म बताया जाता है। मयंक ने घर में अपनी मनमानी और अधिकार जमाना सीख लिया, जबकि अवंतिका ने माँ से त्याग, दया और चुपचाप सहने की असीम क्षमता ग्रहण कर ली।
हाईस्कूल की परीक्षा में अवंतिका ने पूरे जिले में टॉप किया था। जब अखबार में उसकी तस्वीर छपी, तो पूरा मोहल्ला बधाई देने आया। उसी दिन मयंक बमुश्किल तीसरे दर्जे में पास हुआ था। घर में मिठाई आई, लेकिन बधाई अवंतिका को कम और मयंक को तसल्ली ज़्यादा दी जा रही थी। अवंतिका की आँखों में बड़े सपने थे। वह खगोलशास्त्र पढ़ना चाहती थी, तारों और अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझाना चाहती थी। उसकी उड़ान आकाश को छूने की थी।
एक शाम उसने हिम्मत जुटाकर अपने पिता से कहा, “बाबूजी, मुझे आगे की पढ़ाई के लिए इंदौर के बड़े कॉलेज में दाखिला लेना है। वहाँ एस्ट्रोफिजिक्स की बहुत अच्छी पढ़ाई होती है।”
विद्याधर जी ने चाय का घूँट भरा और बिना अवंतिका की तरफ देखे बोले, “लड़कियों को परदेस भेजकर पढ़ाने का हमारे खानदान में कोई रिवाज़ नहीं है। शहर के ही किसी सामान्य कॉलेज से प्राइवेट बीए का फॉर्म भर दो। वैसे भी दो साल बाद तुम्हारी शादी करनी है। मयंक को हम बाहर भेज रहे हैं, वह इंजीनियरिंग की कोचिंग करेगा।”
अवंतिका के भीतर का पूरा आसमान उस पल ज़मींदोज़ हो गया। उसने रोते हुए अपनी माँ का पल्लू पकड़ा, “माँ, मैंने मेहनत की है। मैं कुछ बनकर दिखाना चाहती हूँ।”
सुलोचना देवी ने उसकी आँखों के आँसू पोंछते हुए कहा, “पगली, लड़कियों की असली उड़ान उनका ससुराल होती है। पिता के घर में मर्यादा और पति के घर में समर्पण—यही एक स्त्री का भाग्य है। अपने भाई का रास्ता मत रोक, उसे आगे बढ़ने दे।”
उस रात अवंतिका अपनी छत पर अकेली खड़ी रही। आसमान में चमकते तारों को देखकर उसने अपनी उड़ने की चाहत को हमेशा के लिए अपने सीने में दफन कर लिया। अगले ही दिन उसके पैरों में घुंघरुओं वाली भारी चांदी की पायलें पहना दी गईं। वे पायलें दिखने में सुंदर थीं, लेकिन वास्तव में वे मर्यादा और बंधनों की ऐसी ज़ंजीरें थीं, जो उसके हर कदम पर बजती थीं ताकि घर के बड़ों को हमेशा पता रहे कि वह कहाँ जा रही है।
मयंक को आज़ादी का खुला आकाश मिला। वह इंदौर गया, मनमानी करने लगा, पढ़ाई की जगह दोस्तों के साथ फिजूलखर्ची करने लगा। घर से पैसे पर पैसे भेजे जाते रहे, क्योंकि वह ‘कुल का दीपक’ था। दूसरी तरफ अवंतिका घर के चूल्हे-चौके में अपनी ज़िंदगी की धूप-छांव बिताती रही। उसने घर की पुरानी खिड़कियों से बाहर झांकना भी छोड़ दिया था। जो लड़की कभी सुबह की पहली किरण के साथ दौड़ लगाने का सपना देखती थी, वह अब कमरे के अंधेरे में बैठकर स्वेटर बुनने और खामोश रहने से प्यार करने लगी थी। उसने अपनी निडरता, अपनी उन्मुक्तता, अपनी महत्वाकांक्षा और अपने हिस्से का उजाला अपने भाई को दान कर दिया था और खुद संस्कारों के मंदिर में स्थापित एक निर्जीव, पूज्य मूरत बन चुकी थी, जिसकी पूजा तो सब करते थे, लेकिन जिसके दिल की धड़कन सुनने की फुर्सत किसी को नहीं थी।
समय अपनी गति से बहता रहा। अवंतिका बाईस वर्ष की हो चुकी थी। घर में उसकी शादी की बातें चलने लगीं। लेकिन तभी परिवार पर एक ऐसा वज्रपात हुआ जिसने चतुर्वेदी परिवार की बुनियाद हिलाकर रख दी।
