दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक आज विकास को हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। वह डाइनिंग टेबल के एक छोर पर बैठा अखबार के पन्नों में उलझने का नाटक कर रहा था, और ठीक उसके सामने बैठी नीता बिना कोई आवाज़ किए अपने कप की चाय खत्म कर रही थी। दोनों के बीच बमुश्किल तीन फुट का फासला था, लेकिन ऐसा लग रहा था मानो वे दो अलग-अलग किनारों पर खड़े हों, जिनके बीच एक गहरी,
खामोश खाई बह रही हो। यह वही डाइनिंग टेबल थी जहाँ कभी नाश्ते के साथ-साथ दफ्तर की गपशप, पड़ोसियों की बातें और दिन भर की योजनाएं साझा की जाती थीं। लेकिन आज, वहाँ सिर्फ चाय की चुस्कियों और पन्ने पलटने की सूखी आवाज़ें थीं। विश्वास की जो दीवार उन्होंने सात सालों के वैवाहिक जीवन में ईंट-दर-ईंट खड़ी की थी, वह अब जगह-जगह से दरक रही थी, और उस दरार से रिसता हुआ अहम उनके रिश्ते को खोखला कर रहा था।
विकास और नीता की शादी एक प्रेम विवाह था। एक वक्त था जब दोनों एक-दूसरे को अपने दिन की हर छोटी-बड़ी बात बताए बिना सो नहीं पाते थे। दफ्तर में बॉस की डांट हो या रास्ते में दिखा कोई अजीब इंसान, हर बात का साझा होना ज़रूरी था। खूबियों पर फिदा होने वाले वे दोनों इंसान, अचानक एक-दूसरे की कमियों को दूरबीन लगाकर देखने लगे थे। यह सब एक दिन में नहीं हुआ। रिश्ते कभी भी एक झटके में नहीं टूटते, वे धीरे-धीरे, रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके दरकते हैं। और यही उनके साथ भी हुआ था।
शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई थी। विकास का काम का तनाव बढ़ने लगा और वह घर आकर चुप रहने लगा। नीता, जो हमेशा से एक समझदार पत्नी रही थी, ने उसकी इस खामोशी को उसका स्ट्रेस समझकर उसे स्पेस देना शुरू किया। वह घर के सारे काम खुद संभाल लेती, विकास के आराम का ध्यान रखती और अपनी ज़रूरतें पीछे छोड़ देती। नीता का यह समर्पण शुरू में विकास को बहुत अच्छा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह विकास के लिए एक ‘आदत’ और नीता की ‘ज़िम्मेदारी’ बन गया। विकास को लगने लगा कि नीता का काम ही है उसके मूड के हिसाब से ढलना। जब एक इंसान रिश्ते को बचाने के लिए हमेशा झुकता रहता है, तो दूसरे को यह गुमान हो जाता है कि शायद वह इस रिश्ते का केंद्र है, और दूसरा व्यक्ति उसके बिना जी नहीं सकता। यही गुमान विकास के मन में भी घर कर गया था।
दूरियां बढ़ती गईं। अब बोलना और बताना कम होता जा रहा था। पहले जो बातें बताना ज़रूरी लगता था, अब वे फालतू लगने लगी थीं। “उसे बताकर क्या होगा, वो कौन सा समझेगी,” विकास अक्सर यही सोचकर बातें टालने लगा। वहीं नीता सोचने लगी, “जब वो मेरी बातों पर ध्यान ही नहीं देते, तो मैं क्यों अपनी ऊर्जा बर्बाद करूँ।” शिकायतें जो पहले प्यार से की जाती थीं, अब वे तीखे तानों में बदल गई थीं। नीता को लगता कि विकास अब उसकी परवाह नहीं करता, और विकास को लगता कि नीता हमेशा किट-किट करती रहती है। खूबियाँ, जो कभी उनके रिश्ते की नींव थीं, अब कहीं बहुत गहरे पर्दे के पीछे छिप गई थीं और सिर्फ खामियां ही खामियां नज़र आने लगी थीं।
आखिर ऐसा क्यों होता है? दो लोग, जो कभी एक-दूसरे का अक्स हुआ करते थे, वो अचानक अजनबी क्यों हो जाते हैं? नज़रे चुराने की नौबत क्यों आ जाती है? विकास और नीता के मामले में इसका सबसे बड़ा कारण था – ‘अहंकार’। मैं सही हूँ, और दूसरा गलत, यह भाव उनके बीच एक अदृश्य दीवार बन गया था।
पिछले हफ्ते की ही बात है। नीता के माता-पिता की सालगिरह थी। नीता ने विकास को एक हफ्ते पहले ही बता दिया था कि उन्हें शाम को उनके घर जाना है। विकास ने हामी भी भरी थी। लेकिन उस दिन विकास दफ्तर से जानबूझकर देर से लौटा। उसका तर्क था कि एक ज़रूरी मीटिंग आ गई थी। नीता जानती थी कि वह झूठ बोल रहा है, क्योंकि उसने विकास के सहकर्मी का स्टेटस देखा था जिसमें वे सब बाहर चाय पी रहे थे। जब नीता ने इस बात पर नाराज़गी जताई, तो विकास ने अपनी गलती मानने के बजाय नीता पर ही पलटवार कर दिया।
“तुम समझती क्या हो खुद को? मैं यहाँ दिन भर गधों की तरह खटता हूँ और तुम्हें सिर्फ अपनी पार्टी की पड़ी है!” विकास का लहजा बेहद कड़वा था।
“क्या एक दिन तुम मेरे परिवार के लिए समय नहीं निकाल सकते? हमेशा मैं ही तुम्हारे घरवालों, तुम्हारे दोस्तों, तुम्हारी सहूलियत के हिसाब से क्यों चलूँ?” नीता भी फट पड़ी थी।
बस, वही रात थी जब दोनों के बीच का बचा-खुचा संवाद भी खत्म हो गया। नीता ने इस बार तय कर लिया था कि वह नहीं झुकेगी। हमेशा वही क्यों पहल करे? हमेशा वही क्यों बात को सुलझाने की कोशिश करे? जब गलती विकास की है, तो उसे ही झुकना पड़ेगा। दूसरी तरफ विकास का अहम उसे रोक रहा था। “अगर मैं आज झुक गया, तो इसे लगेगा कि मैं हमेशा इसकी हर बात मानूँगा। मैं घर का मुखिया हूँ, मुझे झुकने की क्या ज़रूरत है?”
