विदाई के आँसुओं और सिसकियों के बीच जब तन्वी कार में बैठने लगी, तो उसकी मामी ने उसका हाथ थामकर कान में धीरे से कहा था, “देख तन्वी, लोग चाहे कुछ भी कहें, पर तू बहुत भाग्यशाली है। ससुराल में कोई सास नहीं है जो सुबह चार बजे जगाए या बात-बात पर नुक्स निकाले। बस ससुर जी हैं, वो अपनी दुनिया में मस्त रहते हैं। पूरे घर पर तेरा एकछत्र राज होगा। अपनी मर्ज़ी से उठना, अपनी मर्ज़ी से पहनना। कोई टोकने वाला नहीं होगा।”
तन्वी ने उस वक्त घूँघट की ओट से अपनी मामी की बात सुनकर बस एक हल्की सी गर्दन हिला दी थी, लेकिन उसके सीने में एक अजीब सी टीस उठी थी। क्या सचमुच सास का न होना किसी लड़की के लिए सौभाग्य की बात होती है? दुनिया ने सास-बहू के रिश्ते को हमेशा एक अंतहीन महाभारत के रूप में ही क्यों देखा है? क्या किसी घर की नींव में उस बुज़ुर्ग औरत की डाँट और दुलार की कोई ज़रूरत नहीं होती?
गाड़ी जब तन्वी के नए घर की चौखट पर रुकी, तो बाहर का नज़ारा बड़ा शांत था। उसके पति कुणाल के पिता, दीनानाथ जी, हाथ में आरती की थाली लिए खड़े थे। कुणाल की माँ का देहांत चार साल पहले ही अचानक दिल का दौरा पड़ने से हो गया था। मकान शहर के पॉश इलाके में दो मंजिला, संगमरमर के फर्श और नक्काशीदार दरवाज़ों वाला एक भव्य आशियाना था। लेकिन जैसे ही तन्वी ने लाल आलता से भरे थाल में पैर रखकर घर की दहलीज पार की, उसे एक अजीब सी ठंडक और सन्नाटे ने घेर लिया।
वह घर बहुत साफ-सुथरा था, लेकिन उसमें एक बेजान सा ठहराव था। ऐसा लगा मानो दीवारों पर जो रंग है, वह सिर्फ सीमेंट को छिपाने के लिए है, उनमें कोई गर्माहट नहीं थी। कोई ऐसी ममतामयी आँखें नहीं थीं जो उसके रूप की नज़र उतारतीं, न ही कोई काँपते हुए हाथ थे जो उसके सिर पर पल्लू ठीक करते हुए कहते, “मेरी गृहलक्ष्मी आ गई।” दीनानाथ जी ने बहुत ही संकोच के साथ आरती उतारी, अक्षत छिड़का और अपनी मर्यादा में रहते हुए एक कदम पीछे हट गए। एक पुरुष के लिए सास की उन पारंपरिक और ममतालु रस्मों को निभाना कितना असहज था, यह उनके चेहरे के भाव साफ बयाँ कर रहे थे। तन्वी को कमरे में पहुँचा दिया गया। मामी की वह ‘राज करने’ वाली बात अब तन्वी को किसी विशाल, ठंडे और वीरान महल में अकेले बंद हो जाने जैसी लग रही थी।
शादी के शुरुआती पंद्रह दिन एक अजीब सी औपचारिकता में बीते। कुणाल सुबह अपने दफ्तर चला जाता, ससुर जी सुबह की सैर के बाद अपने कमरे में चले जाते या अखबार में खो जाते। दोपहर के वक्त वह बड़ा सा घर तन्वी को काटने दौड़ता। ससुर जी कभी पानी का एक गिलास भी खुद माँगते नहीं थे, बल्कि संकोच के मारे खुद रसोई में जाकर ले आते। तन्वी दौड़कर उनके हाथ से गिलास लेती तो वो बस इतना कहते, “अरे बहू, तुम क्यों परेशान होती हो।” उस घर में कोई रोक-टोक नहीं थी, कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन उस बेपनाह आज़ादी में एक ऐसा अकेलापन था जो तन्वी के मन को भारी कर देता था। वह अपनी माँ से फोन पर बात करती तो हँसने का नाटक करती, पर मन ही मन सोचती कि काश कोई होता जो उसे बताता कि रसोई के मसाले किस डिब्बे में हैं, या बाबूजी को चाय में अदरक कितनी पसंद है।
शादी के तीसरे हफ्ते कुणाल की बड़ी बहन, अंजलि दीदी, अपने पति और आठ साल के बेटे के साथ मायके आईं। अंजलि दीदी के कदम रखते ही घर की खामोशी जैसे टूट गई। बच्चे की भागदौड़ और दीदी की खिलखिलाहट से दीवारों में थोड़ी जान लौट आई। तन्वी के मन में भी एक उम्मीद की किरण जगी कि चलो, घर में किसी दूसरी औरत की मौजूदगी से यह सूनापन मिटेगा।