मयंक, जिस पर परिवार ने अपनी सारी उम्मीदें, पैसा और प्रतिष्ठा न्यौछावर कर दी थी, वह गलत संगति में पड़ चुका था। उसने इंजीनियरिंग छोड़ दी थी और सट्टेबाजी व नशे के दलदल में ऐसा फंसा कि उस पर लाखों का कर्ज़ चढ़ गया। एक रात अचानक पुलिस की गाड़ी घर के दरवाजे पर आकर रुकी। पता चला कि मयंक एक बड़े वित्तीय फ्रॉड में शामिल था और कर्ज़दारों से बचने के लिए शहर छोड़कर कहीं भाग गया था।
विद्याधर जी की पगड़ी जैसे एक ही झटके में धूल में मिल गई। जिस खानदान की इज्जत पर वे नाज़ करते थे, वह मोहल्ले के चौराहे पर नीलाम हो रही थी। कर्ज़दार रोज़ दरवाजे पर आकर गालियाँ देते और पुलिस बार-बार पूछताछ के लिए आती। इस सदमे को विद्याधर जी का दिल बर्दाश्त नहीं कर पाया और उन्हें भीषण दिल का दौरा पड़ा। वे बिस्तर पर आ गए, उनके शरीर का दायाँ हिस्सा सुन्न हो गया।
घर में जो भी जमा-पूंजी थी, वह मयंक के कर्ज़ों को चुकाने और विद्याधर जी के अस्पताल के बिलों में स्वाहा हो गई। रिश्तेदार, जो कभी खानदान की दुहाई देते थे, एक-एक करके किनारा कर गए। सुलोचना देवी मंदिर के सामने बैठकर दिन-रात रोती रहतीं। जिस घर में कल तक मर्यादा और संस्कारों के नाम पर बेटी की साँसों को नाप-तोल कर खर्च किया जाता था, आज उसी घर में दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए थे।
उस रात घर में अन्न का एक दाना नहीं था। पिता बिस्तर पर पड़े कराह रहे थे और माँ की आँखों से आँसू सूख चुके थे। कमरे में पसरे उस घने सन्नाटे और अंधेरे में अवंतिका चुपचाप बैठी थी। उसने अपनी कलाई में बंधी घड़ी देखी। फिर उसने अपने पैरों की तरफ देखा। उसने अपने हाथों से उन चांदी की भारी पायलों को खोला, जो बरसों से उसके पैरों में बेड़ियों की तरह बंधी थीं। उसने उन पायलों को एक कपड़े में लपेटा।
उसने अपनी माँ के पास जाकर कहा, “माँ, उठो। रोने से चूल्हा नहीं जलेगा और न ही बाबूजी की दवा आएगी।”
सुलोचना देवी ने असहाय होकर देखा, “बेटी, सब खत्म हो गया। मयंक ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। अब इस घर में कोई मर्द नहीं बचा जो हमारा सहारा बने। हम बर्बाद हो गए।”
अवंतिका ने पहली बार अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर सीधे देखा। उसकी आवाज़ में बरसों बाद वही पुरानी, खोई हुई निडरता गूँज उठी, “माँ, किसी घर का सहारा सिर्फ बेटा ही हो, यह प्रकृति का नियम नहीं है, यह इस समाज का बनाया हुआ भ्रम है। अगर आप लोगों ने मुझे हमेशा यह न सिखाया होता कि मैं कमज़ोर हूँ, तो आज आपको इस बेबसी का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन अब बहुत हुआ। अगर मयंक अपनी आज़ादी और अधिकारों का मान नहीं रख सका, तो मैं अपने छीने गए अधिकारों को वापस लेकर दिखाऊंगी।”
अवंतिका अगली सुबह घर से बाहर निकली। उसके पैरों में आज कोई छन-छन करती पायल नहीं थी, बल्कि उसके कदमों में एक दृढ़ संकल्प की गूँज थी। उसने बाज़ार जाकर अपनी वे चांदी की पायलें बेचीं। उन पैसों से उसने पिता की आवश्यक दवाइयाँ खरीदीं और घर के लिए एक महीने का राशन लिया।