यही तो वह सवाल था जो आज उनके बेजान रिश्ते की चौखट पर खड़ा दस्तक दे रहा था। क्यों ऐसी बातों पर रिश्ते दांव पर लग जाते हैं जिनका असल में कोई बड़ा महत्व नहीं होता? क्यों ‘मुझे झुकना नहीं है’ का अहम इंसान के कदम रोक देता है? जब दो लोग एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो फिर ‘मैं सही’ और ‘तुम गलत’ की बहस में ‘हम’ कहाँ खो जाता है?
नीता रोज़ रात को करवटें बदलती और सोचती कि क्या उनके जीवन भर साथ निभाने के वादे इतने कमज़ोर थे कि एक छोटी सी बहस और कुछ दिनों की खामोशी उन्हें तोड़ सकती है? वह विकास की तरफ देखती, जो पीठ फेर कर सो रहा होता, और उसकी आँखें भर आतीं। वह चाहती थी कि विकास बस एक बार मुड़कर उसे गले लगा ले, कह दे कि “चलो जो हुआ सो हुआ, भूल जाते हैं।” लेकिन विकास की पीठ का वह कठोर हिस्सा उसके अहंकार का प्रतीक बन चुका था।
दूसरी तरफ विकास भी अंदर ही अंदर घुट रहा था। उसे नीता की कमी खल रही थी। घर का खाना अब बेस्वाद लगता था। सुबह की चाय में अब वो गर्माहट नहीं थी। लेकिन जैसे ही वह नीता से बात करने का सोचता, उसका ‘ईगो’ सामने आकर खड़ा हो जाता। “अगर मैंने पहल की, तो मैं छोटा हो जाऊँगा।” कैसे कोई बस इसलिए अपने सालों के रिश्ते को दांव पर लगा देता है कि गलती किसी की भी रहे, लेकिन झुकना दूसरे को ही चाहिए?
यह सिर्फ विकास और नीता की कहानी नहीं है। यह आज के समय में बंद दरवाज़ों के पीछे पल रही हर उस कहानी का अक्स है, जहाँ प्रेम तो है, लेकिन उसे ज़ाहिर करने का तरीका अहम के बोझ तले दब गया है। जहाँ समर्पण को कमज़ोरी मान लिया जाता है, और अकड़ को ताकत। जहाँ लोग ये भूल जाते हैं कि रिश्ते किसी एक के झुकने से नहीं, बल्कि दोनों के एक-दूसरे को थामे रखने से चलते हैं।
घड़ी ने आठ बजाए। विकास को दफ्तर के लिए निकलना था। वह अपनी कुर्सी से उठा। उसने एक नज़र नीता पर डाली। नीता बर्तन समेट रही थी, उसने विकास की तरफ नहीं देखा। विकास अपना लैपटॉप बैग उठाकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा। दरवाज़े का हैंडल पकड़ते ही वह एक पल के लिए ठिठका। उसके अंदर एक द्वंद्व चल रहा था—अहंकार और प्यार के बीच की लड़ाई। उसने पलट कर देखा, नीता भी ठीक उसी पल मुड़ी थी। दोनों की नज़रें मिलीं। कुछ सेकंड के लिए समय जैसे रुक गया। उन नज़रों में शिकायतें थीं, दर्द था, लेकिन कहीं एक कोने में वो पुराना प्यार भी था जो अभी पूरी तरह मरा नहीं था। विकास ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, लेकिन फिर कुछ सोचकर बिना कुछ कहे दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया। और पीछे छूट गई वो खामोशी, जो अब पहले से भी ज़्यादा गूंज रही थी, यह पूछते हुए कि आखिर क्या एक जीवन का रिश्ता इतना कमज़ोर हो सकता है?
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