रिश्तों की जमा-पूंजी – प्रतिमा श्रीवास्तव

पिता जी का देहांत हो गया था और इतनी भीड़ रिश्तेदारों और जान पहचान वालों की थी की गली खचाखच भरी हुई थी। हर किसी की आंखें नम थीं और सब के पास कोई ना कोई बात उनसे जुड़ी हुई थी।

हम सब भाई बहन ये सब देखकर ताज्जुब कर रहे थे की पापा ने भले ही दौलत कम कमाई थी लेकिन इंसानियत बहुत कमाई थी।हम सभी अक्सर पापा को टोका करते थे कि कोई जरा सी मदद मांगता है आप तुरंत दे देते हैं और ना जाने कितने लोगों की सहायता के लिए ना तो वक्त की परवाह करतें हैं ना ही अपने सेहत की।

पापा मुस्कुरा कर कहते कि बेटा ऊपर वाले ने हमें इस काबिल बनाया है कि हम किसी की मदद कर सकते हैं तो हमें करना चाहिए। मैं चाहता हूं कि मेरे जाने के बाद लोग मेरे बारे में जिक्र करें तो मुस्कुरा कर करें ना की गलत तरीके से याद करें।

मेरे दिल में रिश्ते की बहुत अहमियत है चाहे वो खून के हों चाहे इंसानियत के।एक इंसान होने के नाते हमें जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।वो जीवन भी किस काम को जो खुद के लिए जीए। हमें तब ये बड़ी-बड़ी बातें समझ में नहीं आती थी।

पापा डाक्टर थे और उन्होंने पूरी जिंदगी कभी भी किसी मरीज का इलाज इसलिए कभी नहीं रोका की उसके पास पैसे नहीं हैं बल्कि उसकी मदद सबसे पहले किया। घर परिवार,समाज सभी में उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता था। उनके पास ‘ रिश्तों की जमा – पूंजी ‘ अपरंपार थी।

दूर – दूर से लोग इलाज के लिए आते थे उनको बहुत भरोसा था और कहते हैं ना कि एक डॉक्टर दूसरा भगवान समझा जाता है। भरोसा बहुत बड़ी चीज होती है।

आधी समस्याएं तो ऐसे ही सुलझ जाती हैं अगर हमें भरोसा होता है,चाहे वो अपने आप पर हो या भगवान पर या अपने डॉक्टर पर। बीमारी इलाज के साथ – साथ एक अच्छे डॉक्टर के बात – व्यवहार से भी ठीक हो जाती है।

चाचा जी ने आवाज लगाई की रवि,” अंतिम यात्रा की तैयारी हो गई है,जो कोई भी अंतिम दर्शन करना चाहता है तो बुला लो वरना बहुत देर हो जाएगी।”

भीड़ को चीरते हुए एक बुजुर्ग आए जो पापा के परम मित्र थे, छड़ी का सहारा लेते हुए आगे बढ़ रहे थे।आज हमने अपने जिगरी यार को खो दिया। बचपन का दोस्त था,

साथ – साथ पढ़े लिखे थे।हर सुख-दुख साझा किया था लेकिन आज अकेला छोड़कर चला गया। “चाचा जी आइए “कहते हुए मैं उनको पापा  के पास ले गया। सचमुच में बहुत दुखद होता है अपनों को खोना ।ईश्वर के हाथों में सबकी बागडोर है कब खींच ले वो कह नहीं सकते कहते हुए फूल चढाया और पास की कुर्सी पर बैठ गए।

मम्मी तो बहुत पहले गुजर गईं थीं पर पापा ने हर रिश्ते निभाए थे। मां बनकर पाला हम सभी को और दादी नानी के सारे रिश्तों को मजबूती से पकड़ कर रखा। काम-काज के चक्कर में समय कम मिलता था फिर भी वो हर किसी के सुख-दुख में शामिल होने की पूरी कोशिश करते थे।

बहुत ही अच्छे इंसान थे। यूं ही नहीं इतनी भीड़ आज खड़ी थी। इंसान का कर्म बोलता है और सही भी है।

घर की मजबूत नींव थे पापा।छत बन कर सारे दुख दर्द से बचा कर रखा था। कभी हमारे आत्मविश्वास को डगमगाने नहीं दिया। हमेशा वो मौजूद रहते हमारी जरूरतों पर। ऐसा लग रहा था की अब हमारा घर ही नहीं बचा है। बड़ा होने के नाते अब ये भार मेरे कंधों पर था। मुझे अपने भाई-बहनों को संभाल कर रखना है

मैं नम आंखों से मन ही मन पापा से वादा कर रहा था। पापा अक्सर कहते थे कि,” मैं रहूं ना रहूं तुम लोग एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ना बच्चों क्योंकि परिवार हमारी ताकत होता है। रिश्तों को निभाने में हमें कई समझौते करने पड़ते हैं लेकिन सुख दुःख में अगर हमारा परिवार साथ है

तो समझाना की असली जमा पूंजी हमारे पास है। इंसान धन दौलत को कमाने की दौड़ में अपनों को ही पीछे छोड़ देता है अंत में सुख सुविधाएं तो बहुत होती हैं लेकिन छोटी छोटी खुशियां बांटने वाला कोई अपना नहीं होता है। समाज आएगा थोड़ी देर दुख प्रकट करेगा और चला जाएगा लेकिन वो कंधा नहीं मिलेगा जहां तुम सिर रखकर रो सको। समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए पर परिवार को साथ लेकर।

अंतिम विदाई हो गई थी पापा की राम नाम सत्य है की गूंज से घर मोहल्ले और इस संसार से विदा ले लिया था उन्होंने।

उनकी सीख ने हम सभी को बांध कर रखा था।आज पूरा परिवार साथ खड़ा था।एक पीढ़ी का अंत हो गया था दूसरी ने शायद उनकी जगह ले ली थी। पापा की तरह मैं सबकुछ अपने आप संभालने लगा था। थोड़े दिनों के बाद सभी मेहमान और घर वाले चले गए थे। दोनों बहनें अपने – अपने घर चली गईं थीं

और मैंने भरोसा दिलाया था कि ये घर हम सभी का है तो जब मन करे आ जाना। हम दोनों भाई मिलजुलकर रह रहे थे। पापा के सिखाए रास्ते पर चलना हमारा सिद्धांत और नैतिक जिम्मेदारी थी। पापा ने हर रिश्ते बखूबी निभाया था अब हमारी बारी थी।

                                प्रतिमा श्रीवास्तव

                                     नोएडा

error: Content is protected !!