वही अपनी है – शुभ्रा बैनर्जी 

जया जब से शादी करके ससुराल गई थी,ससुर को हमेशा शांत और अनुशासित ही देखा था।नौकरी से रिटायर होने के बाद भी, हर सुबह ठीक नौ बजे प्रेस किए कपड़े पहने घूमने निकल जाते थे। अपने पुराने दोस्तों के साथ मिलकर चाय पीना उनकी दिनचर्या में शामिल था।जया को जब भी कुछ खाने का मन … Read more

पिता का स्वाभिमान – बिमला रावत जड़धारी

पापा आप क्यों भाभी को परेशान कर रहे हो? पहले तो आप इतनी तारीफ करते थे। हमारी बहू तो बहुत अच्छी है, सर्व गुण संपन्न है, हमारा बहुत घ्यान रखती है। घर में कोई आता है तो उनकी बहुत आवभगत करती है। किसी को कुछ भी बोलने का मौका नहीं देती। अब ऐसा क्या हो … Read more

पिता का स्वाभिमान – डाॅ संजु झा

कुछ संतानें पिता के स्वाभिमान को  अपने कर्मों से आसमान की ऊॅॅंचाईयों तक पहुॅंचा देखतीं हैं और कुछ संतानें ऐसी भी होती  हैं, जिनके कारण पिता का स्वाभिमान खंड-खंड होकर बिखर जाता है। पौराणिक कथा का  अष्टावक्र ऐसा ही पात्र हैं, आरंभ में जिसके आचरण के कारण उसके पिता कहोड़ ऋषि के स्वाभिमान को ठेस … Read more

पिता का स्वाभिमान – तोषिका

अपने *पिता का स्वाभिमान* हमेशा रखना बेटा। तुम्हारे पिताजी बोलेंगे कुछ नहीं, पर तुम उनका ध्यान रखना। अपने बेटे केशव के सर पर हाथ फेरती हुई हीना बोली। अगले दिन जब वो सुबह सुबह उठा और हॉस्पिटल जाने की तैयारी कर ही रहा था कि उसके पिताजी माधव का उसको कॉल आया। उस कॉल को … Read more

हाथ जुड़े पर बराबरी के लिए – लतिका श्रीवास्तव

यजमान को बुलाइए कन्यादान की रस्म करनी है पंडित त्रिभुवन प्रसाद की आवाज गूंज उठी और सबकी निगाहें वधू शिवांगी के पिता दिनकर जी को ढूंढने लगीं। विशाल शानदार शामियाना लंबी लंबी कनातें दूधिया रोशनी में सतरंगी आभा बिखेर रहीं थीं। पीले गुलाबी लाल सुर्ख गुलाब से लेकर बसंती गेंदे शुभ्र सेवंती की लटकने गुच्छों … Read more

स्वाभिमान – खुशी

राम कुमार एक दुकान पर मुनीम की नौकरी करते थे। उनका हिसाब इतना अचूक होता था कि सेठ कैलाश चंद्र कहते कि राम तेरे जैसा हिसाब जमाने वाला कोई नहीं कभी एक पैसे का भी हेर फेर नहीं।राम कुमार की इस ईमानदारी के कारण कैलाश चंद्र तो उन्हें बहुत मानते थे और राम कुमार के … Read more

अपराधबोध – उमा वर्मा

मै अनुज अस्पताल के बेड पर पड़ा हुआ हूँ ।डाक्टर ने जवाब दे दिया है ।कैन्सर का आखिरी सटेज है ।डाक्टर ने कहा है कि अपने नजदीकी से मिलने के लिए ।मेरे पास समय बहुत कम रह गया है ।मेरे पास अब है ही कौन?  सारे रिश्ते मैंने बहुत पहले खो दिया है ।माता पिता … Read more

“बुढ़ापा तो सबको आता है “। – उमा वर्मा

श्याम वर्ण श्यामा भले ही सांवली सलोनी थी पर चेहरे पर मासूमियत और सुन्दरता मे कोई कमी नहीं थी।तभी तो पिता ने श्यामा नाम धर दिया था बेटी का ।बहुत शांत और सुशील श्यामा ने मैट्रिक पास ही किया था कि पिता ने अच्छा घर वर देख कर उसकी शादी तय कर दी । बहुत … Read more

वक्त की मार । – उमा वर्मा

साँझ का उजाला छिपने को है।अंधेरा अपने पैर पसारने के लिए तैयार है।खिड़की के पास खड़ी गायत्री अपने बीते दिनों को याद कर रही है ।वक्त की मार से वह भी कहाँ बच पायी है।बेटा अपने ससुराल गया है प्रिया को लिवाने।कई साल पीछे लौटी है गायत्री ।कितनी सुखी गृहस्थी थी उसकी । अच्छे पति … Read more

बस बहुत हुआ – गीता वाधवानी

 अतुल  ने अपने पिता गिरधारी लाल से कहा-” पिताजी आप समझते क्यों नहीं है, एक तो शहर में खर्चा इतना ज्यादा होता है और ऊपर से छोटे-छोटे घर, भैया और मैं एक साथ मां का और आपका खर्चा नहीं उठा पाएंगे, इसीलिए आप मेरे साथ रहे और भैया के साथ मां रहने चली जाएगी, थोड़े-थोड़े … Read more

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