मालती की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। ये दुख के आंसू नहीं थे, बल्कि बरसों से मन के किसी कोने में दबी हुई उस प्यास के बुझने के आंसू थे, जो एक औरत सिर्फ अपने परिवार के प्यार और सम्मान के लिए महसूस करती है। उसने रमेश की तरफ देखा, जिनकी आँखों में भी आज एक अजीब सी नमी और आत्मीयता थी।
“आपको… आपको यह सब करने की क्या जरूरत थी?” मालती ने रुंधे हुए गले से कहा। “मैं तो बस चाय बना रही थी…”
“जरूरत थी मालती,” रमेश ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा। “एक औरत अपना घर सजाने में, परिवार को संवारने में अपनी पूरी जवानी और अपने सारे शौक कुर्बान कर देती है। और हम पुरुष, यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि यह तो उसका काम है। मैंने बत्तीस सालों तक तुम्हारी इस मेहनत को अपनी आदत बना लिया था। लेकिन आज मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा वजूद कुछ भी नहीं है। यह घर, यह परिवार, ये बच्चे—सब तुम्हारी देन हैं।”
भोर की पहली किरण ने जब रोशनदान से छनकर कमरे में दस्तक दी, तो मालती की आँखें खुद-ब-खुद खुल गईं। आज हवा में एक अजीब सी ताजगी थी। आमतौर पर मालती की सुबह अलार्म की कर्कश आवाज़, बच्चों के टिफिन की चिंता और पति की चाय की फिक्र के साथ शुरू होती थी। लेकिन आज, न जाने क्यों, उसके मन में एक अजीब सी शांति और उमंग थी। उसने करवट ली और अपने पति, रमेश की ओर देखा। रमेश गहरी नींद में सो रहे थे, उनके माथे पर उम्र और जिम्मेदारियों की कुछ लकीरें साफ झलक रही थीं। मालती के चेहरे पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। पिछले बत्तीस सालों से यह इंसान उसके सुख-दुख का साथी रहा था। जीवन की आपाधापी में दोनों के बीच का वो जवां प्यार कहीं पीछे छूट गया था, और उसकी जगह आदतों और जिम्मेदारियों ने ले ली थी। लेकिन आज, मालती को अपने भीतर वही पुरानी, नई-नवेली दुल्हन वाली एक हल्की सी सिहरन महसूस हो रही थी।
उसने धीरे से अपने बिखरे बालों को संवारा, चेहरे पर एक मधुर मुस्कान लाई और रमेश के कंधे को हल्के से हिलाते हुए बड़े प्यार से बोली, “उठिए जी… सुप्रभातम्।”
रमेश ने नींद में डूबी हुई अपनी आँखें आधी खोलीं। सामने मालती को इतने प्यार से मुस्कुराते हुए देखकर वह थोड़ा सकपका गए। रोज सुबह “जल्दी उठिए, देर हो रही है” सुनने वाले रमेश को आज की यह मीठी आवाज़ किसी अजूबे से कम नहीं लगी। उन्होंने नज़र तिरछी करके, ऊँघते हुए मालती की तरफ देखा और अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज़ में बोले, “गजब! आज सुबह-सुबह मेरी चंडी, अचानक यह साक्षात् लक्ष्मी कैसे बन गई? कहीं आज सूरज पश्चिम से तो नहीं निकला?”
“धत्त! इस उम्र में भी आप अच्छा मज़ाक कर लेते हैं।” मालती शर्मा गई। उसने अपने आँचल से चेहरे को हल्का सा ढँकते हुए, बिल्कुल उसी तरह नखरे से कहा जैसे वह शादी के शुरुआती दिनों में किया करती थी। “जल्दी से फ्रेश हो जाइए, मैं आपके लिए अदरक और इलायची वाली कड़क चाय बना कर लाती हूँ।”
“वाऊ! आज तो सच में चमत्कार हो गया। सावन की झड़ी में वसंत का अहसास!” रमेश मुस्कुराते हुए बिस्तर से उठे और वाशरूम की ओर बढ़ गए। मालती भी एक अलग ही ऊर्जा के साथ अपनी चप्पलें पहनकर रसोई की तरफ चल दी।
रसोई… यह जगह मालती के जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा थी। पिछले बत्तीस सालों में इस घर के रंग बदले, परदे बदले, बच्चों के कमरे बदले, लेकिन मालती की दुनिया इसी रसोई के इर्द-गिर्द घूमती रही। उसने गैस जलाई, पैन में पानी रखा और उसमें चायपत्ती और चीनी डालने लगी। बाहर से चिड़ियों की चहचहाहट आ रही थी। सब कुछ कितना सामान्य और शांत था।
लेकिन तभी, अचानक एक गहरी, भारी और बेहद रूमानी आवाज़ गूंजी, “बत्तीस साल… पूरे बत्तीस साल हो गए तुम्हें देखते-देखते। सच कहूँ तो, रोज तुम्हें इस तरह काम करते देख कर मुझे तुमसे गहरा प्यार हो गया है। और एक तुम हो… जो मेरी कोई परवाह ही नहीं करती।”
मालती के हाथ से चायपत्ती का डिब्बा छूटते-छूटते बचा। वह बुरी तरह चौंक गई। उसने घबराकर चारों तरफ देखा। रसोई में उसके सिवा कोई नहीं था। खिड़की के बाहर भी सिर्फ पेड़-पौधे थे।
आवाज़ फिर से आई, और इस बार उसमें एक अजीब सी शिकायत थी, “दिन भर तुम मेरे साथ रहती हो, मेरी हर चीज का ख्याल रखती हो, लेकिन जैसे ही तुम्हारा काम खत्म होता है, तुम लाइट बंद करके एक निर्मोही की तरह सीधे अपने शयनकक्ष में चली जाती हो। मैं यहाँ अकेले, इस घने अँधेरे में… रात भर तुम्हारा इंतज़ार करता रहता हूँ, और तुम मुड़कर देखती भी नहीं!”
