सपनों की राख और गृहस्थी की बेड़ियाँ

“मैंने तो तुझे पहले ही आगाह किया था विकास! यह लड़की सिर्फ तेरे पैसों पर ऐश करना जानती है। पढ़ाई-लिखाई तो बस एक बहाना है काम से बचने का। अगर सच में इसने किताबें खोली होतीं, तो आज इसका यह हाल न होता। तू ही अपनी पत्नी के मोह में अंधा हो गया था। अब देख लिया न इसका नतीजा?”

यह कड़वे शब्द शकुंतला जी के थे, जो आज सुबह से ही पूरे घर में गूंज रहे थे। आज राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की परीक्षा का परिणाम आया था और हमेशा की तरह, मीरा का रोल नंबर उस सफल उम्मीदवारों की सूची में नहीं था। विकास, जो हमेशा मीरा का ढाल बनकर खड़ा रहता था, आज अपनी माँ के तानों के आगे चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था। और मीरा? वह रसोई के एक कोने में खड़ी, आंसुओं को अपनी आँखों में ही सुखाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

मीरा कोई साधारण लड़की नहीं थी। बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहने वाली मीरा का सपना एक बड़ा अधिकारी बनने का था। उसके पिता एक साधारण क्लर्क थे और घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उसे बड़े शहर में रखकर कोचिंग दिलवा सकें। फिर भी अपनी मेहनत के दम पर उसने ग्रेजुएशन में यूनिवर्सिटी टॉप किया था। वह आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन तभी उसके पिता को दिल का दौरा पड़ गया। घर में मीरा से छोटी एक और बहन थी। पिता को डर था कि अगर उन्हें कुछ हो गया तो उनकी बेटियों का क्या होगा। इसी घबराहट और सामाजिक दबाव में, उन्होंने मीरा का रिश्ता विकास से तय कर दिया। विकास एक अच्छी प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर था और परिवार भी खाते-पीते घर का था। पिता की बिगड़ती सेहत और उनके आंसुओं के आगे मीरा को अपने सपनों का गला घोंटना पड़ा और वह दुल्हन बनकर शकुंतला जी के घर आ गई।

शादी के शुरुआती दिन किसी भी आम नवविवाहिता की तरह गुजरे। लेकिन विकास एक बहुत ही समझदार और सुलझा हुआ जीवनसाथी था। एक दिन सफाई करते हुए विकास के हाथ मीरा की पुरानी डायरी लग गई, जिसमें उसने अपने अधिकारी बनने के सपनों और अपनी मजबूरियों को बहुत ही भावुक शब्दों में उकेरा था। विकास ने उसी दिन फैसला किया कि वह मीरा के सपनों को मरने नहीं देगा। रात को जब मीरा कमरे में आई, तो विकास ने उसके हाथ में पीसीएस परीक्षा का सिलेबस और कुछ नई किताबें थमा दीं। मीरा की आँखों में अविश्वास और खुशी के आंसू थे। विकास ने कहा था, “शादी का मतलब सपनों का अंत नहीं होता मीरा। तुम अपनी तैयारी शुरू करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

लेकिन यह बात शकुंतला जी को बिल्कुल रास नहीं आई। जिस दिन विकास ने अपनी माँ को यह बात बताई, शकुंतला जी ने बाहर से तो बड़ी मीठी मुस्कान के साथ कहा, “अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरी बहू अफसर बनेगी तो मेरा ही सीना चौड़ा होगा।” लेकिन अंदर ही अंदर उन्होंने ठान लिया था कि वह किसी भी कीमत पर मीरा को इस घर की दहलीज लांघकर कुर्सी तक नहीं पहुंचने देंगी। उनकी सोच पुरानी थी— ‘औरत का काम चूल्हा-चौका संभालना और बच्चे पैदा करना है, अगर यह अफसर बन गई तो बेटे को उंगलियों पर नचाएगी और मेरा रुतबा घर से खत्म हो जाएगा।’

यहाँ से शुरू हुआ शकुंतला जी का वह अदृश्य युद्ध, जिसे विकास कभी नहीं समझ पाया। मीरा ने अपनी पढ़ाई का एक रूटीन बनाया। उसने तय किया कि वह सुबह चार बजे उठकर पढ़ाई करेगी और फिर सात बजे से घर का काम शुरू करेगी। लेकिन शकुंतला जी कहाँ मानने वाली थीं। जैसे ही सुबह के चार बजते और मीरा की टेबल लैंप की रोशनी जलती, शकुंतला जी को खांसने का दौरा पड़ जाता। कभी उन्हें सीने में दर्द होता, तो कभी गर्म पानी की तलब लग जाती। मजबूरी में मीरा को अपनी किताबें छोड़कर उनके पास बैठना पड़ता, उनके पैर दबाने पड़ते और उनके लिए काढ़ा बनाना पड़ता। सात बजते-बजते वह इतनी थक जाती कि उसकी आँखों में नींद भरने लगती, लेकिन तब तक घर के बाकी लोगों के उठने का समय हो जाता था।

