सत्यनारायण जी और सरस्वती देवी ने आश्चर्य से उस पैकेट को देखा। सुगंधा ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक और अपनेपन भरे अंदाज में समझाना शुरू किया, “मां जी, जब हमारे बच्चे छोटे थे, तो हम उन्हें डायपर पहनाते थे ताकि वे रातभर गीलेपन से परेशान न हों और सुकून से सो सकें। जीवन का पहिया जब घूमकर उसी बचपन के मोड़ पर वापस आ जाता है, तो शरीर को थोड़ी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। यह कोई बीमारी या शर्म की बात नहीं है, बल्कि एक सुविधा है। अगर रात में आप इसे पहनकर सोएंगे, तो आपको नींद में अचानक घबराकर वॉशरूम की तरफ भागना नहीं पड़ेगा और न ही गिरने का डर रहेगा।”
भोपाल के पुराने रिहायशी इलाके में स्थित एक शांत और हरे-भरे घर की बालकनी से रात की ठंडी हवा अंदर आ रही थी। घड़ी की सुइयां रात के ग्यारह बजा चुकी थीं। पूरा घर दिनभर की आपाधापी के बाद अब सुकून की नींद की ओर बढ़ रहा था, लेकिन सुगंधा के लिए यह समय हर रोज की तरह जिम्मेदारियों के एक और इम्तिहान का था।
“सुगंधा, प्लीज ज़रा अपना हाथ देना… तुम्हारे हाथ को थामे बिना पूरे दिन का तनाव नहीं उतरता और नींद तो जैसे कोसों दूर भाग जाती है,” सुगंधा के पति आलोक ने तकिए पर करवट बदलते हुए बेहद लाड़ और मनुहार भरे स्वर में कहा।
सुगंधा ने हल्की सी थकी मुस्कान के साथ अपना दायां हाथ आलोक की हथेली में थमा ही दिया था कि बिस्तर के दूसरी तरफ से सात साल की नन्ही आरोही की पतली सी रोती हुई आवाज गूंजी, “मम्मा! आपने मुझसे हाथ क्यों छुड़ा लिया? मुझे तो अकेले डर लगता है। जब तक आप मेरे सिर पर हाथ नहीं फेरतीं, मुझे परियों वाली अच्छी नींद बिल्कुल नहीं आती।”
सुगंधा अभी पलटकर बिटिया को दुलारने ही वाली थी कि पैर की तरफ चादर खींचते हुए दस साल का शौर्य मुंह फुलाकर कुनमुना उठा, “मम्मा, यह हमेशा की बात है! आप छुटकी के नखरे उठाने के चक्कर में मेरा हाथ छोड़ देती हो। मुझे भी आपके हाथ की उंगली पकड़कर ही सोना है। अब मैं बड़ा हो गया हूं तो क्या मुझे आपके दुलार की जरूरत नहीं है?”
कमरे में हल्की सी हंसी और बच्चों के लाड़ भरे तकरार की महक घुल गई। सुगंधा ने अपनी दोनों हथेलियों को देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली, “अरे मेरे प्यारे बच्चों और बच्चों के पापा! जरा मुझे यह तो बताइए कि ऊपर वाले ने मुझे सिर्फ दो ही हाथ दिए हैं और यहां मेरी ममता के हकदार तीन-तीन लोग कतार में खड़े हैं। अब यह बेचारी एक अकेली जान अपने दो हाथों को तीन हिस्सों में कैसे बांटे? सोचो, अगर इस वक्त तुम्हारे दादाजी और दादीजी भी यहां हमारे पास इसी कमरे में सो रहे होते, तो शायद वे भी कहते—’बहू, जब तक तुम्हारी हथेली हमारे माथे पर नहीं पड़ती, तब तक बदन का दर्द ही नहीं जाता और सुकून से आंखें नहीं मुंदतीं’।”
सुगंधा ने जैसे ही यह बात कही, अचानक उसका दिल किसी अनहोनी की आशंका से तेजी से धड़क उठा। उसने सोचा कि आज रात बाबूजी (सत्यनारायण जी) ने खाना भी बहुत कम खाया था और माताजी (सरस्वती देवी) के घुटनों में भी दोपहर से काफी सूजन थी। यह ख्याल आते ही सुगंधा आलोक और बच्चों से धीरे से हाथ छुड़ाकर बोली, “तुम तीनों ज़रा आंखें बंद करो, मैं बस दो मिनट में आई। मुझे लगता है कि मां-बाबूजी को मेरी जरूरत हो सकती है।”
सुगंधा दबे पांव अपने कमरे से बाहर निकली और बरामदा पार करते हुए बगल वाले कमरे की ओर बढ़ी। कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। जैसे ही उसने भीतर कदम रखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए। कमरे के फर्श पर, वॉशरूम के दरवाजे से कुछ कदम की दूरी पर, अस्सी वर्षीय सत्यनारायण जी असहाय अवस्था में नीचे गिरे पड़े थे। वे उठने का भरसक प्रयास कर रहे थे, लेकिन शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। उनकी लाठी दूर लुढ़की पड़ी थी।
सुगंधा ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर कहा, “बाबूजी!” और जल्दी से झुककर उनके कांधों को बड़े ही जतन से सहारा देकर उठाया। सुगंधा की आहट और आवाज सुनकर पास के बिस्तर पर सोईं सरस्वती देवी भी हड़बड़ाकर उठ बैठीं। अपनी कमजोर नजरों से तकिए के पास चश्मा ढूंढते हुए वे बेहद घबराकर बोलीं, “क्या हुआ बहू? सत्यनारायण जी गिर कैसे गए? अरे राम, कहीं कोई चोट तो नहीं आई?”
