वक्त की अहमियत और सच्चे रिश्ते

“अरे समधी जी, आपको और सुधा जी को इस बार कोई बहाना नहीं बनाना है। मेरी बहू की गोदभराई की रस्म है, पहला बच्चा आने वाला है घर में। आप लोगों को तो कम से कम एक हफ्ता पहले आना पड़ेगा। घर में इतनी रौनक होगी, और आपके बिना सब सूना लगेगा।”

सुमित्रा देवी फोन पर बड़ी ही मिठास और मनुहार के साथ अपने समधी, मास्टर रमाकांत जी से बात कर रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी और आवाज़ में जरूरत से ज्यादा अपनत्व झलक रहा था।

पास ही बैठी उनकी बहू मीरा यह सब सुन रही थी। उसने जब सुमित्रा देवी के हाथ से फोन लिया तो दूसरी तरफ से उसके पिता की संकोच भरी आवाज़ आई, “बेटा, तुम्हारी माँ के घुटनों में आजकल बहुत दर्द रहता है। एक हफ्ता पहले आकर हम वहां क्या करेंगे? बस रस्म वाले दिन सुबह पहुँच जाएंगे। तुम अपनी सास को समझा देना।”

मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आपको और माँ को जब सुविधा हो, तभी आइएगा। यहाँ कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है। आप आराम से रस्म वाले दिन ही आ जाना। मैं माँ जी को संभाल लूंगी।”

फोन कटने के बाद सुमित्रा देवी का चेहरा थोड़ा उतर गया। उन्होंने मायूस होते हुए कहा, “देखा बहू, मैंने इतनी मिन्नतें कीं, फिर भी तुम्हारे पापा ने मेरी बात नहीं मानी। कम से कम चार दिन पहले आ जाते तो रिश्तेदारों में भी थोड़ा अच्छा लगता।”

मीरा खामोश रही। वह जानती थी कि सुमित्रा देवी की यह मायूसी और यह मनुहार असली नहीं है। इंसान का स्वभाव कभी-कभी कितनी जल्दी बदल जाता है, खासकर तब जब सामने वाले की हैसियत बदल जाए। आज जो सास उसके माता-पिता को बुलाने के लिए इतनी बेचैन हैं, कुछ साल पहले तक वह उनके नाम से भी चिढ़ती थीं। मीरा की आँखों के सामने अपने बीते हुए कल के वे पन्ने खुलने लगे, जिन्हें वह अक्सर भुला देने की कोशिश करती थी।

मीरा की शादी जब सुमित्रा देवी के बेटे आकाश से हुई थी, तब उसके पिता रमाकांत जी एक साधारण से सरकारी स्कूल के प्राइमरी टीचर थे। परिवार में मीरा के अलावा उसका एक छोटा भाई नमन था, जो उस समय सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था। एक शिक्षक की बंधी-बंधाई तनख्वाह में घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई ही मुश्किल से हो पाती थी। फिर भी, रमाकांत जी ने अपनी जीवन भर की जमापूंजी लगाकर मीरा की शादी बड़ी ही धूमधाम से की थी। उन्होंने अपनी क्षमता से बढ़कर दहेज भी दिया था, लेकिन सुमित्रा देवी की लालची आँखों को वह सब बहुत कम लगा था।

विदाई के अगले ही दिन से सुमित्रा देवी के तानों का सिलसिला शुरू हो गया था। “अरे, यह कैसे हल्के गहने दिए हैं तुम्हारे बाप ने! हमारी तो नाक ही कट गई बिरादरी में। इससे अच्छा तो शादी में कुछ देते ही नहीं। और ये कपड़े? सूती साड़ियां पहनकर मैं क्या किसी के सामने जाऊंगी?” ये शब्द मीरा के दिल को किसी तीर की तरह चुभते थे। वह चुपचाप रसोई के कोने में जाकर आंसू बहा लेती थी, लेकिन कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी।

