“हम सब साथ हैं” – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

आगरा की व्यस्त गलियों के बीच, राजा मंडी में एक तीन मंज़िला पुराना लेकिन मजबूत घर था, जहां शर्मा परिवार कई पीढ़ियों से साथ रह रहा था। घर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर दादी-जी रहती थीं—सफेद बाल, मुस्कुराती आँखें और कहानियों का खजाना। बीच वाली मंज़िल पर रमेश शर्मा, उनकी पत्नी काव्या और दो बच्चे—ध्रुव … Read more

*स्वाभिमान मेरा भी* – तोषिका

“कहा जा रही हो बेटा? आज तुम्हे लड़के वाले आ रहे है देखने।” मोहन ने अपनी बेटी निशा को पीछे से टोकते हुए बोला। निशा घूमी और उसने बोला “बस बाहर थोड़ा कॉलेज के लिए समान लेने जा रही हू, जल्दी ही आ जाऊंगी।”  तभी मोहन ने ताने मारते हुए बोला “सारा दिन बाहर घूम … Read more

चेहरे के ऊपर चेहरा रखती हो तुम बहू – मंजू ओमर

और भाई अम्मा कहां है दिखाई नहीं दे रही  हैं। अजय ने बड़े भाई विजय से पूछा, अरे वह अंदर है, वह देखो आ गई। अरे अजय आया है क्या आज। हां माँ बहुत दिन हो गए थे तुमसे मिले हुए तो आ गया तुमसे मिलने । अजय  और पत्नी सुमन ने झुक कर माँ  … Read more

स्वाभिमान की रक्षा – गीता वाधवानी

 सुबह 5:00 का अलार्म बड़ी तेज बज रहा था। निधि का बिल्कुल उठने का मन नहीं कर रहा था। वह बहुत ही थकी हुई थी। लेकिन मन मार कर आखिर उठाना ही पड़ा क्योंकि उसे ऑफिस पहुंचने में रोज देर हो जाती थी और घर के काम भी निपटाने  होते थे।      वह जल्दी से नहा … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – कायनात परवीन

​गाँव की चौपाल पर जब भी बेटियों की शिक्षा या उनके सपनों की बात होती, तो बुज़ुर्गों का एक ही जवाब होता—”लड़कियों की हद घर की चारदीवारी तक ही ठीक है।” मीरा भी इसी गाँव की एक सीधी-साधी लड़की थी, जिसके सपनों का आसमान बहुत बड़ा था, लेकिन उसके पाँव में ‘परंपराओं और सामाजिक बंदिशों’ … Read more

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – मधु वशिष्ठ

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है और मैंने वही किया है। मैं यहां ही खुश हूं। पापा अब आपकी अकेले रहने की उम्र नहीं है, माधुरी ने कहा। पवन भी साथ में ही खड़ा था, उसने भी धीरे से कहा पापा आप चाहो तो आप मेरे साथ आकर रह सकते हो? पहली बात … Read more

वात्सल्य का नया सवेरा

शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का … Read more

“अंधेरे में एक रौशनी”

शाम ढल चुकी थी, लेकिन घर के आंगन में पसरा सन्नाटा जैसे और भी गहरा होता जा रहा था। यह वही आंगन था जहाँ कुछ महीनों पहले तक बच्चों की किलकारियां, बड़ों की हंसी-ठिठोली और चाय की चुस्कियों के साथ दिन भर की बातें गूंजा करती थीं। लेकिन बाबूजी, यानी रामनाथ जी के अचानक हुए … Read more

रिश्तों की डोर: पतंग और आसमान

“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है … Read more

चंदा नहीं चाहिए – लतिका श्रीवास्तव

गाँव का वह छोटा-सा शासकीय विद्यालय सुबह होते ही बच्चों की आवाज़ों से भर जाता था। विद्यालय के सामने कच्ची सड़क थी और उसके दोनों ओर दूर तक फैले खेत। खेतों में रोपा लगाते ग्रामीण नई उम्मीदों की फसल बोने की तैयारी में थे। बरामदे के पास खड़ा पुराना नीम का पेड़ गर्मी की दोपहर … Read more

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