आँखों में तैरते आंसुओं को पल्लू के छोर से सख्ती से पोंछते हुए वंदना एकाएक अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। उसके चेहरे पर बरसों से जमी खामोशी की जगह एक ऐसी दृढ़ता थी, जिसे देख सामने खड़े दोनों लोग सहम गए। उसने अपनी आवाज़ को स्थिर और गंभीर रखते हुए सुमित की ओर देखा और दो टूक कहा, “सुमित, अब नेहा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। और यह जो नया पक्का मकान तुम देख रहे हो, यह मेरे पति आलोक के पसीने की एक-एक बूँद और मेरी दिन-रात की बचत से खड़ा हुआ है। तुम्हारे हिस्से का वह पुराना पैतृक खपरैल वाला घर सामने की गली में खाली पड़ा है। आज ही अपनी पत्नी को साथ लो और वहीं जाकर बसो। आगे से जो भी तमाशा करना हो, जो भी मनमानी करनी हो, अपनी चारदीवारी के भीतर करना। कान खोलकर सुन लो, आज के बाद मैं तुम्हारी किसी भी नादानी, अय्याशी या बदमाशी पर पर्दा डालने वाली नहीं हूँ। अब अगर तुमने कोई गलत कदम उठाया, तो मैं न तो समाज से बात छुपाऊँगी और न ही तुम्हें पुलिस की हवालात तक पहुंचाने में एक पल की भी देर करूँगी।”
वंदना के बदले हुए तेवर और यह कठोर रुख देखकर सुमित की बोलती बंद हो गई। पास ही खड़ी नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं। नेहा के मन में एक गहरा तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। अचानक आज जेठानी जी को क्या हो गया? जो दीदी कल तक उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरती थी, जिसने अपनी छांव में उसे हमेशा महफ़ूज़ रखा, वह आज इतनी बेरुखी से कैसे पेश आ सकती है? नेहा के होंठ कांपे, कुछ कहने की कोशिश की, मगर वंदना की आँखों में तैरती लालिमा देखकर वह चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।
सुमित अभी इस अप्रत्याशित झटके से संभल भी नहीं पाया था कि वंदना ने अपना रुख नेहा की ओर मोड़ा। उसकी नज़रें नेहा के आंसुओं से भीगी आँखों से टकराईं, “नेहा, तू अब कोई अबोध बच्ची नहीं है जिसे दुनियादारी सिखानी पड़े। एक गृहस्थी की डोर तेरे हाथ में है, और अपने पति को सही राह पर लाना तेरी जिम्मेदारी है। अपनी हर छोटी-बड़ी मुश्किल के लिए मुझे आगे कर देना और खुद कोने में बैठकर रोना बहुत आसान होता है। मुझ पर इल्ज़ाम लगाना आसान लगता है कि मैं कुछ नहीं कर रही, लेकिन अपने जायज़ हक के लिए, अपने सुहाग और अपने मान-सम्मान के लिए अपने पति की आँखों में आँखें डालकर कब लड़ेगी तू? मिलकर समझाइश से रहो या हक की लड़ाई लड़ो, लेकिन अब तुम दोनों को अपने दम पर जीना होगा। मेरी छत के नीचे अब तुम दोनों के लिए कोई जगह नहीं है।”
यह सुनते ही नेहा की आँखों से आंसू बह निकले। उसका गला भर आया। मन ही मन सोचने लगी, ‘हर मुश्किल में ढाल बनकर आगे आने वाली मेरी चचेरी दीदी आज इतनी निष्ठुर कैसे हो गई? पराया क्या और अपना क्या, हम तो एक ही खून हैं, बहनें हैं। मेरी इस शादी को अभी कुछ ही महीने तो हुए हैं। पति की हरकतों से जब दीदी अच्छी तरह वाकिफ हैं, तो मुझे इस दलदल में अकेला छोड़कर इस तरह घर से बेदखल कर देना कहाँ तक सही है?’