दिन के समय जब विकास ऑफिस चला जाता, तो शकुंतला जी जानबूझकर ऐसे काम निकालतीं जिनका कोई अंत न हो। “बहू, आज अचार के लिए आम काटने हैं,” “बहू, आज दीवाली की सफाई अभी से शुरू कर देते हैं, जा छज्जे का सारा सामान निकालकर धो दे,” “बहू, आज मेरी सहेलियां आ रही हैं, सबके लिए गाजर का हलवा और पकौड़े बना दे।”

मीरा एक काम खत्म करके जैसे ही किताब लेकर बैठती, शकुंतला जी तुरंत कोई दूसरा काम सौंप देतीं। अगर मीरा कभी कह भी देती, “माँ जी, अगले महीने मेरी परीक्षा है, मुझे थोड़ा रिवीज़न करना है,” तो शकुंतला जी तुरंत ताना मारतीं, “महारानी जी, तो क्या मैं बुढ़ापे में इस कमर दर्द के साथ झाड़ू-पोंछा करूँ? दो रोटी क्या खा ली इस घर की, खुद को कलेक्टर समझने लगी हो। हमने भी घर संभाले हैं, पर कभी ऐसा गुरूर नहीं किया।”

शाम को जब विकास घर लौटता, तो शकुंतला जी का रूप बिल्कुल बदल जाता। वे सोफे पर निढाल होकर लेट जातीं और विकास के आते ही कहतीं, “बेटा, आज तो मेरे जोड़ों में इतना दर्द है कि क्या बताऊँ। दिन भर सारा काम मैंने ही किया है। तेरी पत्नी तो बस कमरे में किताब खोलकर मोबाइल चलाती रहती है या सोती रहती है। मैंने तो कुछ कहा नहीं, सोचा पढ़ रही होगी। पर आज तो हद हो गई, दोपहर का खाना भी मैंने ही बनाया।”

विकास जो ऑफिस की थकान से वैसे ही चूर होता, यह सुनकर चिढ़ जाता। वह मीरा से कुछ कहता नहीं था, लेकिन उसके मन में यह बात घर करने लगी थी कि शायद मीरा पढ़ाई के नाम पर सिर्फ समय बर्बाद कर रही है। वह मीरा को समझाता, “मीरा, अगर तुमसे पढ़ाई नहीं हो रही है तो छोड़ दो। कम से कम माँ को तो आराम दो। वे बुजुर्ग हैं, दिन भर काम कैसे कर सकती हैं?”

मीरा चाहकर भी विकास को सच्चाई नहीं बता पाती थी। वह जानती थी कि विकास अपनी माँ से बहुत प्यार करता है और वह उसकी बातों पर यकीन नहीं करेगा। वह बस रो घूंट कर रह जाती।

समय बीतता गया। इस बीच विकास के छोटे भाई विक्रम की शादी हो गई और घर में छोटी बहू, रश्मि आ गई। मीरा को लगा कि अब शायद काम का बोझ थोड़ा कम होगा और उसे पढ़ाई के लिए समय मिल जाएगा। लेकिन शकुंतला जी की राजनीति यहाँ भी हावी रही। उन्होंने रश्मि को सिर पर चढ़ा लिया। “अरे, रश्मि तो अभी नई-नई आई है, उसे इस घर के तौर-तरीके कहाँ पता हैं। और फिर वो तो बहुत नाजुक है। सारा काम तू ही किया कर मीरा, वो तेरी मदद करवा दिया करेगी।” मदद के नाम पर रश्मि सिर्फ मटर छीलने या सलाद काटने का काम करती और बाकी सारा दिन टीवी देखती या फोन पर अपनी माँ से बातें करती। पूरा घर, रसोई, कपड़े, मेहमानों की खातिरदारी, सब कुछ मीरा के ही कंधों पर था।

परीक्षा का दिन करीब आ रहा था। मीरा रात-रात भर जागकर अपनी नींद से लड़ती और दिन भर घर के तानों से। परीक्षा से ठीक एक हफ्ते पहले शकुंतला जी ने घर में अखंड रामायण का पाठ रखवा दिया। पूरे तीन दिन तक घर में मेहमानों का तांता लगा रहा। हलवाई, टेंट वाले, रिश्तेदार—सबको संभालने की जिम्मेदारी मीरा पर थी। परीक्षा से एक रात पहले भी वह रात के दो बजे तक जूठे बर्तन साफ कर रही थी।