मालती का दिल जोर से धड़कने लगा। यह आवाज़ किसी अजनबी की नहीं लग रही थी, लेकिन यह रमेश की आवाज़ भी नहीं थी। यह आवाज़ बहुत ही नाटकीय और किसी फिल्मी हीरो जैसी थी। मालती, जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर अपनी जिंदगी की नीरसता से समझौता कर चुकी थी, अचानक इस अप्रत्याशित घटना से बिफर पड़ी।
“अरे… कौन हो तुम? सामने तो आओ!” मालती ने अपने हाथ में बेलन उठाते हुए थोड़ा डर और थोड़ा गुस्से में कहा। “बत्तीस साल से पति भी मेरा यह थका-हारा चेहरा देख-देखकर ऊब गए हैं। बच्चों को भी अब मुझमें सिर्फ खामियाँ ही नजर आने लगी हैं—’मम्मी आपको कपड़े पहनने का ढंग नहीं’, ‘मम्मी आपको तो दुनियादारी की समझ नहीं’। परिवार वालों के लिए तो मैं सिर्फ एक मशीन बन गई हूँ… और तुम्हारा प्यार अचानक परवान चढ़ गया? वाह! सामने आओ, अभी बताती हूँ तुम्हें!”
आवाज़ में एक हल्की सी हँसी गूंजी और जवाब आया, “सच कहता हूँ मालती, तुम मुझे पहले से भी कहीं अधिक सुंदर और सुघड़ लगने लगी हो। तुम्हारे चेहरे की ये झुर्रियां तुम्हारे त्याग की कहानी कहती हैं। तुम्हारी ये थकी हुई आँखें इस घर को रोशन करती हैं। तुम खुद को भूल गई हो, इसीलिए तुम्हें लगता है कि सब तुम्हें भूल गए हैं। मुझसे… यानी खुद से जितना अधिक प्यार करोगी, घर के बाकी लोग भी तुमसे उतना ही अधिक प्यार करेंगे।”
मालती झुंझला गई। “आज कोई ‘फ्रेंडशिप-डे’ या ‘एप्रिल-फूल’ नहीं है….समझे? अभी देखती हूँ, कौन पागल सुबह-सुबह मेरे ही घर में छुपकर ऐसी बातें कर रहा है!” वह बड़बड़ाती हुई ताक पर रखे कप को उतारने के लिए मुड़ी। जैसे ही उसने डब्बे हटाए, उसकी नज़र एक छोटे से, नीले रंग के ब्लूटूथ स्पीकर पर पड़ी जो चायपत्ती के डिब्बों के पीछे बड़ी चालाकी से छुपाया गया था।
मालती ने वह स्पीकर हाथ में लिया। तभी रसोई के दरवाजे पर तालियों की गड़गड़ाहट हुई। मालती ने पलटकर देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
दरवाजे पर रमेश खड़े थे, जिन्होंने एक बहुत ही सुंदर सूट पहन रखा था। उनके एक हाथ में लाल गुलाबों का एक बड़ा सा गुलदस्ता था और दूसरे हाथ में उनका मोबाइल फोन, जिससे वह उस ब्लूटूथ स्पीकर पर आवाज़ बदल कर बोल रहे थे। उनके पीछे उनका बेटा रोहन और बेटी श्रुति खड़े थे, जिनके हाथों में एक बड़ा सा केक और कुछ उपहार थे।
“हैप्पी एनिवर्सरी, मेरी चँद्रमुखी!” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
मालती पूरी तरह सुन्न रह गई। आज उनकी शादी की बत्तीसवीं सालगिरह थी। घर के रोजमर्रा के कामों और बच्चों की उलझनों में वह खुद इस दिन को भूल चुकी थी। उसे लगा था कि रमेश भी हर साल की तरह इस साल भी बस एक सूखा सा ‘हैप्पी एनिवर्सरी’ कहकर ऑफिस चले जाएंगे।
रमेश आगे बढ़े और गुलाब का गुलदस्ता मालती के हाथों में थमा दिया। “मालती, यह आवाज़ किसी अजनबी की नहीं थी, बल्कि तुम्हारे इस घर की थी, तुम्हारी रसोई की थी, और सबसे बढ़कर… मेरे उस दिल की थी जो बत्तीस सालों से तुम्हारे प्यार और समर्पण को महसूस तो कर रहा था, लेकिन कभी लफ्जों में बयां नहीं कर पाया।”
