अपने हुए पराए – डाॅ संजु झा

आसमान में सुबह से ही सूरज बादलों के साथ ऑंख-मिचौनी खेल रहा था।कभी बादलों की ओट में बिल्कुल छुप जाता और कभी अचानक से बादलों की ओट से निकलकर सारी पृथ्वी पर अपनी किरणों से उजाला भर जाता। जन्म के बाद से ही विदेश की धरती पर रहने पर भी अल्बर्ट को यहाॅं का मौसम समझ में नहीं आता है।

मौसम क्या?उसे तो अभी तक उसे अपनी जिंदगी भी समझ में नहीं आई है।उसकी जिंदगी भी उसके साथ इन बादलों के समान ऑंख-मिचौनी खेल रही है।

अल्बर्ट जिंदगी के खट्टे-मीठे  पलों को साक्षी मानकर समय के साथ उसकी लय में  जी रहा था।अपने दत्तक  माता -पिता के साथ विदेशी धरती पर खुद को ढा़ल लिया था।  दत्तक माता-पिता ने उसे जिंदगी की सारी खुशियाॅं दी।उनके प्यार-दुलार की परछाई में पलकर बड़ा हुआ।

उन्हीं की बदौलत आज वह ज़िन्दगी  में वह मुकाम हासिल कर पाया,जिसकी तमन्ना लोग वर्षों से करतें  हैं।परन्तु कुछ दिनों से  अपनी  पहचान,अपना अस्तित्व जानने की कसक उसके दिल में हूकें मारने लगीं हैं। अल्बर्ट  सोचता है -“मनुष्य के एक ही जीवन‌ में जिंदगी कैसे

 पल-पल  रुप बदलती  रहती है? मैं कभी तो  जिंदगी में सब कुछ पाकर आशाओं के समंदर में गोते लगाता हूॅं और कभी अचानक  से निराशा मेरे मन को जकड़ लेती है।

अपने  जन्मदाता ने मुझे क्यों पराया कर दिया?यह सवाल बार-बार मेरे दिल में हूक और घुटन पैदा करने लगा है!  किसके ऑंगन का उजियारा यहाॅं दत्तक माता-पिता के जीवन में सूर्योदय लेकर आया हूॅं।अपने क्यों पराए हुए,बस इसका कारण जानना चाहता हूॅं।”

समय की गति भी अजीब है,यह पल भर के लिए भी किसी के लिए नहीं रुकती है।अपनी धुन में आगे बढ़ती जाती है। अल्बर्ट जवान खूबसूरत नवयुवक बन चुका था और उसके माता-पिता बूढ़े हो चले थे। अल्बर्ट  चाहकर भी अपने दिल की बात अपने माता-पिता से नहीं कर पाता था।उसे उनकी भावनाओं के ठेस पहुॅंचने का डर सता रहा था।वह उनकी परवरिश पर सवाल उठाकर उन्हें  दुखी नहीं करना चाहता था।उसे परेशान देखकर उसके सहकर्मी जाॅन ने पूछा -“दोस्त! आजकल काफी परेशान लगते हो?कुछ समस्या है तो मुझे बताओ,शायद कुछ मदद कर सकूॅं!”

दोस्त का भावनात्मक संबल पाकर अल्बर्ट ने कहा -“दोस्त!कुछ दिनों से मैं खुद को पहचानविहीन समझने लगा हूॅं।बस एक बार मैं भारत जाकर अपनी जड़ें तलाशना चाहता हूॅं।बस जानना चाहता हूॅं कि अपने क्यों पराए हो गए‌और पराए क्यों अपने बन गए?”

जाॅन -दोस्त !इस बारे में एक बार खुलकर अपने माता-पिता से बात कर लो।”

अल्बर्ट -” इन बातों से उनकी भावनाओं को ठेस पहुॅंचने का डर लगता है!”

जाॅन-“दोस्त!ऐसा कुछ नहीं होगा।जिस व्यक्ति ने अपनी परवाह नहीं  की,तुम्हें भारत से लाकर जीवन की सारी खुशियाॅं दी,वह तुम्हारी इन छोटी-छोटी बातों से क्यों नाराज़ होगा?

अगले दिन छुट्टी थी। अल्बर्ट के माता-पिता चर्च गए थे।उसका सारा दिन कशमकश में बीता। ज़िन्दगी का यह मोड़ उसके लिए भयावह होता जा रहा था।इस मोड़ पर आकर वह सवालों के चक्रव्यूह में फॅंसता जा रहा था।उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो सवालों के जबाव न मिलने पर उसके अंदर की घुटन  सब कुछ तहस-नहस कर डालेगी। सोचते-सोचते  अंतर्ज्वाला से वह खुद भयभीत हो‌ उठा।उसका सर्वांग सवालों के  जबाव के लिए तड़प उठा।सीने में उबलते जज़्बात चक्षु से भाप बनकर निकलने लगें।उसके दिल में एक अजीब -सी वीरानी जाने लगी।उसी समय उसके माता-पिता चर्च से लौट आऍं। अल्बर्ट की ऐसी हालत देखकर घबड़ा उठे।पिता ने उसके सिर को सहलाते हुए कहा -“बेटा! तुम्हारे दिल में जो बात है,बेहिचक कह डालो।”

