मैली चादर का उजास

 आईने के सामने खड़ी मंदाकिनी अपनी कजरारी आँखों में सलीके से सुरमा लगा रही थी। उसके अधरों पर एक सहज और सच्ची मुस्कान थिरक रही थी, जो शायद उसने कई बरसों से खुद के चेहरे पर नहीं देखी थी। उसने गहरे हरे रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसके किनारों पर सुनहरी गोटेदार किनारी लगी थी। यह वही साड़ी थी जो किसी ने उसके लिए बड़े मान से खरीदी थी। अपने लंबे, घुंघराले बालों का जूड़ा बनाकर उसने उसमें ताजे मोगरे का गजरा गूंथ लिया। उसकी महक पूरे कमरे में फैल गई। कानों में झुमके और माथे पर लाल कुमकुम की बिंदी लगाते हुए वह किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी गरिमामयी लग रही थी। आज उसे ‘मालिक’ ने बुलाया था।

मंदाकिनी उन्हें मन ही मन ‘मालिक’ कहती थी, हालांकि उनका असली नाम शांतनु था। शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी, संभ्रांत कुल के इकलौते वारिस। जब वह पहली बार मंदाकिनी के कोठे पर आए थे, तो उस रात का मंजर आज भी मंदाकिनी के जेहन में किसी ताजे जख्म की तरह दर्ज था। उस रात मूसलाधार बारिश हो रही थी। शांतनु लड़खड़ाते कदमों से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आए थे। उनके कपड़े भीगे हुए थे, बाल बिखरे थे और आँखों में शराब से ज्यादा एक गहरा, असहनीय दर्द तैर रहा था।

जिस्म के उस बाजार में जहां हर कोई हवस की प्यास बुझाने, अपनी मर्दानगी का खोखला प्रदर्शन करने या रंगीन शाम गुजारने आता था, वहां शांतनु कमरे के एक कोने में सिर पकड़कर बैठ गए थे। जब मंदाकिनी ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ उनके कंधे पर हाथ रखा, तो शांतनु ने धीरे से उसका हाथ हटा दिया था और उनकी रुंधे हुए गले से आवाज निकली थी—”क्या तुम्हारे इस बाजार में कोई ऐसी दवा मिलती है जो उस इंसान की याद मिटा दे, जिसके लिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी थी?”

मंदाकिनी चौंक गई थी। उस अंधेरी दुनिया में जिस्म की नुमाइश होती थी, मगर रूह के जख्म लेकर शायद ही कोई चौखट पर आता था। बाद में बातों-बातों में शांतनु का दर्द छलक पड़ा था। शांतनु ने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर अपनी पसंद की लड़की से प्रेम विवाह किया था। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन शादी के महज एक साल बाद ही उनकी पत्नी परिवार की तमाम दौलत, गहने समेटकर अपने पुराने प्रेमी के साथ फरार हो गई थी। इस धोखे ने शांतनु के स्वाभिमान, उसके विश्वास और उसकी आत्मा को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। समाज के ताने और अपनों की तीखी नजरों से भागते हुए वह खुद को तबाह करने के इरादे से इस बदनाम गली में आ पहुंचे थे।

उस रात मंदाकिनी ने कोई नृत्यांगना बनकर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील स्त्री बनकर उनका सहारा लिया था। उसने शांतनु को समझाया था, उनके आंसू पोंछे थे और उन्हें हौसला दिया था। शांतनु को समझ आया कि दुनिया जिसे दलदल कहती है, उस दलदल में भी एक पवित्र और दयालु हृदय धड़क सकता है। उस रात के बाद शांतनु जब भी आते, वे सिर्फ बातें करते। मंदाकिनी उनके टूटे मन को अपनी ममता और अपनत्व से सींचती रही। धीरे-धीरे शांतनु की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी। उनका कारोबार फिर से संभल गया और उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। इस प्रक्रिया में कब मंदाकिनी का दिल शांतनु के लिए धड़कने लगा, उसे खुद भी पता नहीं चला। वह जानती थी कि समाज की नजर में उसका कोई वजूद नहीं है, लेकिन प्यार तो किसी कायदे-कानून का मोहताज नहीं होता।

आज शांतनु ने शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपने पुराने बगीचे वाले बंगले पर मंदाकिनी को मिलने के लिए बुलाया था। उन्होंने फोन पर कहा था कि वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला मंदाकिनी के साथ साझा करना चाहते हैं। इसी उम्मीद और खुशी में मंदाकिनी ने खुद को इतने जतन से सजाया था।

शाम का धुंधलका धीरे-धीरे गहराने लगा था जब मंदाकिनी मुख्य सड़क छोड़कर बंगले की तरफ जाने वाले सुनसान कच्चे रास्ते पर मुड़ी। दोनों तरफ घने पेड़ और झाड़ियां थीं। दूर-दूर तक कोई रोशनी या आबादी नहीं थी। मंदाकिनी अपनी ही धुन में, पायल की हल्की रुनझुन के साथ चली जा रही थी। उसे किसी बात का खौफ नहीं था, क्योंकि जिसने जिंदगी की सबसे बदसूरत सच्चाइयों को करीब से देखा हो, उसे अंधेरे से डर नहीं लगता।

तभी, हवा के झोंके के साथ एक दबी हुई सिसकी उसके कानों में पड़ी। मंदाकिनी के कदम ठिठक गए। उसने कान लगाकर सुना। सन्नाटे को चीरती हुई किसी बच्ची के रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज आ रही थी—”प्लीज भैया… छोड़ दो… मुझे घर जाने दो…”

साथ ही कुछ युवकों की भद्दी और डरावनी हंसी गूंजी। मंदाकिनी का कलेजा कांप उठा। उसने बिना एक पल गंवाए झाड़ियों की ओर कदम बढ़ा दिए। झाड़ियों के झुरमुट के पीछे एक वीरान खंडहर था। वहां मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में मंदाकिनी ने जो देखा, उसने उसके पूरे अस्तित्व को हिलाकर रख दिया। तीन हट्टे-कट्टे लड़के स्कूल की यूनिफॉर्म पहने करीब बारह-तेरह साल की एक मासूम बच्ची को जमीन पर पटके हुए थे। बच्ची के कपड़े फटे हुए थे और वह रहम की भीख मांग रही थी।

मंदाकिनी के सामने चंद सेकंड के भीतर उसका अपना अतीत कौंध गया। बरसों पहले जब वह खुद एक मासूम बच्ची थी, तब ऐसे ही कुछ दरिंदों ने उसकी अस्मत लूटी थी और फिर उसे उस बदनाम दलदल में बेच दिया था। उस वक्त कोई उसकी चीख सुनने वाला नहीं था, कोई उसकी ढाल बनने नहीं आया था। उस पुरानी टीस, बेबसी और आज के मंजर ने मिलकर मंदाकिनी के भीतर एक ज्वाला भड़का दी। उसकी आँखों में बेबसी की जगह साक्षात चंडी का रौद्र रूप उतर आया।

वह पूरी ताकत से चीख पड़ी—”अरे नामर्दों! जानवरों की औलादों! छोड़ो उस बच्ची को!”

उसकी गूंजती आवाज सुनकर तीनों लड़के चौंककर पीछे हटे। उन्होंने मुड़कर देखा तो गहनों और रेशमी साड़ी में सजी एक अकेली औरत खड़ी थी। एक लड़के ने हिकारत से हंसते हुए कहा, “अरे वाह! शिकार एक ढूंढने निकले थे, यहां तो पूरी दावत खुद चलकर आ गई। क्यों री, तुझे भी बहुत शौक चढ़ा है क्या?”

मंदाकिनी बिना एक कदम पीछे हटाए, शेरनी की तरह उनकी तरफ बढ़ी। उसने जमीन पर पड़ा एक भारी-भरकम सूखा डंडा उठाया और बिना किसी डर के उन दरिंदों के सामने तान दिया। उसकी आवाज में ऐसा खौफनाक आक्रोश था कि जंगल का सन्नाटा भी थर्रा उठा।

“अगर अपनी मां का दूध पिया है तो एक कदम आगे बढ़ाकर दिखाओ! यह बच्ची तो बहुत दूर की बात है, तुम तीनों में से किसी ने अगर इसकी तरफ देखा भी, तो तुम्हारी आंखें निकाल लूंगी। मैं कोई अबला नहीं हूँ, जिंदगी के हर नर्क को झेलकर यहां तक पहुंची हूँ। चीर कर रख दूंगी तुम तीनों को!” मंदाकिनी की आंखों में मौत का ऐसा बेखौफ सन्नाटा और गुस्सा था कि वे तीनों सहम गए।

मंदाकिनी ने हाथ का डंडा पूरी ताकत से एक लड़के के घुटने पर दे मारा। वह चीखता हुआ वहीं गिर पड़ा। बाकी दोनों लड़कों ने समझ लिया कि यह औरत जान लेने और देने दोनों पर आमादा है। पकड़े जाने और पुलिस के डर से वे दोनों अपने घायल साथी को घसीटते हुए अंधेरे में भाग खड़े हुए।

दरिंदों के जाते ही मंदाकिनी ने हाथ से डंडा फेंका और दौड़कर उस मासूम बच्ची के पास बैठ गई। बच्ची थर-थर कांप रही थी और सदमे से उसकी आवाज हलक में अटक गई थी। मंदाकिनी ने बिना एक पल गंवाए अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू खोला और उस नन्ही बच्ची को अपने सीने से पूरी तरह ढक लिया। बच्ची मंदाकिनी के आंचल में अपना चेहरा छिपाकर दहाड़ें मारकर रोने लगी। मंदाकिनी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “शांत हो जा मेरी बच्ची… अब कोई नहीं है यहां। तेरी मां आ गई है, अब तुझे कोई छू भी नहीं सकता।”

काफी देर तक वह बच्ची को सहलाती रही, जब तक कि उसकी हिचकियां थम नहीं गईं। जब बच्ची थोड़ी सामान्य हुई, तो मंदाकिनी ने बड़े दुलार से उसका नाम और घर का पता पूछा।

बच्ची ने रोते-रोते कहा, “मेरा नाम सलोनी है… मेरे पापा का नाम शांतनु है… वो बंगले पर मेरा इंतजार कर रहे होंगे। मैं ट्यूशन से लौट रही थी, साइकिल खराब हो गई तो पैदल आ रही थी…”

सलोनी का नाम सुनते ही मंदाकिनी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। शांतनु की बेटी! शांतनु ने अक्सर अपनी बातों में जिक्र किया था कि उनकी पहली शादी से एक नन्ही बेटी है, जिसे वह दुनिया की हर बुरी नजर से बचाकर पाल रहे हैं। पत्नी के जाने के बाद शांतनु के जीने की एकमात्र वजह वही बच्ची थी। नियति का यह कैसा खेल था! जिस इंसान ने मंदाकिनी के आंसुओं को सहारा दिया था, आज उसी इंसान की पूरी दुनिया उजड़ने से मंदाकिनी ने बचा ली थी।

मंदाकिनी ने सलोनी के बिखरे बालों को संवारा, अपने गजरे से गिरे फूलों को उसके आंचल से हटाया और उसे सहारा देकर अपने साथ शांतनु के बंगले की ओर चल पड़ी।

बंगले के मुख्य द्वार पर शांतनु बेहद बेचैनी से टहल रहे थे। रात काफी हो चुकी थी और सलोनी अभी तक घर नहीं लौटी थी। उनका दिल किसी अनहोनी की आशंका से घबरा रहा था। तभी गेट खुला। सामने का दृश्य देखकर शांतनु के होश उड़ गए। मंदाकिनी की साड़ी पर मिट्टी लगी थी, उसके बाल अस्त-व्यस्त थे और उसके सहारे से लगकर उनकी बेटी सलोनी आ रही थी, जिसके कपड़ों की हालत देखकर शांतनु समझ गए कि क्या हुआ होगा।

“सलोनी!” शांतनु पागलों की तरह दौड़े और अपनी बच्ची को गले से लगा लिया। सलोनी फूट-फूट कर रोने लगी और उसने अपने पिता को टूटी-फूटी आवाज में जंगल की पूरी दास्तान सुनाई कि कैसे इन आंटी ने अपनी जान की परवाह किए बिना उन शैतानों से लड़कर उसे बचाया।

शांतनु की आंखों से अविरल आंसू बहने लगे। वह सलोनी को लेकर अंदर आए, उसे पानी पिलाया और जब बच्ची कमरे में सो गई, तब वह बाहर हॉल में आए जहां मंदाकिनी चुपचाप खड़ी थी।

शांतनु मंदाकिनी के सामने आए और अचानक उनके हाथ जुड़ गए। उनकी आंखों में कृतज्ञता का ऐसा समंदर था जो बयां नहीं किया जा सकता था। “मंदाकिनी… मैं… मेरे पास शब्द नहीं हैं। तुमने आज सिर्फ मेरी बच्ची की इज्जत और जान नहीं बचाई, तुमने मेरी सांसें बचा लीं। अगर सलोनी को कुछ हो जाता, तो मैं उसी पल मर जाता। मैं तुम्हारा यह कर्ज जिंदगी भर कैसे चुकाऊंगा?”

मंदाकिनी ने नम आंखों से मुस्कुराते हुए कहा, “मालिक, कर्ज कैसा? जब आप पहली बार मेरे पास आए थे, आपने मुझे एक इंसान समझा था। उस दलदल में मुझे किसी ने सम्मान नहीं दिया, लेकिन आपने मुझे वह आदर दिया जिसकी मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आज अगर मैं इस बच्ची के काम आ सकी, तो मुझे लगता है कि ईश्वर ने मेरे पिछले सारे पाप धो दिए। एक औरत के लिए किसी बच्ची की आबरू बचाना कोई अहसान नहीं, उसका फर्ज होता है।”

शांतनु ने मंदाकिनी को सिर से पांव तक देखा। उसके गहने टेढ़े हो चुके थे, मोगरे का गजरा बिखर चुका था, कपड़े मैले थे, लेकिन उस मैले लिबास के भीतर जो आत्मा थी, वह गंगा के जल से भी ज्यादा पवित्र थी। समाज जिसे ‘अपवित्र’ और ‘बदनाम’ कहता था, उसने आज दुनिया के सबसे पवित्र रिश्ते यानी मातृत्व की लाज बचाई थी।

शांतनु कमरे के अंदर गए और हाथ में एक लाल रंग की चुनरी और सिंदूर की डिब्बी लेकर बाहर आए।

मंदाकिनी अचरज से उन्हें देखने लगी। शांतनु ने बहुत ही धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “मंदाकिनी, मैंने तुम्हें आज यहां इसलिए बुलाया था क्योंकि मैं अपनी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू करना चाहता था। मैं अपनी जिंदगी से उस तन्हाई को मिटाना चाहता था जिसने मुझे बरसों से घेरे रखा था। मैं तुम्हें इस बदनाम जिंदगी से निकालकर अपने घर की रानी बनाना चाहता था, लेकिन मेरे मन में एक डर था… समाज का डर, दुनिया की बातों का डर। लेकिन आज, जो कुछ तुमने किया, उसने मेरी आंखों से समाज के ढोंग का पर्दा हमेशा के लिए हटा दिया।”

शांतनु ने वह चुनरी मंदाकिनी के सिर पर रख दी और सिंदूर की डिब्बी उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “समाज चाहे जो कहे, लेकिन मेरी और सलोनी की नजर में तुम देवी हो। सलोनी को एक ऐसी मां की जरूरत है जो अपनी जान देकर भी उसकी हिफाजत कर सके, और मुझे एक ऐसे जीवनसाथी की जरूरत है जिसका दिल सोने जैसा खरा हो। क्या तुम इस टूटे हुए घर को अपना घर बनाओगी? क्या तुम सलोनी की मां और मेरी अर्धांगिनी बनोगी?”

मंदाकिनी की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। जिस औरत को कभी समाज ने ठुकरा दिया था, जिसे सिर्फ हवस का सामान समझा गया था, आज उसे एक भरे-पूरे परिवार में मां और पत्नी का सर्वोच्च सम्मान मिल रहा था। उसने कांपते हाथों से शांतनु की ओर देखा। उसकी बरसों की तपस्या, उसका दर्द, उसकी तड़प सब उस एक पल में विलीन हो गए।

उस रात के सन्नाटे में, उस सुनसान बंगले के आंगन में, प्रकृति साक्षी थी कि कैसे एक बदनाम चौखट से निकलकर एक नारी ने अपने अदम्य साहस और पवित्र संवेदना के बल पर अपने लिए एक नया और उज्ज्वल सवेरा रच लिया था।

नारी का सम्मान उसके अतीत या उसके हालात से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, उसकी ममता और उसके अदम्य साहस से तय होता है। सच्चा इंसान वही है जो समाज की बनाई झूठी दीवारों को तोड़कर किसी की रूह की अच्छाई को पहचान सके और उसे अपनाने का हौसला रखे।

क्या आपको लगता है कि समाज को आज भी किसी व्यक्ति के अतीत से ज्यादा उसके वर्तमान कर्मों और उसकी इंसानियत को महत्व देना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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 लेखिका : प्रियंका नाथ

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