फुर्सत – प्रतिमा श्रीवास्तव

भाभी आप तो कभी हमारे साथ बैठतीं हीं नहीं है। आखिर हम ननदें हैं आपकी ,थोड़ा बहुत समय हमारे लिए भी निकाल लिया करें। संगीता जिसकी शादी को अभी कुछ ही समय हुए थे।पति रोहित की तीन बहनें और मां – पापा से भरा पुरा परिवार था। जूही बड़ी ननद एम .ए. कर रही थी, … Read more

रिश्तों की जमा-पूंजी – प्रतिमा श्रीवास्तव

पिता जी का देहांत हो गया था और इतनी भीड़ रिश्तेदारों और जान पहचान वालों की थी की गली खचाखच भरी हुई थी। हर किसी की आंखें नम थीं और सब के पास कोई ना कोई बात उनसे जुड़ी हुई थी। हम सब भाई बहन ये सब देखकर ताज्जुब कर रहे थे की पापा ने … Read more

अतिथि देवो भव – प्रतिमा श्रीवास्तव

इंसान दौलत भले ही कम कमाए पर परिवार का साथ हो तो हर तकलीफ से निकल ही जाता है। परिवार ऐसी पूंजी है जिसमें हमें बहुत कुछ लगाना होता है बेटा।सब कुछ सब का है, अपने से पहले अपने परिवार को अहमियत देना और अपनों की खुशी  खुद से पहले सोचना, त्याग, धैर्य, सम्मान और … Read more

परिवार का हाथ पकडकर रखो – मंजू ओमर

चटाक एक जोर का थप्पड़ नन्हे गोलू पर पड़ा, और सोनल जोर से चिल्लाने लगी ये क्या किया तुमने, मेरी पूरी लिपस्टिक खराब कर दी। निकलो मेरे कमरे से बाहर। और गोलू रोता हुआ कमरे से बाहर आकर माँ से लिपट गया। क्या हो गया बेटा मामी ने मारा, मामी ने मारा मगर क्यों, चलो … Read more

सच्ची अमीरी

लॉन में बैठी मालती देवी बुत बनकर यह पूरा नज़ारा देख रही थीं। उनके हाथों में पकड़ी हुई नीली रजाई अब उन्हें कांटों की तरह चुभने लगी थी। उनकी रईसी, उनका बड़ा घर, और उनके महँगे कपड़े—सब कुछ उस गरीब बंजारन के उस एक कृत्य के सामने बौने पड़ गए थे।  दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड … Read more

बहू भी इस घर का हिस्सा है

अंजलि जब लाल जोड़े में सजी-धजी इस घर की चौखट पर आई थी, तो उसकी सास सुमित्रा देवी ने आरती उतारते हुए बहुत ही मीठे स्वर में कहा था, “बहू, आज से यह घर तुम्हारा है। मेरी तो उम्र हो गई है, अब तुम्हें ही यह पूरी गृहस्थी संभालनी है।” उस दिन अंजलि की आँखों … Read more

एक माँ की दूरदर्शिता

दीनानाथ जी के जीवन का एक बहुत बड़ा अध्याय आज समाप्त हो गया था। आज उनकी सरकारी नौकरी का आखिरी दिन था और उनके सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) का एक छोटा सा समारोह घर पर ही रखा गया था। घर में रिश्तेदारों और परिचितों की चहल-पहल थी, लेकिन अब रात के दस बज चुके थे और लगभग … Read more

आँगन की नई धूप

सुमित्रा जी के हाथों में चाय की दो प्यालियां थीं, जिनसे उठती भाप सुबह की शांति में घुल रही थी। आज रविवार था, छुट्टी का दिन। सुमित्रा जी के कदमों की आहट बहुत धीमी थी, मानो वो इस शांत सुबह की लय को तोड़ना नहीं चाहती थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान थी, … Read more

पिता के हिस्से का आसमान

  मीरा कल ही अपने पति के साथ रोहन के नए घर को देखने और कुछ दिन साथ बिताने के लिए आई थी। “तूने बाबूजी को रामेश्वरम और तिरुपति के दर्शन करवा कर बहुत बड़ा पुण्य का काम किया है रोहन,” मीरा ने एल्बम का पन्ना पलटते हुए कहा, जिसमें दीनानाथ जी एक मंदिर के प्रांगण … Read more

“पछतावे का दर्द” – कमलेश आहूजा

नेहा किचन में काम कर रही अपनी नंद प्रिया के पास आई उसे लगा,घर में कोई नहीं है तो यही सही समय है प्रिया से बात करने का क्योंकि फिर उसके जेठ जेठानी आने वाले थे।नेहा की सास के पास ज्यादा तो कुछ था नहीं बस थोड़े बहुत जेवर थे,सो वो भी उन्होंने नेहा को … Read more

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