तलाक – मंजु घोष 

“काव्या, तुम परेशान मत होना। लेकिन मुझसे रहा नहीं गया, इसलिए पूछ रहा हूँ। मुझे किसी से पता चला कि तुम्हारे और समीर के बीच आजकल कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। बात यहां तक पहुँच गई है कि तुम दोनों अलग होने का मन बना चुके हो और तलाक की नौबत आ गई है।

अगर कोई भी मदद चाहिए बेटा, तो मुझे बेझिझक बताना।” फोन के दूसरी तरफ से रमेश मामा की चिंता से भरी भारी आवाज़ गूंज रही थी।

यह सुनते ही काव्या के हाथों से जैसे फोन छूटने को हो गया। उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने कांपती हुई आवाज़ में तुरंत जवाब दिया, “मामा जी, आप यह कैसी बातें कर रहे हैं? आप परेशान ना हों, लेकिन आपसे यह सब किसने कहा? मेरे और समीर के बीच ऐसा कुछ भी नहीं है।

हमारा कोई तलाक नहीं हो रहा है, बल्कि हम तो बहुत खुशी से अपना जीवन बिता रहे हैं। आप इन उड़ती-उड़ती अफवाहों पर बिल्कुल भी ध्यान ना दें।” रमेश मामा को किसी तरह तसल्ली देकर काव्या ने फोन काट तो दिया, लेकिन उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

काव्या पुणे के एक खूबसूरत से फ्लैट में अपने पति समीर और तीन साल के बेटे आरव के साथ रहती थी। समीर के माता-पिता का बहुत पहले ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो चुका था, इसलिए इस छोटी सी दुनिया में काव्या, समीर और उनका बेटा ही एक-दूसरे का पूरा परिवार थे। काव्या स्वभाव से बहुत ही सुंदर, सुशील और अपने परिवार पर जान छिड़कने वाली महिला थी। घर को बहुत सलीके से सजाना, समीर की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखना और आरव की परवरिश में अपना पूरा दिन लगा देना, यही उसकी जिंदगी थी। लेकिन काव्या के अंदर एक बहुत बड़ी खामी थी, जो अक्सर उसकी सारी अच्छाइयों पर भारी पड़ जाती थी। वह अत्यधिक भावुक थी।

काव्या के मन में कोई भी बात पचती नहीं थी। जब भी वह भावुक होती, चाहे वह गुस्से में हो या दुख में, वह अपनी भावनाएं छिपा नहीं पाती थी। पति-पत्नी के बीच कभी-कभार होने वाली छोटी-मोटी कहासुनी या आर्थिक मामलों को लेकर होने वाली बहस को वह दिल पर ले लेती थी।

और सबसे बड़ी गलती वह यह करती थी कि अपना मन हल्का करने के लिए वह तुरंत अपनी सहेलियों, दूर के रिश्तेदारों या पड़ोसनों को फोन मिला देती थी। रोते हुए समीर की शिकायतें करना, घर की निजी बातें बताना और खुद को एक बेचारी साबित करना उसकी आदत बन चुकी थी।

उसे लगता था कि अपनी परेशानी दूसरों से साझा करने से उसका दिल हल्का हो जाता है और उसे सहानुभूति मिल जाती है। वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि दुनिया वाले किसी के दुख में सिर्फ तमाशा देखते हैं। पीठ पीछे उसी दुख को नमक-मिर्च लगाकर एक नई कहानी का रूप दे दिया जाता है।

समीर एक बहुत ही सुलझा हुआ और शांत स्वभाव का इंसान था। उसने कई बार काव्या को प्यार से बिठाकर समझाया था। “काव्या, घर की चारदीवारी के अंदर की बातें बाहर नहीं जानी चाहिए।

दो बर्तनों का खटकना आम बात है, लेकिन जब हम अपनी समस्याएं दूसरों के सामने रखते हैं, तो हम उन्हें अपने रिश्ते का मजाक उड़ाने का अधिकार दे देते हैं।

बहुत सी उलझनें और गिले-शिकवे खामोशी और आपसी बातचीत से ही सुलझ जाते हैं। चारों तरफ ढिंढोरा पीटने से समस्याएं कम नहीं होतीं, बल्कि उनका स्वरूप इतना भयंकर हो जाता है कि वह हमारे ही रिश्ते को निगलने लगता है।”

