पूरे सात साल बीत चुके थे उस दिन को, जब शहर के जाने-माने रईस और उसूलों के पक्के सत्यप्रकाश जी ने अपनी इकलौती बेटी अंजलि को अपनी चौखट से धक्के मारकर निकाल दिया था। अंजलि का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने पिता के चुने हुए अमीर घराने के लड़के को छोड़कर, एक साधारण से स्कूल टीचर आकाश से प्रेम विवाह कर लिया था।
सत्यप्रकाश जी के लिए उनकी झूठी शान और समाज में रुतबा अपनी बेटी की खुशियों से कहीं बड़ा था। उन्होंने भरे समाज में अंजलि को अपनी संपत्ति और अपने जीवन से बेदखल करने की घोषणा कर दी थी। उसके बाद से अंजलि ने कभी अपने मायके की तरफ पलट कर नहीं देखा।
वह अपने छोटे से आशियाने में आकाश के साथ बेहद खुश थी, लेकिन किसी भी तीज-त्यौहार पर जब उसके घर के दरवाज़े पर कोई शगुन नहीं आता, तो उसकी आँखें नम जरूर हो जाती थीं।
समय अपनी चाल चलता रहा। इस बीच सत्यप्रकाश जी की पत्नी का देहांत हो गया और वे नितांत अकेले पड़ गए। उनके बेटे वैभव और बहू मोनिका के पास पिता के लिए समय ही नहीं था। उनके लिए सत्यप्रकाश जी महज़ एक तिजोरी की चाबी थे। एक दिन अचानक सत्यप्रकाश जी को लकवा मार गया।
उनका आधा शरीर सुन्न पड़ गया और वे बिस्तर से लग गए। वैभव और मोनिका ने दिखावे के लिए शहर के सबसे बड़े अस्पताल में उनका इलाज तो करवाया, लेकिन घर वापस आने के बाद उन्हें नौकरों के भरोसे छोड़ दिया गया।
सत्यप्रकाश जी पूरा दिन अपने शानदार कमरे में छत को निहारते रहते। उनका गला सूखता, लेकिन पानी का गिलास पकड़ाने वाला कोई अपना पास नहीं होता।
यह खबर जब उड़ते-उड़ते अंजलि तक पहुँची, तो उसका कलेजा कांप उठा। सारे गिले-शिकवे, पुराना अपमान और पिता का वो कठोर चेहरा एक पल में उसके जेहन से मिट गया। खून का रिश्ता आखिर अपनी पुकार लगा ही बैठा। आकाश की सहमति लेकर अंजलि उसी दिन अपने मायके पहुँच गई।
सात साल बाद उस घर की दहलीज लांघते हुए उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन जब उसने अपने पिता को उस दयनीय स्थिति में देखा, तो वह खुद को रोक नहीं पाई।
वह दौड़कर उनके सीने से लग गई और फूट-फूट कर रोने लगी। सत्यप्रकाश जी कुछ बोल नहीं सकते थे, लेकिन उनकी आँखों से बहते आंसुओं की धार उनके पश्चाताप की पूरी कहानी बयां कर रही थी।
उस दिन के बाद से अंजलि ने अपने पिता की सेवा का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया। वैभव और मोनिका ने पहले तो बहुत एतराज जताया, लेकिन अंजलि ने स्पष्ट कर दिया कि वह यहाँ किसी जायदाद के लिए नहीं, बल्कि अपने पिता के लिए आई है।
अंजलि सुबह-सुबह पहुँच जाती, पिता को अपने हाथों से स्पंज कराती, उनके कपड़े बदलती, उन्हें समय पर दवाइयाँ देती और उनके मनपसंद का खाना बनाकर अपने हाथों से खिलाती। वह उनके पास बैठकर पुराने दिनों की बातें करती, उन्हें गीता पढ़कर सुनाती।
उसकी इस निस्वार्थ सेवा ने सत्यप्रकाश जी के पत्थर हो चुके दिल को पूरी तरह से मोम कर दिया। उन्हें एहसास हो गया कि जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी बेटी को ठुकराया था, वह तो सिर्फ उनकी दौलत का सगा है। असली दौलत तो उनकी वह बेटी है, जिसे उन्होंने बिना किसी गलती के इतनी बड़ी सज़ा दी।
धीरे-धीरे सत्यप्रकाश जी की तबीयत में सुधार होने लगा। उनके लकवाग्रस्त शरीर में थोड़ी हरकत आने लगी और वे टूटे-फूटे शब्दों में बोलने भी लगे। एक दिन जब अंजलि घर गई हुई थी, सत्यप्रकाश जी ने अपने वकील को बुलाया और अपनी वसीयत में एक बहुत बड़ा और गुप्त बदलाव कर दिया। यह बात उन्होंने किसी को कानों-कान खबर नहीं होने दी।
कुछ दिन और बीते। एक शाम अंजलि पिता को खाना खिलाकर जब रसोई में बर्तन रखने गई, तो उसने वैभव के कमरे से आती तेज़ आवाज़ें सुनीं। वह ठिठक गई। अंदर मोनिका बहुत ही तीखे और ऊंचे स्वर में वैभव पर बरस रही थी।