“नहीं मां जी, आप घबराइए मत, मैं आ गई हूं। मैं देख रही हूं,” सुगंधा ने बड़ी सावधानी से ससुर जी को सहारा देकर पहले फर्श पर बिठाया और फिर धीरे-धीरे सहारे से उन्हें पास रखी आरामकुर्सी पर बैठाया।
सत्यनारायण जी का चेहरा शर्म और ग्लानि से एकदम लाल हो चुका था। उनकी बूढ़ी और झुर्रीदार आंखों में लाचारी के आंसू तैर रहे थे। वे थरथराते होंठों और बेहद भावुक आवाज में बोले, “बहू… देख ना, मुझे लघुशंका के लिए जाना था। मैंने सोचा कि तू पूरा दिन दौड़ती-भागती रही है, अभी-अभी अपने कमरे में सोने गई है। वहां मुन्ना (आलोक) और दोनों बच्चे भी तेरे इंतजार में बैठे होंगे। मैंने सोचा कि इस रात के वक्त बेवजह तुझे क्यों परेशान करूं? खुद ही धीरे-धीरे उठकर जाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही मैंने दो कदम आगे बढ़ाए, पैरों में बहुत तेज झनझनाहट और सुन्नपन सा हुआ। संतुलन बिगड़ा और मैं गिर पड़ा… और… और मेरे कपड़े भी खराब हो गए बहू…” कहते-कहते वृद्ध पिता का गला रुंध गया और उन्होंने शर्म से अपनी नजरें नीचे झुका लीं।
इतने में सरस्वती देवी भी अपनी छड़ी टेकती हुई धीरे-धीरे उनके पास आ गईं। उनके चेहरे पर भी अपने पति की ऐसी बेबसी देखकर पीड़ा साफ छलक रही थी।
सुगंधा ने तुरंत अपने दोनों हाथों से बाबूजी के कांपते हाथों को थाम लिया और अत्यंत आत्मीयता से बोली, “बाबूजी! आप यह क्या कह रहे हैं? इसमें शर्मिंदा होने जैसी कौन सी बात है? आप परेशान मत होइए। मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि चाहे दिन हो या आधी रात, आपको जब भी जरूरत महसूस हो, बिना किसी संकोच के मुझे आवाज लगा दिया करिए। मेरा कमरा ठीक आपके कमरे के बगल में ही तो है। औलाद के होते हुए अगर मां-बाप को संकोच करना पड़े, तो हमारी सेवा का क्या अर्थ रह जाएगा?”
सुगंधा ने तुरंत अलमारी से उनके साफ कपड़े निकाले। सरस्वती देवी की मदद से उसने बड़ी सहजता, मर्यादा और अपनेपन के साथ सत्यनारायण जी के कपड़े बदलवाए। उसने एक गीले तौलिए से उनके हाथ-पैर पोंछे और फर्श को भी तुरंत साफ कर दिया, ताकि किसी को कोई असहजता न हो। उसके चेहरे पर न तो कोई घिन थी, न ही कोई झुंझलाहट; बल्कि केवल एक बेटी का निस्वार्थ समर्पण था।
जब सब ठीक हो गया और सत्यनारायण जी बिस्तर पर आराम से लेट गए, तो सरस्वती देवी ने भीगी पलकों से बहू के सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “जा बहू, अब बहुत रात हो चुकी है, जाकर सो जा। सुबह तुझे फिर चार बजे उठना पड़ेगा। बच्चों का टिफिन, स्कूल की तैयारी, आलोक का ऑफिस… पूरा दिन तू घर में चकरी की तरह घूमती रहती है। फिर भी कभी तेरे चेहरे पर शिकन तक नहीं देखी। भगवान तुझे हमेशा खुश रखे।”
सुगंधा कमरे की बत्ती बंद करने के लिए मुड़ी ही थी कि सरस्वती देवी ने धीमी और हिचकिचाती आवाज में कहा, “बहू… एक बात कहनी थी तुझसे।”
सुगंधा तुरंत पलटकर उनके पास बैठ गई और उनका हाथ पकड़कर बोली, “हां-हां मां जी, कहिए ना। कोई तकलीफ है क्या?”