तन्वी ने उस दिन सुबह छह बजे से ही रसोई की कमान संभाल ली थी। उसने अपनी माँ से फोन पर रेसिपी पूछकर और इंटरनेट पर कई वीडियो देखकर बेहद खास मेन्यू तैयार किया। कश्मीरी दम आलू, मलाई कोफ्ता, बूंदी का रायता, केसरिया पुलाव और मीठे में गरमा-गरम बादाम का हलवा। उसने हर व्यंजन को सजाकर डाइनिंग टेबल पर लगाया। वह चाहती थी कि दीदी और जीजा जी को महसूस हो कि अब यह घर किसी होटल की तरह नहीं, बल्कि एक भरा-पूरा परिवार बन चुका है।
रात के भोजन पर जब सब लोग मेज़ पर बैठे, तो अंजलि दीदी ने पहला निवाला मुँह में रखते ही तन्वी की तरफ देखा और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने आगे बढ़कर तन्वी का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
“तन्वी, सच कहूँ तो माँ के जाने के बाद मैं इस घर में आने से कतराने लगी थी,” अंजलि दीदी की आवाज़ रुंध गई थी। “पापा अकेले थे, कुणाल अपनी नौकरी में उलझा था। जब भी मैं मायके आती, तो यह घर मुझे काटने को दौड़ता था। हर कोने में माँ की कमी मुझे रुला देती थी। लेकिन आज तुम्हारे हाथों के इस खाने ने और तुम्हारे इस सलीके ने मुझे यकीन दिला दिया है कि मेरा मायका फिर से ज़िंदा हो गया है। अब तुम आ गई हो, तो मुझे निश्चिंतता हो गई है। अब तुम्हीं को माँ बनकर इस पूरे घर को संभालना है, पापा का ध्यान रखना है।”
तन्वी ने होठों पर एक संकोची मुस्कान लाकर हामी तो भर दी, लेकिन उस एक पल में उसके कंधों पर जैसे मन भर का भारी बोझ आ गिरा। ‘माँ बनकर घर संभालना है’… यह वाक्य उसके ज़हन में गूँजने लगा। वह तो अभी खुद बाईस-तेईस साल की एक लड़की थी, जो खुद अपने मायके में माँ के आँचल की छाँव में पली थी। उसने तो अभी दुनिया को ठीक से समझा भी नहीं था, और अचानक उससे एक ऐसी बुज़ुर्ग माँ की जगह लेने की उम्मीद की जा रही थी, जिसने अपनी ज़िंदगी के चालीस साल इस परिवार को सींचने में लगा दिए थे।
अगले कुछ दिनों में यह उम्मीद एक भारी दबाव में बदलने लगी। अंजलि दीदी जब तक रहीं, वो हर बात पर माँ का ज़िक्र करतीं—”माँ होती तो दाल में थोड़ा सा घी और डालतीं”, “माँ को पता था कि पापा की दवाई का सही वक्त क्या है”, “माँ इस मौसम में सारे ऊनी कपड़े धूप में डाल देती थीं।” दीदी का इरादा तन्वी को नीचा दिखाना नहीं था, वे तो बस अपनी माँ को याद कर रही थीं, लेकिन तन्वी के मन में हर बात एक इम्तिहान की तरह चुभती थी। उसे लगता था कि वह हर कदम पर उस अदृश्य सास की परछाई से हार रही है, जिसे उसने कभी देखा भी नहीं था।
दीदी के जाने के बाद घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया, लेकिन अब तन्वी के मन पर ज़िम्मेदारी का एक अदृश्य पहरा था। वह खुद को साबित करने की होड़ में लग गई। सुबह पाँच बजे उठना, ससुर जी के लिए बिना चीनी की चाय तैयार करना, कुणाल का टिफिन पैक करना, फिर दोपहर में घर की अलमारियों को ठीक करना। इस सब के चक्कर में वह अपनी भूख, अपनी नींद और अपनी सेहत को भूलने लगी।
