इंसान दौलत भले ही कम कमाए पर परिवार का साथ हो तो हर तकलीफ से निकल ही जाता है। परिवार ऐसी पूंजी है जिसमें हमें बहुत कुछ लगाना होता है बेटा।सब कुछ सब का है,
अपने से पहले अपने परिवार को अहमियत देना और अपनों की खुशी खुद से पहले सोचना, त्याग, धैर्य, सम्मान और ना जाने क्या क्या… सुहासिनी अपने बच्चों को समझाने की कोशिश कर रही थी। आज के जमाने के बच्चे प्रैक्टिकल ज्यादा हैं और उनकी दुनिया अलग है लेकिन घर के संस्कार का असर कहीं ना कहीं उनके अंदर भी था।
रंजन बाबू हमेशा से ऐसे विचार वाले व्यक्ति थे और ये संस्कार उन्हें अपने पिता जी श्री सिद्धेश्वर जी से मिला था।गांव के सरकारी स्कूल के अध्यापक थे वो और शिक्षा ही असली दौलत है उनका सिद्धांत था। गांव में तो ना जाने कितने रिश्तेदार आया जाया करते थे और ये बात उनके परिवार की एकता का प्रतीक था।
कहीं ना कहीं रंजन बाबू भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलते थे लेकिन उनके बच्चे कौशल और कुमूद को ये बातें पसंद नहीं आती थी। संस्कार ऐसे थे की खुल कर विरोध नहीं कर पाते थे लेकिन चेहरे के हाव भाव सबकुछ कह जाते थे।
मुंबई में रहते थे तो कोई ना कोई रिश्तेदार कभी घूमने के बहाने कभी इलाज के बहाने आ जाता और कब जाना है पता नहीं चलता। मुंबई में फ्लैट की कहानी से सभी परिचित हैं
की खुद का गुजारा करना मुश्किल और मेहमानों के लिए आए दिन घर में क्लेश होने लगा था।सब के दिनचर्या और सुकून शांति में खलल तो मचती ही थी आपसी संबंधों में भी तकरार सा होने लगा था।
रिश्तेदारों का क्या उनका रहने खाने का खर्चा बच जाता और मीठी-मीठी बातें करके और अच्छे परिवार और संस्कार का तमगा थमा कर चले जाते और रंजन बाबू का सीना खुशी से दो इंच और चौड़ा हो जाता।मन ही मन बहुत खुश होते की हमारे बच्चों को हमने अच्छे संस्कार दिए हैं।
समय के साथ बच्चे बड़े होने लगे थे और नौकरी भी लग गई थी।जब जवान बच्चे कमाने लग जाते हैं तो अपने निर्णय भी कहीं ना कहीं लेने लगते हैं। उनको समझ थी की पापा से कुछ कहना बेकार है वो उल्टा हमें ही संस्कारों की दुहाई देने लग जाएंगे और हमने कभी पापा को खुल कर अपने मन की बात कही भी नहीं।
जहां बच्चों और पिता के बीच में रिश्ते ऐसे हों तो धीरे-धीरे दूरियां बनने लगती है क्योंकि इंसान को सौ साल पुरानी बातों के पीछे भागने के बजाय समय के साथ चलना सीखना पड़ता है वरना वो आउटडेटेड होने लगता है।
बच्चों को अपने घर में ही स्वतंत्रता नहीं लगती थी।थक हार कर घर लौटे तो पता चला दूर की बुआ के बेटे बहू पधारे हैं और कौशल के कमरे में आराम कर रहे हैं तो कौशल का दिमाग हिल गया। मां पर गुस्सा दिखाते हुए बोला कि,” मुझे एक प्रोजेक्ट पर रात भर काम करना था अब मैं कहां करूं और अपने ही घर में सुकून से रह नहीं सकता क्या मां? कौन हैं ये रिश्तेदार? कोई अपना सगा हो तो भी सही। आपने क्यों नहीं मना किया इन लोगों को?