सरस्वती देवी ने नजरें झुका लीं, जैसे कोई बहुत बड़ा अपराध स्वीकार करने जा रही हों। वे रुआंसी होकर बोलीं, “बेटा… ये जो तुम्हारे बाबूजी वाली समस्या है ना, पिछले कुछ दिनों से मुझे भी यही दिक्कत होने लगी है। उम्र के इस पड़ाव पर आकर शरीर पर जैसे कोई काबू ही नहीं रहा। बहुत जोर से पेशाब का दबाव बनता है, और जब तक मैं लाठी ढूंढकर वॉशरूम की चौखट तक पहुंचती हूं, तब तक कपड़ों में ही सब निकल जाता है। मैं बहुत रोकने की कोशिश करती हूं बहू, पर रोक ही नहीं पाती। इतनी शर्म आती है कि किसी से कह भी नहीं पा रही थी।”
सुगंधा ने अपनी सास के चेहरे पर फैली बेबसी और झिझक को देखा तो उसका हृदय करुणा से भर आया। उसने मां जी का माथा चूमा और बेहद शांत भाव से कहा, “मां जी, आप बिल्कुल परेशान मत होइए। यह उम्र का एक सामान्य पड़ाव है, कोई गुनाह नहीं है। आप लोग बुढ़ापे में इस तरह अपने ही शरीर से शर्मिंदा होंगे तो मुझे बहुत दुख होगा। मैं कल सुबह ही इसका पूरा पक्का समाधान निकालती हूं। आप निश्चिंत होकर सो जाइए।”
सुगंधा जब अपने कमरे में लौटी, तो आलोक और दोनों बच्चे सो चुके थे। लेकिन सुगंधा की आंखों से नींद गायब थी। वह रातभर सोचती रही कि कैसे अपने बुजुर्ग सास-ससुर के आत्मसम्मान को बिना ठेस पहुंचाए उनकी इस शारीरिक समस्या का स्थायी हल निकाला जाए।
अगली सुबह, रोजमर्रा के कामकाज, बच्चों को स्कूल भेजने और आलोक को ऑफिस विदा करने के बाद, सुगंधा ने सबसे पहले अपने पारिवारिक डॉक्टर से फोन पर परामर्श लिया। दोपहर में वह पास के बड़े मेडिकल स्टोर पर गई। वहां से उसने बुजुर्गों के लिए उपयुक्त उच्च गुणवत्ता वाले एडल्ट डायपर्स (प्रौढ़ लंगोट), वाटरप्रूफ बेड शीट्स (अंडरपैड्स), और कमरे में ही रखने योग्य एक आरामदायक कमोड चेयर खरीदी। इसके साथ ही, उसने घर के एक विश्वस्त प्लंबर और बढ़ई को बुलाया।
शाम होने से पहले ही सुगंधा ने बढ़ई की मदद से मां-बाबूजी के बिस्तर से लेकर बाथरूम तक की दीवार पर एक मजबूत ग्रैब-बार (पकड़ने वाली रेलिंग) लगवा दी, ताकि वे उसका सहारा लेकर बिना गिरे चल सकें। बाथरूम के फर्श पर फिसलने से बचाने वाली एंटी-स्किड मैट्स बिछा दी गईं और एक मोशन-सेंसर वाली नाइट-लाइट लगा दी गई, जो रात में पैर रखते ही अपने आप जल उठती थी।
जब शाम को आलोक दफ्तर से लौटा और उसने कमरे में यह सारे बदलाव देखे, तो वह अपनी पत्नी की दूरदर्शिता और संवेदनशीलता देखकर दंग रह गया।
रात को खाना खाने के बाद सुगंधा ने एक सुंदर सी टोकरी में एडल्ट डायपर्स और अन्य सामान रखा और आलोक को साथ लेकर मां-बाबूजी के कमरे में गई। उसने बहुत ही आदर और सहजता के साथ मुस्कुराते हुए कहा, “बाबूजी, मां जी, आज मैं आप दोनों के लिए एक खास तोहफा लेकर आई हूं।”
सत्यनारायण जी और सरस्वती देवी ने आश्चर्य से उस पैकेट को देखा। सुगंधा ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक और अपनेपन भरे अंदाज में समझाना शुरू किया, “मां जी, जब हमारे बच्चे छोटे थे, तो हम उन्हें डायपर पहनाते थे ताकि वे रातभर गीलेपन से परेशान न हों और सुकून से सो सकें। जीवन का पहिया जब घूमकर उसी बचपन के मोड़ पर वापस आ जाता है, तो शरीर को थोड़ी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। यह कोई बीमारी या शर्म की बात नहीं है, बल्कि एक सुविधा है। अगर रात में आप इसे पहनकर सोएंगे, तो आपको नींद में अचानक घबराकर वॉशरूम की तरफ भागना नहीं पड़ेगा और न ही गिरने का डर रहेगा।”
