मंज़िल की ओर कदम – नीतू चौहान

मीरा जब ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसकी आँखों में एक नई ज़िंदगी के साथ-साथ अपने करियर को लेकर भी कई सुनहरे सपने थे। शादी से पहले ही उसने बता दिया था कि वह राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की तैयारी कर रही है।

शुरुआत में तो ससुराल वालों ने बड़ी-बड़ी बातें की थीं—”हमारे घर की बहू अफसर बनेगी, इससे गर्व की बात और क्या होगी।” लेकिन जैसे-जैसे परीक्षा की तारीखें नज़दीक आने लगीं, घर की आबोहवा अचानक बदलने लगी।

मीरा को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक वह इस घर में सबकी आँखों की किरकिरी कैसे बन गई। सास, सुमित्रा देवी का व्यवहार पूरी तरह से रूखा हो गया था। बात-बात पर ताने मारना, हर काम में कमियां निकालना उनका रोज़ का शगल बन गया। अगर मीरा दाल में नमक बिल्कुल सही भी डालती,

तो सुमित्रा देवी थाली सरका कर कह देतीं, “किताबों में दिमाग रहेगा तो खाने में स्वाद कहाँ से आएगा?” मीरा के लिए यह सब नया और हैरान करने वाला था। उसे इस बात की सज़ा दी जा रही थी जिसका उसने कभी कोई अपराध ही नहीं किया था—आगे बढ़ने की चाहत।

सबसे ज्यादा तकलीफ मीरा को अपने पति, कुणाल के व्यवहार से होती थी। कुणाल सीधे तौर पर कभी यह नहीं कहता कि “तुम पढ़ाई छोड़ दो”, लेकिन वह ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर देता कि मीरा का ध्यान अपनी किताबों पर टिक ही न सके। जैसे ही मीरा रात को पढ़ने बैठती, कुणाल जानबूझकर टीवी की आवाज़ तेज़ कर देता या अपने दोस्तों को घर पर बुला लेता।

“मीरा, ज़रा चाय-नाश्ता बना दो, मेरे दोस्त आए हैं,” यह फरमान ठीक उसी वक्त आता जब मीरा अपने मॉक टेस्ट हल करने बैठती। कुणाल का यह मौन विरोध, उसकी मीठी छुरी जैसी चालें मीरा के मनोबल को तोड़ने के लिए काफी थीं।

लेकिन मीरा कच्ची मिट्टी की नहीं बनी थी। उसने हालात को बहुत जल्दी भाँप लिया। उसे एहसास हो गया कि बहसबाज़ी या तर्क-वितर्क से सिर्फ उसकी ऊर्जा और समय बर्बाद होगा,

जो वह इस वक्त बिल्कुल नहीं कर सकती। मीरा ने बिना किसी शिकायत के अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। उसने घर के हर काम को इतनी निपुणता से करना शुरू कर दिया कि किसी को शिकायत का कोई मौका ही न मिले।

सुमित्रा देवी जानबूझकर उसे बेमतलब के कामों में उलझाए रखतीं। कभी पूरे घर के पर्दे धोने को कह देतीं, तो कभी अचार के लिए दिन भर आम कटवातीं। उनका एकमात्र लक्ष्य मीरा को थकाना था ताकि रात को वह किताब खोलते ही सो जाए। घर वाले उसके साथ बिल्कुल बेगानों जैसा बर्ताव करने लगे थे,

मानो वह इस घर की बहू नहीं, बल्कि कोई अवांछित मेहमान हो। इन सबके बावजूद मीरा का हौसला नहीं टूटा। जब पूरा घर सो जाता, तब रात के दो बजे मीरा अपनी मेज़ का छोटा सा लैंप जलाकर पढ़ने बैठ जाती। नींद से बोझिल आँखों पर ठंडे पानी के छींटे मारती और सुबह पाँच बजे तक अपने नोट्स पूरे करती।

इस घोर अंधकार में उसके लिए रोशनी की इकलौती किरण थे उसके ससुर जी, जिन्हें सब बाबूजी कहते थे। बाबूजी घर के मामलों में ज़्यादा बोलते नहीं थे,

लेकिन वे मीरा की मेहनत और उसकी आँखों की तड़प को समझते थे। जब मीरा रात को पढ़ रही होती, तो वे दबे पाँव आते और उसकी मेज़ पर एक कप गर्म चाय रख जाते। उनके बिना कुछ कहे, उनका वह हाथ सिर पर रखना मीरा के लिए एक मूक आशीर्वाद बन जाता था। बाबूजी की आँखों में एक विश्वास था, जो मीरा को टूटने नहीं देता था।

महीनों की इस खामोश तपस्या और मानसिक संघर्ष के बाद आखिरकार वह दिन आ ही गया। राज्य लोक सेवा आयोग का परिणाम घोषित हुआ और मीरा का चयन ‘उप-ज़िलाधिकारी’ (SDM) के पद पर हो गया। जब यह खबर घर में पहुँची, तो जश्न मनने के बजाय एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया।

किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि घर के सारे कामों में उलझाने, मानसिक रूप से तोड़ने और हर तरह की रुकावटें पैदा करने के बावजूद इस लड़की ने यह मुकाम कैसे हासिल कर लिया। सुमित्रा देवी और कुणाल के चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही थीं।

जब वे मीरा को रोक नहीं पाए, तो उन्होंने उसे डराने का नया पैंतरा आजमाया। कुणाल ने बहुत ही चिंता जताने का नाटक करते हुए कहा, “मीरा, तुम्हारी पोस्टिंग यहाँ से बहुत दूर एक तहसील में हुई है।

घर से रोज़ 20 किलोमीटर जाना और 20 किलोमीटर आना… कुल 40 किलोमीटर का सफर। ऊपर से सरकारी नौकरी का तनाव। तुमसे यह सब नहीं संभलेगा। घर भी तो देखना है। मेरा मानो तो यह जॉइनिंग छोड़ दो, अगली बार शहर में कोई छोटी-मोटी नौकरी देख लेना।”

सुमित्रा देवी ने भी सुर में सुर मिलाया, “अरे, इतनी दूर तो आदमी भी धक्के खाकर आधा हो जाता है। तू ठहरी औरत, बसों में धक्के खाती फिरेगी क्या? हमारे खानदान की औरतों ने कभी ऐसे बाहर जाकर धक्के नहीं खाए।”

मीरा अब इन खोखली धमकियों से बहुत आगे निकल चुकी थी। उसने कुणाल की आँखों में सीधा देखते हुए एक बहुत ही शांत और दृढ़ मुस्कान के साथ कहा, “कुणाल, जिस लड़की ने अपने ही घर में अपनों की साज़िशों और तानों के 400 किलोमीटर रोज़ तय किए हों, उसके लिए यह 40 किलोमीटर का सफर बहुत छोटा है।”

बिना किसी के समर्थन का इंतज़ार किए, मीरा ने अगले ही दिन अपना बैग तैयार किया और बाबूजी के पैर छूकर अपनी नई मंज़िल की ओर कदम बढ़ा दिए। सुमित्रा देवी और कुणाल बस ठगे से उसे घर की दहलीज पार करते हुए देखते रह गए। मीरा ने साबित कर दिया था कि जब इरादे चट्टान की तरह मज़बूत हों, तो कोई भी बेड़ी उड़ान को नहीं रोक सकती।

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लेखिका : नीतू चौहान 

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