आकाश एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। वह स्वभाव से अच्छा था, लेकिन अपनी माँ के सामने कुछ बोलने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। वह मीरा की तकलीफ समझता था, पर उसे लगता था कि समय के साथ माँ खुद ही शांत हो जाएंगी। मीरा भी अपने माता-पिता को कभी इन बातों की भनक नहीं लगने देती थी। वह जानती थी कि अगर उसके पिता को पता चला कि उनकी बेटी ससुराल में कितनी तकलीफ में है, तो वे जीते-जी मर जाएंगे। वे वैसे ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, मीरा उन्हें मानसिक रूप से और परेशान नहीं करना चाहती थी।

त्योहारों पर जब मीरा के माता-पिता उससे मिलने आते, तो वे अपने साथ फल और मिठाइयां लाते। लेकिन सुमित्रा देवी उन चीजों को देखकर मुंह बना लेती थीं। “लो, आ गए खाली हाथ। कम से कम अपनी बेटी के ससुराल आ रहे हैं, तो कुछ ढंग का तो लेकर आते,” वह बुदबुदाती थीं, जिसे मीरा साफ सुन लेती थी। इन सब के बावजूद, मीरा ने कभी अपने संस्कारों को नहीं छोड़ा। उसने पूरे घर की जिम्मेदारी उठा ली और अपनी सास की हर कड़वी बात का जवाब अपनी सेवा और मीठे व्यवहार से दिया।

लेकिन कहते हैं न, वक्त का पहिया हमेशा घूमता है। भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। मीरा की शादी के चौथे साल में अचानक उसके मायके के दिन फिर गए। उसके छोटे भाई नमन ने अपनी कड़ी मेहनत से यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा पास कर ली और वह आईपीएस (IPS) अधिकारी बन गया। इस खबर ने जैसे मीरा के परिवार की किस्मत ही बदल दी। इतना ही नहीं, रमाकांत जी के पुश्तैनी गांव की जो ज़मीन सालों से बंजर पड़ी थी, वह सरकार के एक नए हाइवे प्रोजेक्ट में आ गई। सरकार की तरफ से उन्हें उस ज़मीन का इतना भारी मुआवजा मिला कि वे रातों-रात करोड़पति बन गए।

एक साधारण से प्राइमरी टीचर से लेकर एक आईपीएस अधिकारी के पिता और एक संपन्न व्यक्ति बनने तक का यह सफर चमत्कारी था। जैसे ही इस बात की खबर सुमित्रा देवी को लगी, उनके रंग-ढंग ही बदल गए। जिस बहू को वह कल तक ‘गरीब की बेटी’ और ‘पनौती’ कहकर कोसती थीं, वही बहू आज उनके लिए घर की ‘लक्ष्मी’ बन गई थी।

अब अगर मीरा गलती से भी कोई काम करने उठती, तो सुमित्रा देवी दौड़कर उसे रोक देतीं। “अरे बहू, तू क्यों परेशान होती है! नौकरानी किसलिए है? तू बैठ आराम से।” अब त्योहारों पर जब मीरा के माता-पिता आते, तो सुमित्रा देवी उनके लिए चांदी के बर्तनों में नाश्ता लगातीं और मोहल्ले भर में घूम-घूम कर बतातीं, “मेरे समधी जी आए हैं, मेरा छोटा दामाद तो बड़ा पुलिस अफसर है।”

मीरा को यह सब देखकर हंसी भी आती थी और दुख भी होता था। उसे समझ आ गया था कि इस दुनिया में लोग इंसान की नहीं, बल्कि उसकी हैसियत और उसके पैसों की इज्जत करते हैं। आज जब उसके हाथ में पैसा और रुतबा है, तो सब अपने हो गए हैं। लेकिन उसने कभी अपनी सास को ताना नहीं मारा। वह जैसी कल थी, वैसी ही आज भी शांत और गंभीर थी।