आलोक ने भी आगे बढ़कर अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “हां बाबूजी, सुगंधा बिल्कुल सही कह रही है। आप दोनों की सुरक्षा और शांति हमारे लिए सबसे बढ़कर है। दीवार पर यह जो ग्रैब-बार लगी है, इसके सहारे आप दिन में भी बिना किसी डर के चल सकते हैं।”
सत्यनारायण जी ने अपनी कांपती उंगलियों से उस रेलिंग को छुआ और फिर सुगंधा की ओर देखा। उनकी आंखों से बरबस कृतज्ञता के आंसू बह निकले। वे बोले, “बहू, तू सिर्फ हमारी सेवा ही नहीं करती, तूने तो हमारे बुढ़ापे के स्वाभिमान को भी बचा लिया। हम जो खुद की नजरों में गिर रहे थे, तूने हमें वापस सिर उठाकर जीने का सहारा दे दिया।”
सरस्वती देवी ने सुगंधा को गले से लगा लिया और फफक पड़ीं। उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं कि बेटियां पराई होती हैं और बहुएं कभी अपनी नहीं बन पातीं, लेकिन भगवान गवाह है कि तूने हमें जो मान और दुलार दिया है, वह तो शायद कोई सगी औलाद भी न दे पाती।”
सुगंधा ने दोनों के आंसू पोंछते हुए कहा, “मां जी, बाबूजी, जब आलोक और बच्चे कहते हैं कि मेरा हाथ पकड़े बिना उन्हें नींद नहीं आती, तो मुझे गर्व होता है। लेकिन जब मेरे ये दो हाथ आप दोनों के काम आते हैं, तो मुझे लगता है कि ईश्वर ने मुझे सचमुच एक संपूर्ण जीवन दिया है। आप दोनों इस घर की मजबूत नींव हैं, आपका स्वस्थ और मुस्कुराते रहना ही हमारी सबसे बड़ी दौलत है।”
उस रात घर में एक अलग ही शांति और सुकून का वातावरण था। सत्यनारायण जी और सरस्वती देवी बिना किसी भय, झिझक या तनाव के गहरी और मीठी नींद में सो रहे थे। जब सुगंधा अपने कमरे में पहुंची, तो आलोक ने आगे बढ़कर उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया और नम आंखों से कहा, “सुगंधा, सच कहूं तो आज मुझे गर्व है कि तुम मेरी जीवनसंगिनी हो। तुमने आज जो किया है, उसने हमारे पूरे परिवार को एक ऐसे धागे में पिरो दिया है जो कभी नहीं टूट सकता।”
तभी बगल से आरोही और शौर्य ने फिर से अपनी मम्मा का हाथ थाम लिया। सुगंधा ने एक हाथ से अपनी बेटी को और दूसरे हाथ से अपने बेटे को समेट लिया, जबकि आलोक ने उन चारों को अपने आलिंगन में भर लिया। उस छोटे से कमरे में प्रेम, आदर और संस्कारों की ऐसी पावन बयार बह रही थी, जो हर आने वाले कल को खुशियों से रोशन करने के लिए काफी थी।
आपकी राय हमारे लिए अनमोल है:
क्या आपको लगता है कि बुढ़ापे में माता-पिता की शारीरिक लाचारी पर शर्मिंदा होने के बजाय अगर हर परिवार सुगंधा जैसी समझदारी और संवेदनशीलता दिखाए, तो हमारे बुजुर्ग कभी बेबस महसूस नहीं करेंगे? अपने बुजुर्गों के स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने अनमोल विचार हमें ज़रूर लिखकर बताएं।
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