लेकिन वंदना का फैसला पत्थर की लकीर बन चुका था। उसने कमरे की तरफ कदम बढ़ाते हुए सपाट लहजे में कहा, “सुमित, कल सुबह सूरज निकलने से पहले तुम दोनों अपना सारा सामान समेटकर वहां चले जाना।” इतना कहकर उसने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और भीतर आकर खुद भी दीवार से टिककर बैठ गई, क्योंकि यह फैसला जितना कठोर बाहर दिख रहा था, अंदर से उसका दिल भी उतना ही छलनी था।
वंदना की शादी आज से ठीक आठ साल पहले आलोक के साथ हुई थी। आलोक दो भाई थे—आलोक और सुमित। शादी के महज दो साल बाद आलोक की मां गंभीर बीमारी की चपेट में आकर हमेशा के लिए आंखें मूंद गईं। पिता भी सांस की पुरानी बीमारी के चलते ज्यादा कामकाज करने में असमर्थ थे और चारपाई पर ही समय बिताते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति केवल थोड़ी-बहुत खेती और पैतृक ज़मीन पर टिकी थी। यही वजह थी कि घर का बड़ा बेटा होने के नाते आलोक को दसवीं के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी ताकि परिवार का पेट भर सके। लेकिन आलोक ने अपने छोटे भाई सुमित की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। उसने दिन-रात धूप-छांव देखे बिना पसीना बहाया और सुमित को कॉलेज से स्नातक की डिग्री दिलवाई।
आलोक बेहद ईमानदार, शांत और मेहनती स्वभाव का इंसान था। वंदना जैसी समझदार, सुशील और सुलझी हुई जीवनसंगिनी पाकर घर में मानों बरकत बरसने लगी थी। वंदना खुद स्नातक पास थी, उसने खाली बैठने की बजाय घर पर ही मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। उसकी इस छोटी सी आमदनी ने आलोक के कंधों का बोझ काफी हद तक हल्का कर दिया था। समय अपनी गति से बीतता रहा, घर में दो नन्हे बच्चों की किलकारियां गूंजने लगीं। पूरा परिवार खुशहाल नज़र आ रहा था।
पर कहते हैं न कि जब घर में सब कुछ सुचारू रूप से चलने लगे, तभी कोई अनचाहा ग्रहण लग जाता है। तीन साल पहले सुमित को कस्बे के मुख्य चौक पर बिजली और इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान की एक अच्छी दुकान खुलवा कर दी गई थी। दुकान की लोकेशन बढ़िया थी, बिक्री भी अच्छी होती थी, लेकिन सुमित की नीयत डोलने लगी थी। कॉलेज के पुराने आवारा दोस्तों की संगत में पड़कर उसे ताश के पत्तों, ऑनलाइन सट्टेबाजी और फिजूलखर्ची की लत लग गई। दुकान से जो भी कमाई होती, वह उसे अपने शौक में उड़ा देता, मगर घर के चूल्हे-चौके या पिता की दवाइयों के लिए उसने कभी एक रुपया निकालकर नहीं दिया।
आलोक और वंदना ने कभी उससे हिसाब-किताब नहीं मांगा। आलोक हमेशा यही कहता, “छोटा भाई है वंदना, अपनी कमाई से जो बचाता होगा, अपने भविष्य के लिए ही रख रहा होगा। एक ही तो भाई है, उससे क्या पाई-पाई का हिसाब लेना।” जब कभी वंदना प्यार से पूछती, “सुमित, कुछ पैसे घर के लिए या बैंक में डाले?” तो वह बड़े इत्मीनान से झूठ बोल देता, “भाभी, सब बैंक खाते में सुरक्षित हैं, जब कोई बड़ा काम आएगा, तो मैं ही आगे रहूँगा।”