लेकिन वह जानती थी कि यह सिर्फ कुछ दिनों का सहारा था। उसे एक स्थायी हल चाहिए था। उसने अपनी पुरानी किताबों को अलमारी से निकाला, जिन पर धूल जम चुकी थी। उसने शहर के एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में गणित और विज्ञान के शिक्षक पद के लिए आवेदन किया। जब वह इंटरव्यू के लिए पहुँची, तो पैनल ने उसके लंबे गैप पर सवाल उठाए।
अवंतिका ने बिना हिचकिचाए, आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया, “सर, मेरी पढ़ाई में गैप मेरी योग्यता की कमी के कारण नहीं, बल्कि पारिवारिक परिस्थितियों और सामाजिक बंधनों के कारण आया था। लेकिन मैंने इन सालों में घर पर रहकर अपनी पढ़ाई को कभी मरने नहीं दिया। आप मेरी एक कक्षा लेकर देख लीजिए, यदि आपको लगे कि मैं किसी भी नियमित डिग्रीधारी से कमतर हूँ, तो मुझे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दीजिएगा।”
प्रिंसिपल उसकी बेबाक सच्चाई और आँखों में जलती आग से प्रभावित हुए। उन्होंने उसका डेमो क्लास लिया। अवंतिका ने ब्लैकबोर्ड पर चॉक उठाया और जब उसने भौतिकी के सिद्धांतों को समझाना शुरू किया, तो पूरी क्लास मंत्रमुग्ध हो गई। उसे उसी दिन स्कूल में सीनियर कक्षाओं के लिए शिक्षिका की नौकरी मिल गई।
यह अवंतिका के एक नए जीवन की शुरुआत थी। सुबह वह स्कूल में पढ़ाती, दोपहर को घर आकर पिता की सेवा करती, उनकी फिजियोथेरेपी करवाती और शाम को अपने ही घर के आँगन में मोहल्ले के गरीब और मेधावी बच्चों को कोचिंग देना शुरू करती।
शुरुआत में मोहल्ले के कुछ संकीर्ण सोच वाले लोगों ने ताने कसे कि “चतुर्वेदी जी की बेटी अब बाहर काम कर रही है, पराए मर्दों से मिलती है, खानदान की मर्यादा कहाँ गई?” लेकिन अवंतिका ने उन तानों को अपने कानों के पार भी नहीं जाने दिया। उसने उस समाज की परवाह करना छोड़ दिया था, जिसने विपत्ति के समय उनकी तरफ पीठ फेर ली थी।
अवंतिका की मेहनत रंग लाने लगी। उसके पढ़ाए हुए बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने लगे। धीरे-धीरे उसकी कोचिंग का नाम पूरे शहर में फैल गया। उसके पास पढ़ने के लिए दूर-दूर से छात्र आने लगे। उसकी आमदनी बढ़ी, तो उसने न केवल अपने पिता का बेहतरीन इलाज करवाया, बल्कि मयंक द्वारा छोड़े गए बाकी बचे कर्ज़ों को भी पाई-पाई करके अपने स्वाभिमान के दम पर चुका दिया।
दो साल बीत गए। अवंतिका के अथक प्रयासों से विद्याधर जी अब लाठी के सहारे चलने लगे थे। घर की छत की मरम्मत हो चुकी थी, दीवारों पर नया रंग-रोगन था और घर में सम्मान की एक नई खुशबू तैर रही थी।
एक दिन शाम के समय, डाकिए ने एक सरकारी लिफाफा लाकर अवंतिका के हाथों में दिया। अवंतिका ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसने नौकरी के साथ-साथ राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी थी। उस लिफाफे में उसका चयन पत्र था—अवंतिका ने पूरे राज्य में पाँचवाँ स्थान हासिल किया था और वह महिला एवं बाल विकास विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी के पद पर नियुक्त हुई थी।