मीरा विचारों की इस दुनिया से तब बाहर आई जब आकाश ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “क्या सोच रही हो मीरा? माँ की बातों का बुरा मत मानना। तुम जानती हो न कि वो दिखावे को कितना पसंद करती हैं। अब तुम्हारे पापा इतने बड़े आदमी हो गए हैं, तो वो चाहती हैं कि सब रिश्तेदारों को पता चले।”

मीरा ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “मैं बुरा नहीं मान रही आकाश। बस यही सोच रही हूँ कि अगर मेरे पापा आज भी वही प्राइमरी टीचर होते, तो क्या आज भी मुझे और मेरे परिवार को यह सम्मान मिलता?” आकाश के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। उसने बस मीरा का हाथ थाम लिया।

आखिरकार गोदभराई का वह शुभ दिन आ ही गया। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था। रिश्तेदार और मोहल्ले की औरतें जमा हो गई थीं। सुमित्रा देवी अपनी रेशमी साड़ी में सजी-धजी सबको निर्देश दे रही थीं। तभी दरवाजे पर एक बड़ी सी गाड़ी रुकी और उसमें से मास्टर रमाकांत जी और सुधा जी उतरे।

सुमित्रा देवी दौड़कर दरवाजे पर गईं। “आइए, आइए समधी जी! हम तो बस आप ही का इंतजार कर रहे थे। देखिए न, मैंने सबको बता रखा है कि आप आने वाले हैं।” उन्होंने बड़े ही गर्व से आसपास खड़ी औरतों की तरफ देखते हुए कहा।

रमाकांत जी ने हाथ जोड़कर सबको नमस्कार किया। उनके हाथ में कोई बड़ा सा गिफ्ट बॉक्स या महंगे जेवर नहीं थे। उन्होंने एक छोटा सा लिफाफा और शगुन की एक थाली पकड़ी हुई थी। सुमित्रा देवी को थोड़ी निराशा हुई, लेकिन उन्होंने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी।

जब रस्म शुरू हुई और मीरा को बीच में बैठाया गया, तो सभी लोग अपनी-अपनी तरफ से उसे सोने-चांदी के उपहार देने लगे। सुमित्रा देवी बार-बार रमाकांत जी की तरफ देख रही थीं कि अब वह क्या बड़ा उपहार निकालेंगे, ताकि वह पूरे समाज के सामने इतरा सकें।

रमाकांत जी उठे और अपनी बेटी के पास गए। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा, उसे आशीर्वाद दिया और फिर सुमित्रा देवी की तरफ मुड़े। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटी सी डिब्बी निकाली और सुमित्रा देवी के हाथ में रख दी। सुमित्रा देवी ने उत्सुकता से उसे खोला, तो उसमें चांदी का एक बहुत ही साधारण और पुराना सा सिक्का था। यह वही सिक्का था जो मीरा की शादी के समय रमाकांत जी ने सुमित्रा देवी को दिया था और जिसे उन्होंने गुस्से में ‘सस्ते पीतल का टुकड़ा’ कहकर फेंक दिया था। मीरा ने उसे चुपचाप उठाकर संभाल लिया था और आज शायद उसने ही अपने पिता को यह वापस दिया था।

सुमित्रा देवी का चेहरा फक पड़ गया। वहां मौजूद रिश्तेदारों में भी कानाफूसी होने लगी।

तभी रमाकांत जी ने बहुत ही शांत और गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया। “बहन जी, मुझे पता है आप सोच रही होंगी कि आज मेरे पास इतना पैसा है, मेरा बेटा एक बड़ा अधिकारी है, फिर भी मैंने अपनी बेटी को यह साधारण सा सिक्का क्यों दिया। क्योंकि मैं आज आपको और यहां मौजूद सबको एक बात बताना चाहता हूँ।”

