“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया।
पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर से देखने वाला हर इंसान यही सोचता था कि यहाँ रहने वालों की ज़िंदगी किसी जन्नत से कम नहीं होगी। लॉन में खड़ी दो महँगी गाड़ियाँ, घर का शानदार इंटीरियर और समाज में उनका रसूख—सब कुछ एकदम परफेक्ट लगता था। समीर और अंजलि को लोग ‘आइडियल कपल’ कहते थे। लेकिन उस घर की चारदीवारी के भीतर का सच उन खूबसूरत पर्दों और महँगे झूमरों के पीछे कहीं सिसक रहा था। उस घर में हर सुख-सुविधा थी, सिवाय सुकून के।
समीर एक मल्टीनेशनल बैंक में वाइस प्रेसिडेंट था। उसका दिन सुबह सात बजे शुरू होता और रात के दस बजे तक मीटिंग्स, टारगेट्स और क्लाइंट्स के बीच उलझा रहता। वह इस मुकाम तक पहुँचने के लिए दिन-रात एक कर चुका था। उसका मानना था कि वह जो भी कर रहा है, अपने परिवार के एक सुरक्षित और शानदार भविष्य के लिए ही कर रहा है। जब वह थक-हारकर घर लौटता, तो उसकी बस एक ही चाहत होती थी—गर्मागर्म खाना और शांति।
दूसरी तरफ अंजलि थी, जो कभी अपने कॉलेज की गोल्ड मेडलिस्ट हुआ करती थी। साहित्य में उसकी गहरी रुचि थी और वह एक बेहतरीन लेखिका बनना चाहती थी। लेकिन शादी के बाद, और फिर उनके बेटे आरव के जन्म के बाद, अंजलि ने अपने सारे सपनों को एक संदूक में बंद करके रख दिया। उसने अपनी पूरी दुनिया समीर और आरव के इर्द-गिर्द समेट ली। सुबह उठकर समीर का टिफिन बनाने से लेकर, आरव को स्कूल भेजने, घर के नौकरों को संभालने और शाम को फिर से एक परफेक्ट पत्नी की तरह सज-धज कर समीर का इंतज़ार करने तक—अंजलि का पूरा दिन मशीन की तरह बीतता था।
शुरुआत में सब कुछ बहुत खूबसूरत था। समीर अंजलि के हर छोटे-छोटे काम की तारीफ करता था, लेकिन वक्त के साथ-साथ यह सब एक रूटीन बन गया। अंजलि की मेहनत समीर के लिए ‘फर्ज़’ बन गई और समीर की थकान अंजलि के लिए एक ‘बहाना’।
पिछले कुछ महीनों से उनके बीच की दूरियाँ इतनी बढ़ गई थीं कि अब वे दोनों एक-दूसरे से बात करने के बजाय सिर्फ काम की बातें करते थे। “बिल भर दिया?”, “आरव की फीस जमा हो गई?”, “आज खाने में क्या है?”—बस इन्हीं वाक्यों में उनकी पूरी गृहस्थी सिमट गई थी।
अंजलि के मन में एक अजीब सी टीस उठती थी। जब वह अपनी सहेलियों को उनके करियर में आगे बढ़ते देखती, तो उसे अपनी अधूरी ख्वाहिशें याद आ जातीं। उसने अपना करियर, अपनी पहचान सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी ताकि समीर बिना किसी फिक्र के अपने करियर पर फोकस कर सके। लेकिन क्या समीर को इस बात का ज़रा भी एहसास था? नहीं। समीर को लगता था कि अंजलि घर पर रहकर करती ही क्या है? नौकर-चाकर तो हैं, उसे तो बस आराम करना होता है।
यह सोच उस दिन एक बड़े तूफान में बदल गई, जब समीर के कुछ कलीग्स घर पर डिनर के लिए आने वाले थे। अंजलि सुबह से ही तैयारियों में लगी हुई थी। उसने खुद अपने हाथों से समीर की पसंद का मेन्यू तैयार किया था। घर को बहुत खूबसूरती से सजाया था। लेकिन शाम को जब समीर के दोस्त आए, तो बातों-बातों में एक दोस्त की पत्नी ने अंजलि से पूछ लिया, “अंजलि, तुम तो इतनी टैलेंटेड हो, तुमने कुछ काम क्यों नहीं शुरू किया? आज के ज़माने में सिर्फ हाउसवाइफ बनकर रहना कितना बोरिंग है ना?”
अंजलि के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ बात टाल दी, लेकिन उसकी नज़रें समीर पर टिक गईं, इस उम्मीद में कि शायद वह उसके बचाव में कुछ कहेगा। शायद वह कहेगा कि अंजलि की वजह से ही उसका घर स्वर्ग है। लेकिन समीर ने हँसते हुए कह दिया, “अरे, इसे तो आराम की आदत पड़ गई है। कहाँ धक्के खाएगी अब बाहर!”