“ये सब तुम्हारे उस ढीलेपन का नतीजा है! मैंने तुम्हें हज़ार बार कहा था कि उस अंजलि को इस घर में घुसने मत दो। लेकिन तुम ठहरे नासमझ! कहते थे कि नौकरों से अच्छा है मुफ्त की एक दाई मिल गई है। अब देख लिया मुफ्त की दाई का नतीजा?” मोनिका गुस्से से तिलमिलाई हुई थी।
वैभव सिर पकड़े बैठा था। उसने झुंझलाते हुए कहा, “अरे तो मैं क्या करता? मुझे क्या पता था कि पिताजी ऐसा कर देंगे। हमने इतने सालों की मेहनत से अंजलि को इस घर से और पिताजी के दिमाग से बाहर निकाला था। मैंने तो यहाँ तक झूठ बोला था कि अंजलि हमारे खिलाफ बातें करती है।
लेकिन उस एक बीमारी ने हमारा सारा खेल बिगाड़ दिया। आज वकील साहब का फोन आया था। पिताजी ने अपनी उस नई वसीयत में शहर वाली सबसे महंगी ज़मीन और पुश्तैनी गहने अंजलि के नाम कर दिए हैं।”
“वही तो मैं कह रही हूँ!” मोनिका ने अपना माथा पीटा। “तुम बस हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और वो बाज़ी मार ले गई। वो हमेशा से बहुत चालाक थी।
पढ़ाई हो, खेल-कूद हो या रिश्तेदारों के बीच अपनी अच्छी छवि बनाना, उसने हमेशा तुम्हें पछाड़ा है। इस बार भी वो अपने इस इमोशनल ड्रामे वाले खेल में तुमसे जीत गई। वो सिर्फ सेवा का नाटक करने आई थी और अपना हिस्सा लेकर चली गई।”
वैभव ने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ, ये बात तो माननी पड़ेगी। वो इस दिमागी खेल में हमसे बहुत आगे निकल गई। उसने पिता जी के जज़्बातों के साथ ऐसा खेला कि उन्होंने उसे सब कुछ दे दिया। वो जीत गई और हम अपने ही घर में हार गए।”
दरवाजे के बाहर खड़ी अंजलि के कानों में ये सारे शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके सगे भाई और भाभी की सोच इतनी गिर सकती है कि वे एक बेटी के प्रेम को ‘षड्यंत्र’ का नाम दे रहे थे। अंजलि से अब और चुप नहीं रहा गया। उसने धीरे से दरवाज़ा धकेला और कमरे के अंदर दाखिल हो गई।
उसे सामने खड़ा देखकर वैभव और मोनिका दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया। कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया।
अंजलि की आँखों में आंसू थे, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता और शांति थी। उसने वैभव की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “भैया, आप सही कह रहे हैं। मैं जीत गई हूँ। लेकिन आप ये भूल रहे हैं कि ये कोई दिमागी खेल या शतरंज की बिसात नहीं थी। ये एक पिता और बेटी के बीच का वो पवित्र रिश्ता है,
जिसे आपने पैसों के तराजू पर तौलने की कोशिश की। मैंने पिताजी की सेवा किसी ज़मीन या गहनों के लालच में नहीं की, बल्कि इसलिए की क्योंकि मेरे रगों में उनका खून दौड़ता है। अगर मुझे जायदाद चाहिए होती, तो मैं सात साल तक चुप नहीं बैठती।”
वह एक पल के लिए रुकी, उसने मोनिका की तरफ देखा और फिर बोली, “और रही बात हार-जीत की, तो भैया… इस घर में न कोई खेल चल रहा था और न ही कोई साज़िश। यह तो बस एक सीधा सा सच है कि जहाँ स्वार्थ और नफरत होती है, वहाँ इंसान हमेशा हारता है। मेरी जीत मेरी चालाकी की नहीं है,
बल्कि उस निस्वार्थ प्रेम की है जो हमेशा हर साज़िश और हर नफरत पर भारी पड़ता है। पिताजी ने मुझे वसीयत में क्या दिया, मुझे इसकी कोई परवाह नहीं। मेरे लिए तो यही सबसे बड़ी संपत्ति है कि मेरे पिताजी ने मुझे मेरे उसी अधिकार के साथ दोबारा अपने दिल में जगह दे दी है।”
इतना कहकर अंजलि वहाँ से पलट गई। वैभव और मोनिका शर्मिंदगी से नज़रें झुकाए खड़े रह गए। उनके पास अंजलि की उस सच्चाई का कोई जवाब नहीं था। दौलत के लालच में वे रिश्ते हार चुके थे, और अंजलि अपने निस्वार्थ प्रेम के बल पर सबकुछ जीत चुकी थी।
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लेखिका : आरती शुक्ला