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। रमाकांत जी ने आगे कहा, “जब मेरी हैसियत कुछ नहीं थी, तब भी मेरी बेटी सोने जैसी थी। उसके संस्कार, उसकी सहनशीलता और उसका प्रेम ही हमारी असली दौलत थी। यह चांदी का सिक्का उस वक्त मेरी जीवन भर की कमाई का प्रतीक था। आज हमारे पास करोड़ों रुपये आ गए हैं, रुतबा आ गया है, लेकिन मेरी बेटी आज भी वही है। पैसा तो आज है, कल नहीं रहेगा। रुतबा भी समय के साथ ढल जाएगा। लेकिन जो प्रेम, सम्मान और रिश्ते हम बुरे वक्त में कमाते हैं, वही जीवन भर साथ चलते हैं।”

उन्होंने हाथ जोड़कर सुमित्रा देवी से कहा, “बहन जी, आपने मेरी बेटी को अपने घर की बहू बनाया, उसे इस लायक समझा कि वह आपके वंश को आगे बढ़ा सके, यही हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार है। मैं चाहता हूँ कि आप मेरी बेटी को उसकी हैसियत से नहीं, बल्कि उसके दिल से अपनाएं। क्योंकि पैसा तो रिश्ते खरीद सकता है, लेकिन सच्चा प्यार और सम्मान नहीं।”

रमाकांत जी के इन शब्दों ने जैसे सुमित्रा देवी के मन के सारे जाले साफ कर दिए। उन्हें अचानक अपने उस बुरे बर्ताव की याद आ गई, जो उन्होंने सालों तक मीरा के साथ किया था। उन्हें याद आया कि कैसे मीरा ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, कैसे उसने उनके हर तंज को सहा और फिर भी उनकी बीमारी में रात-रात भर जागकर उनकी सेवा की। उनके करोड़ों के बैंक बैलेंस ने नहीं, बल्कि मीरा के संस्कारों ने इस घर को जोड़कर रखा था।

सुमित्रा देवी की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्हें अपने लालच और घमंड पर बहुत शर्म आ रही थी। वह आगे बढ़ीं और उन्होंने रमाकांत जी के हाथ जोड़ लिए। “मुझे माफ कर दीजिए समधी जी। मैं सच में पैसों की चकाचौंध में अंधी हो गई थी। मैंने कभी अपनी बहू के असली मोल को नहीं समझा। मुझे लगता था कि पैसा ही सब कुछ है, लेकिन आज आपने मेरी आंखें खोल दीं।”

उन्होंने मीरा को गले से लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगीं। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। तू सच में इस घर की लक्ष्मी है, पैसों की वजह से नहीं, बल्कि अपने गुणों की वजह से। आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी सगी बेटी है। और यह मेरा घमंड नहीं, मेरा प्रायश्चित बोल रहा है।”

मीरा ने भी रोते हुए अपनी सास को गले लगा लिया। आज पहली बार उसे उस घर में सच में अपनापन महसूस हो रहा था। आकाश की आंखों में भी आंसू थे। उसने अपनी पत्नी और मां को एक साथ इस तरह देखकर ईश्वर का धन्यवाद किया।

उस दिन के बाद से सुमित्रा देवी पूरी तरह बदल गईं। अब उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मीरा के मायके वाले क्या लाए हैं और क्या नहीं। वे बस इस बात से खुश रहती थीं कि उनका परिवार एक साथ है।

पैसों का अहंकार टूट चुका था और सच्चे रिश्तों की नींव अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई थी। आखिरकार, सुमित्रा देवी समझ चुकी थीं कि इंसान की असली पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और संस्कारों से होती है।

आपको क्या लगता है? क्या आज के समाज में लोग इंसान से ज्यादा पैसों को अहमियत देते हैं? क्या सुमित्रा देवी का यह बदलाव सच्चा था? अपने विचार हमारे साथ ज़रूर बांटें।

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लेखिका : मीरा महेश 

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