एक दिन दोपहर को दीनानाथ जी को अचानक चक्कर आ गया और वे सोफे पर गिर पड़े। तन्वी रसोई में थी, आवाज़ सुनकर भागी-भागी आई। ससुर जी का ब्लड प्रेशर बहुत गिर चुका था। तन्वी बुरी तरह घबरा गई। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे। उसने तुरंत कुणाल को फोन मिलाया, लेकिन उसका फोन मीटिंग के चलते कट गया। उस बड़े से घर में, उस दोपहर, तन्वी बिल्कुल अकेली थी। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उस पल उसे लगा कि अगर आज उसकी सास ज़िंदा होती, तो वह घबराती नहीं। सास तुरंत कहती, “बहू, ज़रा नमक-चीनी का घोल बना, मैं इनके सिर पर तेल लगाती हूँ।” सास का साया एक ऐसी छतरी की तरह होता है जो हर तूफ़ान में सबसे पहले आगे आती है। एक नई बहू के लिए सास सिर्फ नियमों की किताब नहीं होती, बल्कि संकट के समय सबसे बड़ा सुरक्षा कवच भी होती है। उस बुजुर्ग महिला के न होने की असली कीमत तन्वी को उस दोपहर समझ में आई।
तन्वी ने हिम्मत जुटाई, अपने आँसू पोंछे और पड़ोस के डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर ने आकर दवा दी और ड्रिप लगाई। शाम तक दीनानाथ जी की तबीयत संभल गई। कुणाल भी बदहवास हालत में घर पहुँचा।
रात को जब घर में सब शांत हो गया, तो तन्वी बालकनी में आकर खड़ी हो गई और फूट-फूट कर रो पड़ी। कुणाल उसके पीछे आया और उसने तन्वी के कंधों पर हाथ रखा।
“क्या हुआ तन्वी? तुम बहुत थकी हुई लग रही हो। आज जो कुछ हुआ, उसके लिए मुझे माफ़ कर दो, मेरा फोन बंद था।”
तन्वी मुड़ी, उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन आवाज़ में एक गहरा दर्द था, “कुणाल, तुम्हारी मामी और मेरी बुआ ने कहा था कि जिस घर में सास नहीं होती, वहाँ बहू राज करती है। पर सच यह है कुणाल कि जिस घर में सास नहीं होती, वहाँ बहू कभी बहू बन ही नहीं पाती। उसे आते ही सीधे ‘माँ’ और ‘मालकिन’ के उस पद पर बिठा दिया जाता है, जिसके लिए वह तैयार ही नहीं होती। मुझे इस घर में किसी ने सिखाया ही नहीं कि मुझे क्या करना है। मैं गलतियाँ करने से डरती हूँ क्योंकि यहाँ मुझे डाँटकर गले लगाने वाली कोई माँ नहीं है। मैं हर पल तुम्हारी माँ की उस विशाल छवि से मुकाबला करने की कोशिश कर रही हूँ, जिसमें मैं कभी जीत नहीं सकती। मुझे आज़ादी नहीं चाहिए कुणाल, मुझे इस घर में एक ऐसा मार्गदर्शन चाहिए था जो मुझे बताता कि मैं भी इस परिवार का एक हिस्सा हूँ, कोई काम निपटाने वाली मशीन नहीं।”
कुणाल अवाक होकर तन्वी को देखता रहा। उसने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। वह तो यही समझता रहा था कि घर में कोई रोक-टोक नहीं है, तो तन्वी खुश ही होगी। उसने तन्वी को अपने सीने से लगा लिया और बोला, “मुझे माफ़ कर दो तन्वी। मैं तुम्हारी इस खामोश लड़ाई को समझ ही नहीं पाया। हमने तुम पर अपनी उम्मीदों का पहाड़ लाद दिया, यह सोचे बिना कि तुम भी किसी की नाज़ों से पली बेटी हो।”
अगली सुबह एक सुखद बदलाव लेकर आई। तन्वी जब रोज़ की तरह जल्दी उठकर रसोई में गई, तो उसने देखा कि दीनानाथ जी पहले से ही वहाँ खड़े थे और चाय के लिए पानी चढ़ा रहे थे।
“बाबूजी! आप क्यों उठे? आपकी तबीयत ठीक नहीं है,” तन्वी ने आगे बढ़कर केतली पकड़नी चाही।
लेकिन दीनानाथ जी ने बड़े प्यार से उसका हाथ हटा दिया और उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। उनके चेहरे पर वही पिता वाली सौम्यता थी।