लेकिन झूठ की उम्र बहुत लंबी नहीं होती। धीरे-धीरे कस्बे से उड़ती-उड़ती बातें घर की दहलीज तक पहुंचने लगीं। बात तब हद से बाहर हो गई जब एक दिन कस्बे के एक सम्मानित परिवार के लोग गुस्से में भरकर आलोक के दरवाजे पर आ धमके। उन्होंने सीधे पुलिस में जाने की धमकी देते हुए आरोप लगाया कि सुमित उनकी बेटी को गलत नीयत से परेशान कर रहा है और बाजार में उसके पीछे घूमता है। आलोक और वंदना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बरसों से कमाई गई खानदानी इज्जत एक पल में तार-तार होने की कगार पर थी।
आलोक ने हाथ जोड़कर, अपनी पगड़ी उनके कदमों में रखकर किसी तरह उस परिवार से माफी मांगी और मामले को थाने जाने से रोका। उस रात घर में बहुत मातम सा सन्नाटा था। आलोक ने सुमित को खूब डांटा-फटकारा, वंदना ने भी मां की तरह समझाया। सुमित ने कान पकड़कर कसम खाई कि वह दोबारा ऐसा कोई काम नहीं करेगा।
आलोक और वंदना ने बैठकर गहरी चिंता में विचार किया। आलोक ने हताश होकर कहा, “वंदना, लड़का हाथ से फिसलता जा रहा है। आवारागर्दी और गलत लत इंसान को बर्बाद कर देती है।”
तब वंदना के मन में एक विचार आया, “शायद इसके सिर पर गृहस्थी का बोझ नहीं है, इसीलिए यह बेपरवाह घूमता है। अगर इसकी शादी कर दी जाए, तो पत्नी के आने से जिम्मेदारी का एहसास होगा, घर में बंधेगा और यह बुरी संगत अपने आप छूट जाएगी।”
योग्य लड़की की तलाश शुरू हुई, तो वंदना का ध्यान अपनी ही चचेरी बहन नेहा पर गया। नेहा सीधी-सादी, घरेलू और शांत स्वभाव की लड़की थी। वंदना ने सोचा कि नेहा अपने ही परिवार की है, सुमित को भी जानती है और हमारे साथ रहकर दोनों का जीवन संवर जाएगा। वंदना ने अपने चाचा-चाची से बात की। चाचा-चाची ने भी सोचा कि आलोक जैसा सुलझा हुआ जेठ और वंदना जैसी देवी समान जेठानी जिस घर में हो, वहां उनकी बेटी राज करेगी। परिवार परखा हुआ था, इसलिए उन्होंने खुशी-खुशी नेहा का हाथ सुमित के हाथों में सौंप दिया।
धूमधाम से शादी हुई। नेहा दुल्हन बनकर घर आई। लेकिन जो उम्मीद वंदना ने बांधी थी, वह एक भ्रम साबित हुई। शादी की रस्में खत्म होते ही सुमित का रंग फिर से वही पुराना हो गया। वह दो-दो दिन तक दुकान बंद करके गायब रहता, जुए की महफिलों में रातें गुजारता और जब नेहा उससे कुछ पूछने की हिम्मत करती, तो वह उस पर बरस पड़ता।
नेहा रो-धोकर अपनी दीदी वंदना के पास आती और अपनी तकदीर का रोना रोती। वंदना हर बार सुमित को फटकारती, दोनों के बीच समझौता कराती और नेहा को दिलासा देती। लेकिन सुमित ने इसे अपनी ढाल बना लिया। उसे लगने लगा कि चाहे वह जो भी गुनाह करे, उसकी भाभी समाज में बदनामी के डर से सब संभाल लेगी, भाई आलोक कर्ज लेकर भी उसका नुकसान भर देगा और नेहा भी दीदी के भरोसे चुपचाप सहती रहेगी।
हद तो तब हो गई जब सुमित ने जुए का कर्ज चुकाने के लिए अपनी दुकान का सारा सामान औने-पौने दामों में बेच दिया और चुपके से नेहा के सोने के गहनों पर भी हाथ साफ कर दिया। जब नेहा को पता चला, तो वह रोते हुए वंदना के पास आई और चिल्लाने लगी, “दीदी, तुमने मेरी जिंदगी किस नरक में झोंक दी? तुम तो जानती थी कि यह इंसान कैसा है, फिर भी मुझे इस आग में धकेल दिया!”