श्रुति ने आगे बढ़कर अपनी माँ को गले लगा लिया। “सॉरी मम्मी! हम बड़े हो गए, अपनी जिंदगी और करियर में इतने व्यस्त हो गए कि हमने कभी यह देखा ही नहीं कि आप हमारे लिए क्या कुछ नहीं करतीं। हम आप में कमियां निकालते थे, क्योंकि हम सोचते थे कि आप तो हमारी अपनी हैं, आपको क्या बुरा लगेगा। लेकिन पापा ने कल रात हमें एहसास दिलाया कि इस घर की असली नींव आप हैं।”
रोहन ने भी अपनी माँ के कंधे पर सिर रख दिया। “हाँ माँ, आप दिन भर हमारे लिए थकती हैं, और हम रात को आपको बिना एक ‘थैंक यू’ कहे सोने चले जाते हैं। वो जो स्पीकर से आवाज़ आई न… वो दरअसल हम सबकी दबी हुई भावनाएं थीं। हम सच में आपसे बहुत प्यार करते हैं माँ। आप जैसी हैं, दुनिया की सबसे खूबसूरत और परफेक्ट इंसान हैं।”
मालती की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। ये दुख के आंसू नहीं थे, बल्कि बरसों से मन के किसी कोने में दबी हुई उस प्यास के बुझने के आंसू थे, जो एक औरत सिर्फ अपने परिवार के प्यार और सम्मान के लिए महसूस करती है। उसने रमेश की तरफ देखा, जिनकी आँखों में भी आज एक अजीब सी नमी और आत्मीयता थी।
“आपको… आपको यह सब करने की क्या जरूरत थी?” मालती ने रुंधे हुए गले से कहा। “मैं तो बस चाय बना रही थी…”
“जरूरत थी मालती,” रमेश ने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा। “एक औरत अपना घर सजाने में, परिवार को संवारने में अपनी पूरी जवानी और अपने सारे शौक कुर्बान कर देती है। और हम पुरुष, यह सोचकर निश्चिंत हो जाते हैं कि यह तो उसका काम है। मैंने बत्तीस सालों तक तुम्हारी इस मेहनत को अपनी आदत बना लिया था। लेकिन आज मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा वजूद कुछ भी नहीं है। यह घर, यह परिवार, ये बच्चे—सब तुम्हारी देन हैं।”
रोहन ने केक रसोई के स्लैब पर रखा। “मम्मी, आज से इस रसोई में आपका एकाधिकार खत्म! आज आपकी एनिवर्सरी पर हमने फैसला किया है कि हम सब मिलकर घर का काम बाँटेंगे। आप भी अपने लिए जिएंगी, अपनी सहेलियों से मिलेंगी, और अपने उन शौक को पूरा करेंगी जो आपने हमारे लिए छोड़ दिए थे।”
मालती ने भरे हुए मन और मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ केक काटा। उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। वह रसोई, जो अब तक उसे एक कैद या सिर्फ एक जिम्मेदारी लगती थी, आज प्यार और सम्मान के सबसे खूबसूरत गवाह में बदल गई थी। उसे समझ आ गया था कि उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, प्यार और सम्मान के चंद शब्द किसी भी नीरस जीवन में दोबारा बसंत ला सकते हैं। परिवार का प्यार कभी खत्म नहीं होता, बस कभी-कभी उसे अभिव्यक्त करने के लिए एक छोटे से ‘ब्लूटूथ स्पीकर’ या एक पहल की जरूरत होती है।
आज सूरज की किरणें रसोई में और भी अधिक सुनहरी लग रही थीं। मालती ने एक गहरी सांस ली, और अपने परिवार को एक साथ, खुश और अपने लिए इतना समर्पित देखकर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया। आज वह सिर्फ एक पत्नी या माँ नहीं थी, वह सचमुच में इस घर की रानी थी, जिसका ताज उसका अपना परिवार था।
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लेखिका : नीलू थापर