स्कूल – एम. पी. सिंह

मेरा एक जानने वाले अनिल बाबू पढ़ाई करने के बाद नौकरी क़ी तलाश में कई महीने भटकते रहे, पर सफलता हाथ नहीं लगी. कारण था, न तो उसका कॉलेज अच्छा था और न ही मार्क्स अच्छे थे. फिर एक दिन पता चला क़ी शहर के बाहर गाँव में एक प्राइमरी स्कूल का मालिक अपना स्कूल बेच कर शहर शिफ्ट हों रहा है.

मालिक से बात करने में भी उसके साथ चला गया. बिल्डिंग के नाम पर एक पुराना सा 4 कमरों का घर. फर्नीचर में केवल 4-6 टेबल और कुर्सी केवल स्टॉफ के लिए, एक हैंड पंप, 2 टॉयलेट और घंटी के नाम पर एक रेल पटरी का टुकड़ा. अच्छी बात थी कि राज्य सरकार से मान्यता मिली हुई थी.

मालिक कि डिमांड भी कुछ ज्यादा नहीं थी. अनिल बाबू के पास कोई रोजगार था नहीं, मन डोल गया, सोचा यही हाथ आजमाते हैं. काम नहीं जमा तो आगे बेच देंगे. सोच विचार के किये समय लिया और वापस आ गये.  पैसों के जुगाड़ के किये यहाँ वहाँ हाथ पैर मारे, कुछ इंतजाम भी

हुआ पर वो ना काफ़ी था. फिर बाकी की रकम मुझ से उधार लेकर मुझे अपने प्रॉफिट का हिस्सेदार बना लिया. जल्दी ही सारी औपचारिकता पूरी करके वो एक स्कूल का मालिक और उसका प्रिंसिपल बन गया. 

कुछ ही समय में अनिल बाबू ने गावं के करीब लेकिन शहर में एक बिल्डिंग किराये पर ली और नया सेशन वहीं पर शुरू करने की तैयारी कर की. बच्चों क़ो आने जाने की सुविधा के लिए एक वेन वाले से समझौता कर लिया. किस्मत ने साथ दिया और गावं और शहर दोनों के बच्चे आने लगे. स्कूल चलते ही धीरे धीरे किताबें, कॉपीयाँ, डायरी, यूनिफार्म,आई. कार्ड, फोटो आदि सब का व्यापार शुरू हों गया.

इस व्यापार में टीचर्स की भी बहुत बड़ी भूमिका थी. कम पैसों में नौकरी करते और खाली पेमेन्ट शीट पर सिग्नेचर करते. कुछ दो नम्बर के काम भी परवान चढ़ने लगे. जो बच्चे किसी और स्कूल में फेल हों जाते, उन्हें अपने स्कूल में अगली क्लास में एडमिशन दे देते.

अपने स्कूल में फेल होने वालों क़ो पास दिखकर टी.सी. दे देते और वो दूसरे स्कुल में अगली क्लास में एडमिशन ले लेता. ऐसे ही कई और भी समानंतर व्यवसाय फलने फूलते चलें गये और अनिल बाबू एक बहुत बडे कारोबारी बन गये. कुछ ही समय में जमीन लेकर खुद की स्कूल बिल्डिंग ख़डी कर ली.

किसी ने उससे इस उन्नति का राज़ जानना चाहा, तो उसका जवाब था, ये सफलता मुझे पढ़ाई मैं कमजोर होने की वजह से मिली. अगर मैं पढ़ाई मैं तेज होता, तो शायद किसी और के यहाँ नौकरी कर रहा होता. 

उसे अपने व्यवसाए पर नाज़ है की वो बच्चों क़ो शिक्षा के साथ साथ लोगों क़ो रोज़गार भी दे रहा हें. पढ़ाई मैं साधारण रहे छात्र ने शिक्षा के मंदिर क़ो शिक्षा का उद्योग बना दिया. 

क्या शिक्षा वास्तव में कोई व्यापार हें?

लेखक 

एम. पी. सिंह, कोटा 

स्वरचित, अप्रकाशित 

error: Content is protected !!