” बेटा तुम्हारे दादा जी ने इनको पता दे कर भेज दिया और पापा का तो तुम्हें पता ही है की दादा जी की बात टाल नहीं सकते तो क्या करती। तुम मेरे कमरे में काम कर लो मैं कुमुद के साथ सो जाऊंगी पापा बाहर सो जाएंगे। अच्छा नहीं लगता ना की मेहमानों को कोई कष्ट हो ” मां का वही घिसा-पिटा डायलॉग सुन सुनकर हम बड़े हुए थे कुछ भी नया कहां था इसमें।
कौशल ने नया फ्लैट लेने का मन बना लिया था। उसने दूसरे दिन आफिस में इस बात का जिक्र भी किया की उसको एक फ्लैट चाहिए और लोन का क्या प्रोसिजर है सबकुछ पता कर लिया । कुमुद को उसने धीरे से सब बताया था। कुमुद भी इस बात से सहमत थी।
देखिए क्या हो रहा था क्योंकि एक परिवार दूसरों के लिए तो बहुत ही अच्छा था लेकिन खुद के परिवार में ही असंतोष ने जन्म ले लिया था।
कुछ महीनों की तलाश के बाद कौशल और कुमूद ने एक घर पसंद करके अपनी – अपनी जमापूंजी और लोन लेकर एक घर ले लिया था। रविवार की दोपहर को खाना खाते समय बहुत ही हिम्मत जुटा कर कौशल ने मम्मी पापा को अपने फ्लैट के बारे में बता ही दिया। पापा तो आधा खाना छोड़ कर कमरे में चले गए और मां उनके पीछे-पीछे। बहुत बड़ा धक्का लगा था उन दोनों को और सोचने लगे कि हमारे संस्कार में कौन सी कमी आ गई
जो बच्चों ने घर लेने के बाद बताया।एक बार पूछा भी नहीं? माथे पर हांथ रख कर रंजन बाबू बोले की ये घर उनको छोटा लगने लगा है? मुझे उनके घर लेने पर एतराज़ नहीं है पर बिना राय बात के अपने मन से निर्णय लेना कैसे सोचा उन लोगों ने? सुहासिनी जी के पास जबाब देने को बहुत सारे तर्क थे लेकिन इस समय रंजन बाबू को और परेशान नहीं करना चाहतीं थीं
क्योंकि वो भी आए दिन आने वाले मेहमानों की आवा भगत करते करते थक जातीं थीं। रिश्तेदारों का क्या वो तो सिर्फ फायदा उठाने लगे थे क्योंकि इतने बड़े शहर में रहने खाने पीने में बहुत खर्च होता था।
करवटों में रात निकल गई। दूसरे दिन सुबह उठे तो चाय की प्याली के साथ सुहासिनी जी ने उनसे बात शुरू की।
“‘अतिथि देवो भव’ हमारे संस्कार में शामिल है लेकिन वक्त के साथ हमें अपने परिवार की भी सोचना चाहिए। आपको पता भी है कि हम सब कितना परेशान होते हैं आए दिन आने वाले रिश्तेदारों से।
बच्चों को अपने घर में ही सुकून नहीं है।वो बड़े हो रहे थे तो उनको अपने अपने कमरे और एकांत चाहिए रहता था। कभी किसी की परीक्षा है तो भी आपने किसी रिश्तेदारों को मना नहीं किया। आजकल इतने होटल हैं रुक सकतें हैं लोग। गर्मी की वो छुट्टी याद है जब हम सब शिमला जाने वाले थे और बच्चे कितने खुशी-खुशी सारी तैयारियां किए थे और अचानक से आपकी बहन का आने का प्रोग्राम बन गया आपने एक बार बच्चों का नहीं सोचा की वो कितने उदास हो गए थे।
“सुहासिनी जी ऐसी ना जाने कितनी बातें गिना रहीं थीं।
