समझौता – सीमा सिंघी

आंगन में धूप खिलाई थी। ऐसे भी जाड़े की धूप बड़ी भली लगती है इसीलिए ललिता जी अपने हाथों में एक प्याली चाय की लेकर बाहर खुले आंगन में लगी हुई सोफा पर आकर बैठ गई और इत्मीनान से पीने लगी।  अब धीरे धीरे बालों की सफेदी ने भी उनसे थोड़ा बहुत आंख मिचौली का … Read more

बहन – खुशी

शारदा जी की एक ही इच्छा थी—उनके घर में एक प्यारी-सी बेटी हो। उनके चार बेटे थे। घर में बेटों की किलकारियाँ तो खूब गूँजती थीं, लेकिन बेटी का सुख उन्हें नहीं मिला था। शारदा जी को बेटियों से बहुत लगाव था। उन्हें हमेशा लगता कि काश, उनके घर में भी एक नन्ही-सी गुड़िया होती, … Read more

स्वाभिमान की महक

वक्त किसी नदी की तरह अपनी रफ़्तार से बहता चला गया। समय के साथ परिवार की डालियाँ अलग होने लगीं। ननदें अपने-अपने ससुराल चली गईं, देवर अपने परिवारों को लेकर अलग-अलग शहरों में अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए। सास-ससुर ने भी अपनी लंबी उम्र पूरी करके दुनिया को अलविदा कह दिया। कुछ ही … Read more

वक्त का पहिया – डॉ.आभा माहेश्वरी

शहर के पुराने हिस्से में एक आलीशान हवेली थी—‘शांति निवास’। कभी इस हवेली के नाम से ही पूरे शहर में उसके मालिक सेठ हरदयाल की पहचान थी। अनाज का बड़ा कारोबार था। गोदाम भरे रहते, तिजोरियाँ धन से और आँगन मेहमानों से भरा रहता। हरदयाल को अपने धन पर बड़ा गर्व था। वह अक्सर कहा … Read more

छलावे का सिंदूर

मीरा के हाथों में वह कागज का टुकड़ा बुरी तरह से कांप रहा था। वह कोई मामूली कागज नहीं था, बल्कि समीर की कंपनी से आया हुआ ‘रिलीविंग लेटर’ था। कमरे में पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि मीरा को अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। सामने पलंग पर बैठा समीर नजरें झुकाए अपने … Read more

भरम का लिफ़ाफ़ा

रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की महक उठ रही थी, जो सीधे बरामदे तक पहुँच रही थी जहाँ रिटायर्ड मास्टर दीनानाथ जी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। पैंसठ वर्षीय दीनानाथ जी का जीवन बेहद अनुशासित और शांत था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी और अपना खून-पसीना लगाकर शहर … Read more

काँच के रिश्ते

रसोई में बर्तनों के टकराने की आवाज़ आज कुछ ज़्यादा ही तीखी थी। दिल्ली की उस सर्द शाम में भी मीरा के माथे पर पसीने की बूंदें झलक रही थीं। उसने गैस का बर्नर बंद किया और गीले हाथों को अपने एप्रन से पोंछते हुए बाहर हॉल की तरफ देखा। वहाँ सोफे पर उसका पति, … Read more

सुख का आंगन

“कैसी हो सुमित्रा?” निर्मला ने अपने माथे की सिलवटों को उंगलियों से सहलाते हुए फोन पर पूछा। उसकी आवाज में एक अजीब सी थकान और झुंझलाहट थी। दूसरी तरफ से सुमित्रा की खनकती हुई शांत आवाज आई, “मैं बिल्कुल ठीक हूँ दीदी, आप कैसी हैं? बहुत दिनों बाद आपने फोन किया। सब घर में कुशल … Read more

अपने ही घर में अजनबी

रोहन जैसे ही थका-हारा दफ्तर से घर लौटा, सोफे पर बैठी उसकी पत्नी रिया का पारा सातवें आसमान पर था। रोहन ने अभी अपने जूतों के फीते खोले ही थे कि रिया की तीखी आवाज पूरे ड्रॉइंग रूम में गूंज उठी, “मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती रोहन! तुम्हारी माँ से एक छोटा सा … Read more

एक अनकही दूरी

सावित्री देवी के कमरे की खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप भी आज उनके चेहरे की उदासी को कम नहीं कर पा रही थी। उनके हाथ में फोन था और दूसरी तरफ उनकी छोटी बहन लता थी। सावित्री देवी भारी आवाज़ में कह रही थीं, “सच ही कहती थी तू लता, जब तक बेटा … Read more

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