रिश्तो की जमा पूंजी – सीमा सिंघी

मम्मी जी जब आपका मन क्रोधित होता है तो उस वक्त आप मुझे कुछ भी सुनाने से पीछे नहीं हटती है। यह घर आपका है उतना ही मेरा भी है ।जब आप मुझे प्यार नहीं दे पा रही हो तो मुझसे आप सम्मान की उम्मीद कैसे कर सकती है  मैं आपकी जितनी अनुभवी तो नहीं … Read more

यही तो है रिश्तों की जमा पूंजी – मंजू ओमर

सुनंदा देख रही थी कि आज साक्षी खाना बनाते-बनाते गुनगुना रही है उसके चेहरे पर खुशी झलक रही थी। पता नहीं क्या बात है जो आज बहू इतनी खुश है । घर में सुनंदा का बेटा आदित्य और बहू साक्षी थी। सुनंदा और बहू की अच्छी निभती थी। साक्षी बहुत अच्छी थी, घर में अच्छा … Read more

डर – बालेश्वर गुप्ता

      पापा- पापा, अगले शुक्रवार को सुबह सुबह हम सब कश्मीर घूमने के लिए चल रहे हैं,आप वहां के हिसाब से कपड़े रख लेना।मैने वहां सब व्यवस्था कर दी है,यहां से फ्लाइट से श्रीनगर वहां कार बुक कर दी है,होटल बुक हो गये है।       एक सांस में मुन्ना ने बड़े ही उत्साहित रूप में सब कुछ … Read more

गलती या महापाप – रिंकी अग्रवाल ‘प्राची’

अम्मा मुझसे अब नहीं चला जाता हांडा लेकर। बारातों में बहुत-बहुत दूर चलना पड़ता है। नाचने गाने में ही लगे रहते हैं रिश्तेदार। आगे ही नहीं बढ़ने देते। पांचवा महीना चल रहा है मेरा। इतना तेज संगीत और कानफोडू डीजे। मुझे तो डर लगता है कही बच्चों को कुछ नुकसान ना हो जाए। गर्भवती पिंकी … Read more

रिश्तों की जमापूंजी – खुशी

राधिका एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी जिसके पिताजी पुजारी थे।राधिका देखने में अच्छी या सुंदर नहीं थी।पहली शादी में दो महीने बाद ही तलाक हो कर वो अपने पिता के घर आ गई।बाकी भाई बहन वेल सेटल्ड थे और वो राधिका का ध्यान भी रखते थे। राधिका ने वापस आ कर कंप्यूटर कोर्स किया … Read more

“रिश्तों की जमा-पूंजी ” – कमलेश आहूजा

सरोज के लिए दिवाली की वह रात खुशियों की रात थी,जब उसका बेटा, बहू और पोती चार वर्ष बाद विदेश से लौटे थे।कब से बेचारी इस घड़ी का इंतजार कर रही थी। कहने को वह भरे-पूरे परिवार में रह रही थी, पर पिछले कई वर्षों से हर दिवाली पर खुद को बहुत अकेला महसूस कर … Read more

*रिश्तों की जमा – पूंजी* – तोषिका

“अब तो तू बड़ा हो गया है, तेरे लिए भी लड़की ढूंढना शुरू कर रहे है, तेरे मम्मी पापा।” सिर पर हाथ फेरती हुई विकास की दादी रजनी बोली। तभी पीछे से विकास के पिता जी आए और बोले “जी मां, ढूंढना तो शुरू कर दिया है। कुछ लड़कियां है जो मैने और विकास की … Read more

रिश्तों की जमा पूंजी – सुदर्शन सचदेवा

शहर के एक छोटे से घर में रहने वाले किशन जी अक्सर कहा करते थे, “बैंक की जमा पूंजी कभी भी खत्म हो सकती है, लेकिन रिश्तों की जमा पूंजी जितनी बाँटो, उतनी ही बढ़ती जाती है।” उनका एक बेटा था  सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। फिर भी  किशनजी की सबसे बड़ी खुशी धन-दौलत … Read more

रिश्तों की जमा पूँजी – सुनीता सोलंकी ‘मीना’

ब्रह्मसिंह की बैंक की पासबुक में छपी आखिरी एंट्री  — ₹2,847/-  थी । ब्रह्मसिंह  जी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा। 72 साल की उम्र में बैंक बैलेंस से ज़्यादा ज़रूरी था उनके जीवन में  ‘लोगों का बैलेंस’। पर आज उसे वही खाली लग रहा था।  पेंशन से ही उसका घर चलता था, दवाइयाँ निकल … Read more

रिश्तों की जमा-पूंजी – प्रतिमा श्रीवास्तव

पिता जी का देहांत हो गया था और इतनी भीड़ रिश्तेदारों और जान पहचान वालों की थी की गली खचाखच भरी हुई थी। हर किसी की आंखें नम थीं और सब के पास कोई ना कोई बात उनसे जुड़ी हुई थी। हम सब भाई बहन ये सब देखकर ताज्जुब कर रहे थे की पापा ने … Read more

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