बिखरे पन्नों की नई इबारत
अनिरुद्ध ने सब देखा, समझा, मगर उसने कभी आपा नहीं खोया। वह मर्यादा की डोर को थामे रहा। उसने सोचा कि शायद नई जगह, नया माहौल है, प्रज्ञा को सामंजस्य बिठाने में वक्त लगेगा। वह उसे बाहर घुमाने ले जाता, उसकी हर फरमाइश पूरी करता, उसके पसंदीदा उपहार लाता ताकि उसके मन का भटकाव थमे … Read more