अगले दिन जब वह परीक्षा केंद्र में बैठी, तो उसकी आँखें नींद और थकान से जल रही थीं। उसका दिमाग सुन्न पड़ चुका था। जो सवाल उसे उंगलियों पर याद थे, वे भी उसे भूलने लगे थे। वह जानती थी कि उसका पेपर अच्छा नहीं हुआ है।

और आज, जब परिणाम आया, तो वही हुआ जिसका उसे डर था। वह कुछ नंबरों से चूक गई थी।

शकुंतला जी के ताने अभी भी जारी थे। “विकास, तूने इसके कोचिंग के नोट्स, फॉर्म और किताबों में कितने हजार रुपये फूंक दिए! इससे अच्छा तो वो पैसे रश्मि के लिए गहने बनवाने में लगा देता। मैंने तो पहले ही कहा था, इसके बस का कुछ नहीं है। इसे तो बस महारानियों की तरह हुक्म चलाना और कमरे में लेटे रहना पसंद है। आज के बाद इस घर में कोई किताब नहीं आएगी। बहुत हो गया इसका नाटक!”

विकास ने एक गहरी सांस ली। उसने मीरा की तरफ देखा, जिसकी आँखों से आंसू गालों पर फिसल रहे थे। विकास के चेहरे पर भी निराशा थी। वह भारी कदमों से मीरा के पास आया और बोला, “माँ सही कह रही है मीरा। शायद यह तुम्हारे बस की बात नहीं है। तुमने बहुत कोशिश की, मैंने भी बहुत सपोर्ट किया। लेकिन अब हमें सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए। तुम अब घर पर ध्यान दो। यह पढ़ाई-लिखाई अब बंद कर दो।”

विकास के यह शब्द मीरा के लिए शकुंतला जी के तानों से भी ज्यादा तीखे थे। जिस इंसान ने उसे सपने देखने की हिम्मत दी थी, आज वही उसका सपना तोड़ रहा था। उसे विकास से यह उम्मीद नहीं थी। वह यह नहीं समझ पा रहा था कि मीरा हारी नहीं है, उसे हराया गया है। उसे उस रेस में दौड़ाया गया था जिसके रास्ते में जानबूझकर कांटे बिछाए गए थे।

मीरा ने अपने आंसू पोंछे। उसने विकास की आँखों में देखा और बहुत ही शांत, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “विकास, मैं परीक्षा में इसलिए नहीं हारी क्योंकि मुझमें काबिलियत नहीं है। मैं इसलिए हारी हूँ क्योंकि मेरे पास वो समय और मानसिक शांति नहीं थी, जो इस परीक्षा के लिए जरूरी होती है। मैंने एक साथ दो युद्ध लड़े हैं—एक किताबों के साथ और एक इस घर की राजनीति के साथ। आप सिर्फ वो देखते हैं जो माँ जी आपको दिखाती हैं। कभी उस रसोई में आकर देखिए, जहाँ सुबह से रात तक मेरी जिंदगी खप जाती है।”

पहली बार मीरा ने इस तरह पलटकर जवाब दिया था। शकुंतला जी का मुंह खुला का खुला रह गया और विकास हैरान था।

मीरा ने अपनी किताबों को समेटा और उन्हें अलमारी में रखते हुए कहा, “मैं पढ़ाई नहीं छोड़ूंगी विकास। अगर मुझे इस घर में रहकर पढ़ने का हक नहीं है, तो मैं रात को अपनी नींद कुर्बान करके पढूंगी। लेकिन मैं अपने पिता का सपना और अपनी पहचान ऐसे ही किसी की साजिशों के आगे मरने नहीं दूंगी। इस बार मैं फेल हुई हूँ, अगली बार मैं उन सब लोगों को गलत साबित करूंगी, जिन्हें लगता है कि औरत सिर्फ बर्तन मांजने के लिए बनी है।”

मीरा के उन शब्दों में एक ऐसी आग थी, जिसने पूरे कमरे में सन्नाटा खींच दिया। शकुंतला जी के चेहरे का रंग उड़ चुका था और विकास के मन में सवालों का एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। उसे पहली बार महसूस हो रहा था कि शायद वह बहुत कुछ ऐसा था जिसे वह देख कर भी अनदेखा कर रहा था। मीरा ने आज हार कर भी अपने आत्मसम्मान की एक नई लड़ाई शुरू कर दी थी।

क्या आपको लगता है कि मीरा अपनी मंजिल तक पहुँच पाएगी? क्या विकास अपनी माँ की सच्चाई देख पाएगा? अपने विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।

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