उस दिन वंदना के भीतर का सारा धैर्य टूट गया। उसने महसूस किया कि उसकी जरूरत से ज्यादा ममता और हर गलती पर पर्दा डालने की आदत ने ही सुमित को इतना गैर-जिम्मेदार बना दिया है। और नेहा, जो खुद अपने पति को सुधारने या उससे अपने अधिकार मांगने के बजाय सिर्फ रोना और दूसरों को दोष देना जानती थी, वह भी कभी आत्मनिर्भर और मजबूत नहीं बन पाएगी। अगर आज कोई कठोर कदम नहीं उठाया गया, तो यह पूरा परिवार बर्बादी के गहरे गर्त में समा जाएगा। और उसी कड़वे सच के अहसास ने वंदना को वह कठोर रूप धारण करने पर विवश किया था, जिससे उस शाम घर की दीवारें भी कांप गई थीं।
अगली सुबह, जैसा कि वंदना ने कहा था, सुमित और नेहा को अपना जरूरी सामान समेटकर सामने वाले पुराने घर में जाना पड़ा। सुमित के चेहरे पर घमंड और गुस्से के मिले-जुले भाव थे, उसे लग रहा था कि यह सब दो दिन का नाटक है, भाई आलोक शाम तक खुद मनाने आ जाएगा। लेकिन आलोक ने भी इस बार अपनी पत्नी के फैसले में पूरी सहमति जताई थी। उसने अपने दिल पर पत्थर रख लिया था ताकि भाई को सही सबक मिल सके।
पुराने घर की दहलीज पर कदम रखते ही नेहा की हिम्मत टूट गई। चारों तरफ धूल, जाले और सालों से बंद पड़ी सीलन भरी बदबू फैली थी। कोई पंखा नहीं, रसोई में गैस का चूल्हा नहीं, बस एक सूनापन था। सुमित गुस्से में आकर एक टूटी हुई खाट पर बैठ गया।
“देखा तुम्हारी दीदी का असली चेहरा? हमें कुत्ते की तरह घर से निकाल दिया!” सुमित ने तंज कसा।
नेहा की आँखों में आंसू थे, लेकिन उस वीरान घर और बिखरी हुई जिंदगी को देखकर अचानक उसके अंदर कुछ बदला। वंदना के कहे वो शब्द उसके कानों में गूंजने लगे—“तू इतनी बच्ची नहीं है… अपने अधिकार के लिए अपने पति से कब लड़ेगी?”
नेहा ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा। उसने अपनी आंखें पोंछीं और सीधे सुमित के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज़ में इस बार कोई डर या रुलाई नहीं थी, बल्कि एक खनकती हुई सख्ती थी।
“दीदी को दोष देना बंद करो सुमित!” नेहा की तेज़ आवाज़ सुनकर सुमित चौंककर उसकी तरफ देखने लगा।
“दीदी ने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, तुम्हारे गुनाहों को छुपाया, और तुमने क्या किया? अपने भाई की मेहनत की कमाई उड़ाई, मेरे गहने जुए में हारे और अब इस धूल भरी कोठरी में मुझे लाकर खड़ा कर दिया। सुन लो सुमित, अब तक तुम्हारी भाभी तुम्हारी ढाल बनी हुई थी, इसलिए तुम शेर बने घूमते थे। अब कोई ढाल नहीं है। अगर इस घर में मेरे साथ रहना है, तो जुआ, शराब और आवारा दोस्तों की चौखट हमेशा के लिए छोड़नी होगी। कल से तुम मेहनत करोगे, चाहे दुकान पर बैठो या मजदूरी करो, शाम को मेहनत की रोटी लेकर आओगे, तभी इस चौखट के भीतर कदम रखोगे। अगर तुमने फिर से कोई गलत काम किया, तो दीदी से पहले मैं खुद तुम्हारे खिलाफ थाने जाकर रपट लिखाऊंगी!”
सुमित अवाक रह गया। जिस सीधी-सादी, सहमी हुई नेहा को उसने अब तक सिर्फ रोते देखा था, आज वह दुर्गा का रूप धारण किए उसके सामने खड़ी थी। सुमित को पहली बार अपनी जमीन खिसकती महसूस हुई। उसे समझ आ गया कि अब उसके पीछे कोई ऐसा नहीं खड़ा जो उसके पापों का बोझ उठाएगा। अगर उसने खुद को नहीं बदला, तो वह सड़क पर आ जाएगा और उसकी अपनी पत्नी भी उसका साथ छोड़ देगी।
उस दिन दोनों ने मिलकर पुराने घर की सफाई की। नेहा ने पास के कुएं से पानी खींचकर घर धोया। शाम को आलोक ने चुपके से एक बोरी राशन और जरूरी बर्तन बाहर रखवा दिए थे, लेकिन वह खुद सामने नहीं आया। वंदना ने ऊपर की खिड़की से सब देखा, उसकी आँखों में ममता के आंसू थे, लेकिन उसने खुद पर संयम रखा।