अवंतिका की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन ये आँसू किसी बेबसी या दर्द के नहीं थे, बल्कि अपनी खोई हुई आत्मा को फिर से पा लेने के गर्व के थे। वह उस पत्र को लेकर सीधे अपने पिता के कमरे में गई।
विद्याधर जी खिड़की के पास बैठे रामायण का पाठ कर रहे थे। अवंतिका ने जाकर वह नियुक्ति पत्र अपने पिता के चरणों में रख दिया और झुककर उनके पैर छुए।
विद्याधर जी ने कांपते हाथों से वह पत्र उठाया। जब उन्होंने अपनी बेटी का नाम राज्य के शीर्ष अधिकारियों की सूची में देखा, तो उनका बूढ़ा शरीर थरथराने लगा। उन्होंने अपनी लाठी एक तरफ रख दी और अपनी बेटी के सिर पर दोनों हाथ रख दिए। उनकी आँखों से पछतावे और पश्चाताप के आँसू बहकर अवंतिका के बालों में गिरने लगे।
“अवंतिका…” विद्याधर जी की आवाज़ भर्रा गई। “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने पूरी ज़िंदगी एक पत्थर को तराशने में लगा दी, यह सोचकर कि वह हीरा बनेगा और मेरे बुढ़ापे का सहारा होगा। और जो साक्षात पारसमणि मेरे घर में थी, उसे मैंने हमेशा यह कहकर दबाए रखा कि वह एक लड़की है, उसे त्याग करना चाहिए, उसे अंधेरे में रहना चाहिए। आज अगर यह घर ज़िंदा है, मेरी सांसें चल रही हैं और समाज में मेरा सिर ऊँचा है, तो वह सिर्फ और सिर्फ तेरी वजह से है।”
सुलोचना देवी भी कमरे में आ गईं और उन्होंने अपनी बेटी को गले से लगा लिया।
अवंतिका ने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए बहुत ही सौम्यता से कहा, “बाबूजी, आपको माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है। आपने मुझे जो संस्कार दिए थे, मैं उनके खिलाफ कभी नहीं थी। लेकिन मुझे यह समझ आ गया कि त्याग का अर्थ खुद को मिटा देना नहीं होता। अगर कोई स्त्री अपने हिस्से का उजाला किसी और को दे दे और खुद अंधेरे में बैठ जाए, तो वह संस्कार नहीं, बल्कि एक अन्याय है। ईश्वर ने बेटों और बेटियों दोनों को दो पंख दिए हैं, ताकि वे मिलकर इस संसार के आकाश में उड़ सकें। एक के पंख काटकर दूसरे को दोहरा आकाश देने से कभी किसी परिवार का भला नहीं हो सकता।”
उस दिन घर में एक बार फिर मिठाई बंटी, लेकिन इस बार वह मिठाई किसी बेटे के खोखले वादों की नहीं, बल्कि एक बेटी के आत्मसम्मान, संघर्ष और विजय की थी। अवंतिका ने उस शाम अपनी छत पर जाकर ताज़ी हवा में गहरी साँस ली। उसने महसूस किया कि अब वह किसी मंदिर में स्थापित पत्थर की बेजान मूरत नहीं थी, जिसे अपनी रक्षा के लिए किसी और के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़े। वह एक जीती-जागती, स्वतंत्र और सशक्त इंसान थी, जिसने अपनी बेड़ियों को पिघलाकर अपनी प्रगति की सीढ़ी बना लिया था।
क्या आज भी हमारे समाज में अनजाने ही सही, बेटियों से हर कदम पर अपने सपनों की कुर्बानी देने की उम्मीद की जाती है जबकि बेटों की गलतियों को भी नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है? क्या एक बेटी को सिर्फ इसलिए झुकना चाहिए क्योंकि वह ‘संस्कार’ की मूरत है? अपनी सोच और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में बेझिझक साझा करें।
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लेखिका : शारदा सक्सेना