अल्बर्ट ने हिम्मत जुटाकर माता-पिता की ओर देखते हुए कहा -“आप दोनों मुझे क्षमा करें। मैं कुछ दिनों से खुद को अस्तित्वहीन समझने लगा हूॅं।बस एक बार आप मुझे भारत जाकर अपनी जड़ें तलाशने की आज्ञा दें। मैं पता लगाकर जल्द ही आ जाऊॅंगा, क्योंकि मेरे माता-पिता तो‌  बस आप दोनों ही हैं।”

अल्बर्ट के पिता ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा -“बेटा!तुम खुशी से भारत जाकर अपने मन की जिज्ञासा शांत करो।मुझे तुम पर गर्व है और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा प्यार तुम्हें जरूर हमारे पास खींचकर लाएगा।”

पिता से आज्ञा लेकर अगले सप्ताह अल्बर्ट भारत रवाना हो गया।जिस शहर के  अनाथालय से  उसके दत्तक  माता-पिता ने गोद लिया था,उसी शहर के एक होटल में ठहरे गया।एक सप्ताह तक अनाथालय दौड़ने पर भी उसके हाथ कोई जानकारी नहीं ‌लगी।एक पुरानी नर्स ने उसे बस इतना कहा -“बेटा! बगल गाॅंव में पहले बहुत गरीब लोग रहते थे,जो अर्थाभाव के कारण अपने बच्चे को या तो अनाथालय में छोड़ देते थे या पैसों के लालच में विदेशियों को अपने बच्चे बेच देते थे।शायद वहाॅं से कुछ पता चले!”

कई दिनों की भाग-दौड़ से अल्बर्ट थक चुका था।अगले दिन उसने उस गाॅंव में जाकर अंतिम कोशिश करने की सोची।हाथ में चाय का कप  लेकर होटल  की बाल्कनी में खड़ा हो गया।शाम हो चुकी थी।सूरज ने  अपने डैने समेटने शुरू कर दिऍं थे। धीरे-धीरे अंधकार ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिऍं थे।होटल के सामने पेड़ पर पक्षी अपने घोंसलों में लौटकर अपनी आवाजों में कोहराम मचाने हुए थे। अल्बर्ट उन पक्षियों को देखकर सोचता है -“काश!इन पक्षियों की तरह एक दिन मेरा भी घर मिल जाता।एक बार अपने जन्मदाता से मिलकर अपने को पराए बनाने की उनकी मजबूरियों को समझ पाता!”

 रात- भर  अल्बर्ट  करवटें बदलता रहा।कितनी रातें उसने अपने जन्मदाता के बारे में सोचते-सोचते काटी है!शायद कल उसके सवालों के जबाव मिल जाऍं!शायद!उसकी परेशानी की यह आखिरी रात हो!यही सब सोचते-सोचते उसकी ऑंखें लग गईं।

अगले दिन वह उस गाॅंव में पहुॅंच गया। वहाॅं एक-एक आदमी से पूछने लगा। वर्षों पूर्व की बातें किसी को नहीं पता थीं।वह निराश होकर लौटने ही वाला था कि एक बुजुर्ग ने उसका रास्ता रोककर कहा -“बेटा!तुम इतनी दूर से पता लगाने आऍं हो तो, तुम्हें निराश नहीं करुॅंगा।”

अल्बर्ट -” कृपया!आपको मेरे जन्मदाता के बारे में जो कुछ पता है ,बताऍं।वो लोग कहाॅं हैं और मुझे क्यों पराया कर दिया?”

बुजुर्ग व्यक्ति -“बेटा! तुम्हारे जन्मदाता इस दुनियाॅं में नहीं हैं और तुम किसी की नाजायज औलाद भी नहीं हो।तुम मेरी बड़ी बहन के बेटे हो।उस समय हमलोगों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी।तुम अपनी माता-पिता की छठी औलाद थे तथा सदा बीमार रहते थे। हमलोगों के पास खाने के पैसे नहीं थे, इलाज तो बहुत दूर की बात थी। परिवार में काफी विचार-विमर्श के बाद एक अंधेरी रात को तुम्हारे पिता चुपचाप तुम्हें अनाथालय के द्वार पर छोड़ आऍं। तुम्हें अनाथालय में छोड़कर आने पर कहा था -“अगर बच्चे की किस्मत में जीना लिखा होगा तो जी भी जाएगा और जिंदगी में बड़ा आदमी भी बन जाएगा!”

 तुम्हें देखकर लगता है कि सचमुच 

आज उसकी बातें सच साबित हो गईं।

 सारी बातें जानकर अल्बर्ट बिना शिकवा-शिकायत के अपने पालक माता-पिता के पास लौट आया।अपने माता-पिता के गले लगकर उसने कहा -“भारत जाकर मुझे एहसास हो गया कि क्यों  देवकी से यशोदा के मातृत्व का पलड़ा आज भी भारी है?”

कभी-कभी मजबूरी में भी अपने पराए हो जाते हैं।

समाप्त।

लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)

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