“बहू, कल रात मैंने बालकनी में तुम्हारी और कुणाल की बातें सुन ली थीं,” दीनानाथ जी की आवाज़ में एक गहरा पछतावा था। “और सच कहूँ तो, मुझे अपनी नासमझी पर बहुत शर्मिंदगी हुई। जब मेरी पत्नी गुज़री, तो मुझे लगा कि इस घर का सबसे बड़ा नुकसान मेरा और मेरे बच्चों का हुआ है। लेकिन आज मुझे समझ आया कि उसकी गैरमौजूदगी का सबसे बड़ा दंश तो तुम झेल रही हो। हमने तुम्हें इस घर की बहू बनाकर लाया, पर तुम्हें कभी बहू बनने का मौका ही नहीं दिया। हमने तुमसे उम्मीद की कि तुम रातों-रात इस घर की छत्रछाया बन जाओ।”
दीनानाथ जी ने चाय के दो कप निकाले और तन्वी से बोले, “चलो, आज बाहर आँगन में बैठकर चाय पीते हैं।”
वे दोनों आँगन में रखी कुर्सियों पर बैठ गए। सुबह की हल्की धूप तुलसी के चौरे पर पड़ रही थी।
दीनानाथ जी ने कहा, “तन्वी बेटा, आज से तुम्हें किसी की जगह लेने की ज़रूरत नहीं है। कुणाल की माँ का अपना स्थान था, और तुम्हारा अपना एक अलग वजूद है। तुम इस घर की सास या माँ बनने की कोशिश मत करो। तुम इस घर की बेटी हो। अगर कभी चाय में चीनी कम हो जाए, तो फिक्र मत करना। अगर किसी दिन देर से सोकर उठने का मन करे, तो आराम से सोना। अगर कभी खाना बिगड़े, तो हम बाहर से मँगवा लेंगे। तुम्हें किसी इम्तिहान में पास होने की ज़रूरत नहीं है। और रही बात घर संभालने की, तो यह सिर्फ तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं है। हम तीनों मिलकर इस घर को चलाएंगे।”
ससुर जी के इन शब्दों ने तन्वी के सीने पर रखा कई मन भारी पत्थर एक पल में हटा दिया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन इस बार वे आँसू अकेलेपन के नहीं, बल्कि अपनेपन और राहत के थे।
उस दिन के बाद से घर की हवा पूरी तरह बदल गई। दीनानाथ जी ने संकोच छोड़ दिया। वे तन्वी को अपनी पुरानी यादें सुनाते, उसे बताते कि बाजार से अच्छी सब्जियाँ कैसे चुनी जाती हैं, और कभी-कभी खुद आगे बढ़कर तन्वी के साथ नाश्ता बनाने में हाथ बँटाते। कुणाल ने भी दफ्तर से जल्दी लौटकर घर के कामों में हाथ बँटाना शुरू किया।
कुछ महीनों बाद जब अंजलि दीदी दोबारा आईं, तो उन्होंने घर में एक अलग ही ऊर्जा महसूस की। रसोई में तन्वी और दीनानाथ जी हँस-हँसकर मटर छील रहे थे, और कुणाल मेज़ सजा रहा था। घर में अब कोई बनावटी सन्नाटा नहीं था, बल्कि रिश्तों की एक सहज और मीठी खनक गूँज रही थी।
अंजलि दीदी ने मुस्कुराते हुए तन्वी से कहा, “भाभी, आज मुझे सच में लग रहा है कि माँ जहाँ भी होंगी, बहुत खुश होंगी। तुमने माँ की जगह नहीं ली, बल्कि तुमने इस घर में अपनी एक ऐसी नई और खूबसूरत जगह बनाई है, जिसने हम सबको फिर से एक कर दिया है।”
तन्वी ने तुलसी के पौधे की तरफ देखा, जिस पर सुबह की ताज़ा ओस चमक रही थी। अब वह आँगन सूना नहीं था। उसने समझ लिया था कि घर ईंट-पत्थरों से या किसी एक व्यक्ति की सत्ता से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को समझने और साथ निभाने से बनता है। जिस सास की कमी ने उसे शुरुआत में डरा दिया था, उसी रिक्तता ने आज पूरे परिवार को एक-दूसरे के और करीब ला दिया था। अब वह उस घर की मालकिन नहीं, बल्कि उस परिवार के दिल की धड़कन बन चुकी थी।
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क्या किसी घर में सास का न होना सचमुच एक बहू के लिए ‘आज़ादी’ होता है, या फिर यह एक ऐसा सूनापन है जो अनकही ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ा देता है? क्या एक नई बहू को आते ही सास की जगह लेने के लिए मजबूर करना सही है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : नमिता पंडित