शुरुआती कुछ हफ्ते बेहद कठिन बीते। सुमित को जब अपने पुराने लफंगे दोस्तों से कोई मदद नहीं मिली, उल्टे उन्होंने कर्ज के लिए धमकाना शुरू किया, तब उसे समझ आया कि मतलब की दुनिया कैसी होती है। उसने शर्म और झिझक छोड़कर कस्बे में एक थोक किराना व्यापारी के यहां मुनीम और डिलीवरी का काम शुरू किया। सुबह से शाम तक जब वह पसीना बहाकर लौटता, तो उसके बदन का एक-एक अंग दुखता था। तब उसे एहसास हुआ कि उसके बड़े भाई आलोक ने कितनी कुर्बानियां देकर उसे पढ़ाया था।
नेहा ने भी हार नहीं मानी। उसने घर पर सिलाई की मशीन बैठाई और आसपास की महिलाओं के कपड़े सिलना शुरू कर दिया। दोनों मिलकर पाई-पाई जोड़ रहे थे। नेहा हर रोज़ सुमित को हौसला देती, उसके माथे का पसीना पोंछती और उसे सही राह पर बनाए रखती। घर में भले ही अभाव था, लेकिन अब वहां छल, कपट और झूठ नहीं था।
छह महीने बीत गए। दीवाली का पावन त्यौहार नज़दीक था।
सुमित ने इन छह महीनों में जुए और गलत संगत का नाम तक नहीं लिया था। उसकी लगन और ईमानदारी देखकर किराना व्यापारी ने उसे एक अच्छा बोनस दिया था। नेहा ने भी सिलाई से अच्छी-खासी रकम बचा ली थी। दोनों ने मिलकर सुमित के पुराने सारे कर्जे चुकता कर दिए थे।
दीवाली की शाम, नया मकान दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था। आलोक और वंदना अपने बच्चों के साथ आंगन में लक्ष्मी पूजन की तैयारी कर रहे थे। तभी चौखट पर किसी की आहट हुई।
वंदना ने मुड़कर देखा। सामने सुमित और नेहा खड़े थे। दोनों के चेहरों पर एक नई चमक और गरिमा थी। सुमित के हाथ में मिठाइयों का डिब्बा और नए वस्त्र थे।
सुमित आगे बढ़ा और उसने बिना कुछ कहे सीधे अपने बड़े भाई आलोक और भाभी वंदना के चरणों में अपना सिर रख दिया। उसकी आंखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आंसू बहने लगे।
“भैया… भाभी… मुझे माफ कर दीजिए,” सुमित का गला रुंध गया। “अगर उस दिन भाभी ने मुझे उस घर से धक्के देकर बाहर न निकाला होता, अगर मुझे मेरी जिम्मेदारियों की आग में न झोंका होता, तो मैं आज किसी जेल की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी सड़ा रहा होता। आपने मुझे घर से नहीं निकाला था, बल्कि मेरी गिरी हुई इंसानियत को जगाने के लिए मुझे सच्चाई की ज़मीन दिखाई थी।”
आलोक ने झुककर अपने छोटे भाई को सीने से लगा लिया। दोनों भाइयों की आंखें भर आईं।
वंदना ने मुस्कुराते हुए नेहा की तरफ देखा। नेहा दौड़कर अपनी दीदी के गले लग गई और रोते हुए बोली, “दीदी, उस दिन मुझे आप पर बहुत गुस्सा आया था, लेकिन आज समझ आया कि आपने मुझे रोती हुई कमजोर औरत से एक स्वाभिमानी और मजबूत औरत बना दिया। अगर आप वो कठोर फैसला न लेतीं, तो मेरी गृहस्थी कभी नहीं बस पाती।”
वंदना ने नेहा के आंसू पोंछे और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, “पगली, जब कोई अंग सड़ने लगता है, तो कड़वी दवा देनी ही पड़ती है। तुम दोनों ने खुद को साबित कर दिया। अब यह चौखट तुम्हारी है, और तुम्हारा हक यहां हमेशा रहेगा।”
उस रात दोनों घरों के बीच की दीवारें ढह गईं। आंगन में जले दीयों की रोशनी सिर्फ मकान को ही नहीं, बल्कि एक टूटे हुए परिवार के पुनः जुड़े विश्वास और स्वाभिमान को रोशन कर रही थी।
आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं:
क्या आपको लगता है कि वंदना का अपने देवर और बहन को घर से निकालने का कठोर फैसला सही था? क्या कभी-कभी अपनों को सुधारने के लिए ममता को किनारे रखकर कड़े कदम उठाना जरूरी हो जाता है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
मूल लेखिका : चाँदनी झा