वह एक वाक्य अंजलि के दिल में किसी खंजर की तरह उतर गया। पूरी शाम वह बस एक रोबोट की तरह मेहमानों की खातिरदारी करती रही। रात को जब मेहमान चले गए और घर में सन्नाटा छा गया, तो अंजलि की बर्दाश्त का बाँध टूट गया।
जब समीर बेडरूम में आया, तो अंजलि वहीं सोफे पर बैठी थी, उसकी आँखें लाल थीं।
“क्या हुआ? सब ठीक तो है? मेहमानों को खाना बहुत पसंद आया,” समीर ने कपड़े बदलते हुए सामान्य लहज़े में कहा।
“तुम्हें सच में लगता है कि मुझे आराम की आदत पड़ गई है, समीर?” अंजलि की आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।
समीर चौंका। उसने मुड़कर देखा और कहा, “ओह, तो तुम उस मज़ाक को पकड़ कर बैठ गई? यार, मैंने तो बस ऐसे ही कह दिया था। अब तुम इस बात का बतंगड़ मत बनाना। मैं बहुत थका हुआ हूँ।”
“तुम हमेशा थके होते हो समीर!” अंजलि अचानक अपनी जगह से खड़ी हो गई। “तुम्हारी थकान, तुम्हारी मीटिंग्स, तुम्हारा स्ट्रेस… क्या इस घर में सिर्फ तुम्हारी ही तकलीफें मायने रखती हैं? मैंने अपने सपने, अपनी पहचान सब कुछ छोड़कर इस घर को संभाला है, ताकि तुम आराम से अपनी ज़िंदगी जी सको। और तुम सबके सामने मेरी कीमत ऐसे लगाते हो?”
समीर का ईगो भी जाग उठा। “कौन सी कीमत? क्या कमी रखी है मैंने? जो चीज़ तुम सोचती हो, वह अगले दिन तुम्हारे कदमों में होती है। मैं सुबह से शाम तक गधों की तरह खटता हूँ, किसके लिए? तुम्हारे और आरव के लिए ही ना! तुम घर में एसी में बैठी रहती हो, नौकर तुम्हारे आगे-पीछे घूमते हैं, और तुम्हें लगता है कि तुमने कोई बहुत बड़ा बलिदान दे दिया है?”
“यही तो दिक्कत है समीर!” अंजलि के गालों पर आँसू फिसल पड़े। “तुम हर चीज़ को पैसों और सुविधाओं से तौलते हो। मुझे महँगे तोहफे नहीं चाहिए थे, मुझे सिर्फ तुम्हारा थोड़ा सा सम्मान और थोड़ा सा वक्त चाहिए था। तुमने मुझे एक इंसान से महज़ एक केयरटेकर बनाकर रख दिया है।”
“तो क्या करूँ मैं? नौकरी छोड़ दूँ? घर बैठ जाऊँ?” समीर चिल्लाया। “तुम औरतों को कभी खुश नहीं किया जा सकता। चाहे कितनी भी मेहनत कर लो, तुम्हें हमेशा शिकायत ही रहेगी। अगर तुम्हें यहाँ इतनी ही घुटन हो रही है, तो छोड़ दो ये सब!”
यह सुनते ही कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया। ‘छोड़ दो ये सब’—ये शब्द उस कमरे की हवा में किसी ज़हर की तरह घुल गए। अंजलि ने एक पल के लिए समीर को देखा। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी निराशा थी जो हर रिश्ते के अंत की शुरुआत होती है। उसने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप पलटी और कमरे से बाहर निकल गई।
उस रात अंजलि गेस्ट रूम में सोई और समीर अपने बेडरूम में। बाहर तेज़ हवाएँ चल रही थीं, लेकिन घर के अंदर का सन्नाटा उन हवाओं से कहीं ज़्यादा खौफनाक था। दोनों जानते थे कि आज कुछ ऐसा टूट गया था, जिसे शायद अब कभी जोड़ा नहीं जा सकेगा। अंजलि का स्वाभिमान उसे वापस जाने से रोक रहा था, और समीर का अहंकार उसे अपनी गलती मानने नहीं दे रहा था। रिश्ते की बुनियाद में पड़ी प्यार की ईंटें अब खिसक चुकी थीं, और उनकी जगह एक ठंडी, बेजान दीवार ने ले ली थी, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से खड़ा किया था।
क्या आपको लगता है कि इस मोड़ पर आकर उनके रिश्ते में कोई उम्मीद बची है? इस सवाल का जवाब आपको अपने अंदर ही ढूँढना होगा।
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