” कोई अपने घर आने वाला है तो मैं कैसे मना कर सकता था,लोग क्या सोचते की शहर में जाते ही सारे संस्कार खत्म हो गए और हां चार दिन लोगों के साथ रहने में इतनी भी क्या तकलीफ़ भला? हम लोग गांव में कितने बड़े परिवार के साथ रहते थे। हमें तो कोई अलग से कमरे की जरूरत नहीं पड़ी। “रंजन जी को अभी भी अपनी ग़लती का अहसास नहीं हो रहा था।
सुहासिनी जी बोली,” वो जमाना अलग था ये अलग है और पता है हमारा बजट कितना बिगड़ जाता है इस मेहमाननवाजी से,ना तो हमारे पास इतने नौकर-चाकर हैं ना ही इतनी दौलत और आलीशान बंगला की लोग आते जाते रहें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। सारी कटौती हमें खुद पर और बच्चों की ख्वाहिशों पर करनी पड़ती थी।
मैं ये नहीं कहती की लोग आए जाएं नहीं लेकिन कभी कभी मना करना भी जरूरी है” सुहासिनी जी के तर्क का कुछ – कुछ असर हो रहा था रंजन जी पर।
बच्चों की अपनी जिंदगी है शायद इस माहौल में उन्हें हमसे भले ही तकलीफ ना हो पर हमारे अपने रवैए से उनको घुटन हो रही हो। आपको भी अपने परिवार की अहमियत देनी होगी वरना हम दूसरे रिश्ते निभाते निभाते खुद के रिश्तों को ही ना खो बैठे ” सुहासिनी जी ने चाय की प्याली उठाई और रसोई घर में आ गई।
रंजन जी के मन में उथल-पुथल हो रही थी,वो उठे और कौशल के कमरे में आकर बोले कि,” भाई हमें भी तो दिखाओ की तुमने कौनसा घर लिया है और हां पैर छूओ सारे संस्कार भूल गए हो । अपनी कमाई से लिए घर का आशीर्वाद नहीं लेना है क्या?”
कौशल आवाक रह गया क्योंकि उसने पापा का ऐसा रूप कभी देखा ही नहीं था।पैर छूकर बोला पापा,” मुझे माफ कर दीजिए बहुत बड़ी ग़लती हो गई जो हमने आपको बिना बताए ये सब किया “।
” ग़लती तुम्हारी नहीं बेटा हमारी है। हमें समय और जगह के हिसाब से सोचना चाहिए था। हमने तुम पर संस्कारों की आड़ में बहुत बोझ डाल दिया। रिश्तेदारी उतनी ही निभानी चाहिए जितनी जरूरत हो वरना लोग फायदा उठाने लगते हैं ऐसा तुम्हारी मां ने समझाया तब मुझे एहसास हुआ।हम पुरानी सोच लेकर आगे बढ़ रहे थे और तुम सभी ने मुझे कभी टोका नहीं। कोई बात नहीं अब से हमारा परिवार अपने बारे में सोच सकता है, तुम लोगों को जो भी उचित लगे करो मैं तुम्हारे साथ हूं।” रंजन जी की बातों में पश्चाताप साफ – साफ झलक रहा था।
पापा हम सब साथ साथ ही रहेंगे वो घर तो दो साल बाद मिलेगा तब सोचेंगे की क्या करना है। रंजन जी के चेहरे पर मुस्कान थी और अपने परिवार पर गर्व महसूस हो रहा था।
सही बात है रिश्तों की अहमियत रखो ना की दूर – दूर के उन रिश्तेदारों की जो मौकापरस्त होते हैं। हमारे देश में अतिथि देवो भव तो है पर अतिथियों की भी जिम्मेदारी बनती है की किसी का फायदा नहीं उठाएं और जहां मेहमान बनकर जाएं तो मेजबान को तकलीफ़ ना हो इस बात का ख्याल रखें तो रिश्ते हमेशा तरोताजा रहेंगे।
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा