खामोश दीवारें और सुलगते जज़्बात
“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर … Read more