लेकिन काव्या कहां समझने वाली थी। जब भी उसे गुस्सा आता, उसका विवेक काम करना बंद कर देता था। कुछ हफ्ते पहले की ही बात थी। समीर को ऑफिस में एक नया प्रोजेक्ट मिला था, जिसकी वजह से वह कई दिनों तक देर रात घर लौट रहा था। आरव की तबीयत भी थोड़ी नासाज थी

और काव्या अकेले सब संभालते-संभालते थक चुकी थी। एक रात जब समीर थका-हारा लौटा, तो काव्या का गुस्सा फूट पड़ा। दोनों के बीच तीखी बहस हुई। समीर बिना खाना खाए सो गया। अगली सुबह काव्या ने गुस्से और हताशा में अपनी एक दूर की मुंहबोली बहन को फोन मिला दिया।

“मैं तो थक गई हूँ इस रिश्ते से। समीर को तो मेरी और आरव की कोई फिक्र ही नहीं है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं इस घर में घुट रही हूँ। कभी-कभी मन करता है कि सब कुछ छोड़कर कहीं दूर चली जाऊं। अब ये रिश्ता मुझसे और नहीं ढोया जाता।” काव्या ने अपनी भड़ास निकालने के लिए शब्दों की मर्यादा पार कर दी थी।

कुछ घंटों बाद, जब समीर ने ऑफिस से फोन करके प्यार से माफी मांगी और शाम को बाहर डिनर पर ले जाने का वादा किया, तो काव्या का सारा गुस्सा काफूर हो गया। वह भूल गई कि सुबह उसने किसी तीसरे इंसान के सामने अपने रिश्ते की कैसी धज्जियां उड़ाई थीं।

लेकिन आज रमेश मामा के फोन ने उसे आईना दिखा दिया था। काव्या वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गई। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे।

उसे याद आ रहा था कि कैसे उसकी उस मुंहबोली बहन ने उसकी बातों को गलत रूप देकर रिश्तेदारों में फैला दिया होगा। ‘घुट रही हूँ’ और ‘रिश्ता नहीं ढोया जाता’ जैसे शब्दों ने सफर करते-करते ‘तलाक’ और ‘अलगाव’ का रूप ले लिया था।

काव्या ने सामने दीवार पर लगी अपनी और समीर की हंसती हुई तस्वीर को देखा। समीर कितना सही था। लोगों को इससे कोई मतलब नहीं होता कि अगले ही पल पति-पत्नी एक हो गए हैं,

उन्हें तो बस वह कड़वाहट याद रहती है जो गुस्से में परोसी गई थी। आज उसकी एक नादानी की वजह से उसके उस रिश्ते पर उंगलियां उठ रही थीं, जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती थी।

शाम को जब समीर ऑफिस से लौटा, तो काव्या दौड़कर उसके गले लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने रमेश मामा के फोन वाली सारी बात समीर को बता दी और हाथ जोड़कर उससे माफी मांगी। “मुझे माफ कर दो समीर। मुझे आज समझ आ गया है कि घर की देहरी लांघने वाले शब्द कभी लौटकर वापस नहीं आते,

बल्कि वे एक तूफान बनकर हमारी ही छत उजाड़ने आ जाते हैं। मैं वादा करती हूँ, आज के बाद हमारे कमरे की कोई भी बात, चाहे वो खुशी की हो या गम की, कभी इस घर से बाहर नहीं जाएगी।”

समीर ने मुस्कुराते हुए काव्या के आंसू पोंछे और उसे अपने सीने से लगा लिया। काव्या को एक बहुत बड़ा सबक मिल चुका था। उसने जान लिया था कि दुनिया का कोई भी तीसरा इंसान आपके रिश्ते को वो सुरक्षा और प्यार नहीं दे सकता, जो एक जीवनसाथी दे सकता है। मन हल्का करने के लिए पराये कांधे ढूंढने से बेहतर है कि अपनों के सामने ही अपने दिल की बात कह दी जाए।

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लेखिका : मंजु घोष 

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