वक्त की मार बहुत गहरी होती है – मंजू ओमर 

इंसपेक्टर साहब इस आदमी ने मेरे साथ धोखा किया है। मुझसे शादी करके मेरी बेटी के साथ बलात्कार किया है।  इंस्पेक्टर हंसा अरे क्या कह रही है तू एक पिता अपनी बेटी के साथ बलात्कार करेगा‌ क्यों झूठा इल्जाम लगा रही है तू शरिफ इंसान पर। तुम लोग बस पैसे वाले इंसान को फांसती हो … Read more

खालीपन – करुणा मलिक 

निधि! सचमुच तुम बडे़ दिल वाली हो। मुझे तो तुम्हारे आने के बाद पता चला कि भाभी का सुख क्या होता है… बड़ी भाभी को तो कुछ नहीं पता कि ननदों का लेन- देन क्या होता है…  पर दीदी…. ऐसा कैसे हो सकता है कि  अमृता भाभी की मम्मी ने उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया? … Read more

*जब एक भूल ने छीन लिया मायके का आंगन* – तोषिका

कई बार एक छोटी सी भूल भी, जन्मों के ज़ख्म दे जाती है, इसीलिए अपने और पराए में फर्क को परखना आना चाहिए। निडर आवाज में कामिनी अपनी बहु शिल्पी से बोली। जी मां बोल कर वह अपने कमरे में चली गई। शिल्पी अभी नई नई चोपड़ा खानदान की बहु बनी थी। चोपड़ा खानदान का … Read more

स्वाभिमान की नई उड़ान – रमा देवी

पैंसठ वर्षीया सावित्री देवी के हाथों में चाय का कप हल्का-हल्का कांप रहा था। सुबह के सात बजे थे और रसोई से उनकी बहू तान्या की कर्कश आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। “पता नहीं इस घर में दूध की नदियां बहती हैं क्या! सुबह उठते ही सबको दो-दो बार चाय चाहिए। बैठे-बैठे मुफ्त … Read more

तलाक – मंजु घोष 

“काव्या, तुम परेशान मत होना। लेकिन मुझसे रहा नहीं गया, इसलिए पूछ रहा हूँ। मुझे किसी से पता चला कि तुम्हारे और समीर के बीच आजकल कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। बात यहां तक पहुँच गई है कि तुम दोनों अलग होने का मन बना चुके हो और तलाक की नौबत आ गई … Read more

मंज़िल की ओर कदम – नीतू चौहान

मीरा जब ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसकी आँखों में एक नई ज़िंदगी के साथ-साथ अपने करियर को लेकर भी कई सुनहरे सपने थे। शादी से पहले ही उसने बता दिया था कि वह राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की तैयारी कर रही है। शुरुआत में तो ससुराल वालों ने बड़ी-बड़ी बातें … Read more

खोया हुआ सम्मान – गरिमा चौधरी

“अम्मा, क्या बात है? आज फिर आप यहाँ सीढ़ियों पर बैठी हैं? धूप कितनी तेज़ है, अंदर क्यों नहीं जातीं?” मैंने अपने घर का दरवाज़ा खोलते हुए सामने वाली सीढ़ियों पर बैठी शांति अम्मा से पूछा। शांति अम्मा ने अपने मैले हो चुके पल्लू से अपनी डबडबाई आँखें पोंछीं और एक सूखी, बेजान सी मुस्कान … Read more

रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते – मुकेश पटेल

मैं अपनी एक महीने की छुट्टी बिताने के लिए अपने शहर आया हुआ था। बाजार में काफी रौनक थी और मैं अपनी माँ के लिए कुछ गरम कपड़े और दवाइयां खरीद कर वापस अपनी कार की तरफ लौट रहा था। अचानक मेरी नजर एक सेब वाले के ठेले के पास जमा हुई भीड़ पर पड़ी। … Read more

इज्जतदार – आरती शुक्ला

पूरे सात साल बीत चुके थे उस दिन को, जब शहर के जाने-माने रईस और उसूलों के पक्के सत्यप्रकाश जी ने अपनी इकलौती बेटी अंजलि को अपनी चौखट से धक्के मारकर निकाल दिया था। अंजलि का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने पिता के चुने हुए अमीर घराने के लड़के को छोड़कर, एक साधारण … Read more

स्कूल – एम. पी. सिंह

मेरा एक जानने वाले अनिल बाबू पढ़ाई करने के बाद नौकरी क़ी तलाश में कई महीने भटकते रहे, पर सफलता हाथ नहीं लगी. कारण था, न तो उसका कॉलेज अच्छा था और न ही मार्क्स अच्छे थे. फिर एक दिन पता चला क़ी शहर के बाहर गाँव में एक प्राइमरी स्कूल का मालिक अपना स्कूल … Read more

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