स्वाभिमान मेरा भी – गीता अस्थाना

पुरुष विहीना नारी का समाज में जीना मुश्किल सा हो जाता है। खास तौर पर तब जब वह साधारण मध्यम वर्ग से होती है। इज़्जत, मान सम्मान, प्रशंसा, निंदा इन सबका बोझ मध्यम वर्ग के कंधे या सिर पर रहता है। दूसरे शब्दों में मध्यम वर्ग इन्हीं मकड़जालों में फंसा रहता है। न वह ऊपर … Read more

विश्वास की डोर

सुमित्रा ताई ने बीच में ही बात काटते हुए चीखकर कहा, “चुप कर बेशर्म! एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी। अगर तू उसे घास नहीं डालती तो वो तेरे पीछे क्यों पड़ता? तालियां कभी एक हाथ से नहीं बजतीं मीना। कुछ तो इसने भी इशारा किया होगा, तभी तो उस लड़के की इतनी हिम्मत हुई। … Read more

नया आँगन, वही ममता

 राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं। और जब … Read more

दो आंगनों की धूप

स्वाति की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को होठों की मुस्कान से ढक लिया। वो एक झूठे, प्यार भरे गुस्से के अंदाज में बोली, “पापा! आप भी ना, हमेशा शिकायत करते रहते हैं। अरे, इसमें मेरी क्या गलती है? आप ही लोगों ने तो बचपन से कूट-कूट कर इतने अच्छे संस्कार दिए … Read more

देहरी की सूनी आस

 रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा … Read more

एक झूठा कलंक

 “साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं … Read more

कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी

कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है … Read more

रिश्तों की छाँव: जब आंगन सूना हो गया

 अम्मा जी कभी निहारिका के सामने उसकी तारीफ नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि ज्यादा तारीफ करने से बहू सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए वह अक्सर कमियां ही निकालती थीं—”सब्जी में नमक थोड़ा कम है”, “कपड़े ठीक से तह नहीं किए”। लेकिन निहारिका को उनकी असलियत तब पता चली, जब एक दिन वह बाज़ार … Read more

उम्र की दहलीज और बचपन का हाथ

कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को … Read more

ज़िंदगी की दूसरी सुबह

सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ, बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी … Read more

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